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…तो फर्जी था अरबों का एनएच-74 घोटाला !

संदेह वाले आईएएस और पीसीएस मलाईदार पदों पर

जेल गए पीसीएस अफसरों भी की पदोन्नति

अभी भी हाईकोर्ट में विचाराधीन है मामला

देहरादून। कांग्रेस सरकार के समय में सामने आए एनएच-74 में अरबों के घोटाले के अफसरों की फिलवक्त पौ-बारह है। निलंबित किए गए और जेल गए सभी अफसर इस समय मलाईदार पदों पर काबिज हैं। आलम यह है कि अब इन्हें पदोन्नति भी दी जा रही है।

2017 के आम चुनाव से पहले ऊधमसिंह नगर जिले में जमीनों के खेल में अऱबों का यह घोटाला खासा चर्चा में रहा। एसआईटी ने अपनी जांच में कुछ आईएएस और कई पीसीएस अफसरों के साथ ही निचले स्तर के कर्मियों को भी दोषी पाया। कई जेल भी गए। चुनाव के बाद सीएम बने त्रिवेंद्र सिंह रावत ने इस घोटाले की सीबीआई जांच की सिफारिश की। लेकिन केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने यह जांच नहीं होने दी।

उस समय एसआईटी जांच की निगरानी कर रहे ऊधमसिंह नगर के एसएसपी सदानंद दाते और जांच अधिकारी स्वतंत्र कुमार आला अफसरों के दवाब में नहीं आए और जांच में तमाम अफसरों के नाम शुमार कर दिए। मजबूरन सरकार ने दो आईएएस अफसरों को निलंबित किया और कई पीसीएस अफसरों को जेल जाना पड़ा। दाते के केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने का आदेश आते ही यह साफ हो गया था कि अब कुछ होने वाला नहीं है।

वक्त गुजरा और नियमों की दुहाई देकर अफसरों को न केवल बहाल किया गया, बल्कि उन्हें प्राइज पोस्टिंग भी दे दी गई। यह मामला इस वजह से फिर से गर्म हुआ क्योंकि मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली डीपीसी ने जेल गए दो पीसीएस अफसरों की पदोन्नति की सिफारिश कर दी है।

ऐसे में सवाल यह है कि क्या घोटाला हुआ ही नहीं। अगर नहीं हुआ तो क्या एसआईटी जांच फर्जी थी। अगर नहीं हुआ तो तमाम किसानों से अरबों रुपये सरकारी खजाने में वापस जमा क्यों किए। अगर कोई गड़बड़ी नहीं थी तो अफसरों को निलंबित क्यों किया गया। सवाल यह भी है कि निलंबित किए गए और जेल गए अफसर अपनी बदनामी के खिलाफ किसी सक्षम अदालत में मुकदमा दर्ज कर क्यों नहीं बेदाग होने का सर्टिफिकेट हासिल कर लेते हैं।

जाहिर है कि अरबों रुपये के इस घोटाले का जिन्न फिलवक्त बोतल में बंद होता दिख रहा है। जीरों टॉलरेंस की बात करने वाली भाजपा की सरकार भी साढ़े चार साल में संदेह के घेरे में आए अफसरों की पैरोकारी करती ही दिख रही है।

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