मैं भी शहरी नक्सली

Posted on 01 Sep 2018 -by Watchdog

अरुंधति रॉय

जिस चीज के बारे में हम लोग बहुत दिनों से बहस कर रहे हैं, उसे 30 अगस्त 2018 के अखबार ने स्पष्ट कर दिया है। इंडियन एक्सप्रेस ने अपने पहले पन्ने की रिपोर्ट में कहा है, "पुलिस ने न्यायालय को बताया: जिन्हें पकड़ा गया वे फासीवादी सरकार को उखाड़ फेंकने की साजिश रच रहे थे।" हमें अब यह पता हो जाना चाहिए कि हम एक ऐसे शासन के अधीन हैं जिसे उसकी अपनी पुलिस ही फासीवादी कहती है। आधुनिक भारत में, अल्पसंख्यक होना ही अपराध है। मार दिया जाना अपराध है। पीट-पीट कर मार दिया जाना अपराध है। गरीब होना अपराध है। गरीबों के हक की बात करना सरकार को उखाड़ फेंकना है।

जब पुणे की पुलिस ने कई जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ताओं, लेखकों, वकीलों और पादरियों के घरों पर एक साथ पूरे देश में दबिश देकर पांच लोगों को- जिसमें तीन बड़े मानवाधिकार कार्यकर्ता और दो वकील हैं- बहुत ही हास्यास्पद या सतही आरोपों में गिरफ्तार किया, तो सरकार इस बात को बहुत ही अच्छी तरह जानती थी कि इसका प्रतिरोध होगा। इस कदम को उठाने से पहले अगर सरकार यह सब जानती थी कि उसका पूरे देश में विरोध होगा और इस तरह के प्रेस कांफ्रेंस भी होंगे तो उसने ऐसा किया क्यों? 

हालिया उपचुनाव के वास्तविक वोटर आंकड़ों और देशव्यापी सर्वेक्षण को एक साथ मिलाकर लोकनीति-सीएसडीएस के अध्ययन से पता चलता है कि बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बहुत ही तेजी से अपनी लोकप्रियता खो रहे हैं। इसका मतलब यह हुआ कि हम खतरनाक दौर में प्रवेश कर रहे हैं। अपनी लोकप्रियता में हो रही गिरावट की असली वजहों से जनता का ध्यान हटाने और विपक्षी दलों के बीच बन रही एकजुटता को तोड़ने के लिए अब निर्ममता से लगातार साजिशें रची जाएंगी। अभी से लेकर चुनाव तक लगातार सर्कस चलता रहेगा जिसमें गिरफ्तारियां, हत्याएं, पीट-पीट कर हत्या, बम विस्फोट, फर्जी हमले, दंगे और नरसंहारों का दौर शुरू होगा। हमने चुनाव के माहौल को सभी तरह की हिंसाओं से जोड़ना सीख लिया है।

डिवाइड एंड रूल (बांटो और राज करो) तो था ही, अब इसमें यह नया शब्द भी जोड़ दीजिए डायवर्ट एंड रूल (ध्यान भटकाओ और राज करो)। अभी से लेकर आने वाले चुनाव तक हमें पता भी नहीं होगा कि कब और कैसे हमारे ऊपर आग का गोला गिरेगा और उस अग्निवर्षा का रूप कैसा होगा। इसलिए इससे पहले कि मैं वकीलों और एक्टिविस्टों की गिरफ्तारी के बारे में बातें करूं- बस मैं कुछ दूसरी बातों को दुहराना चाहती हूं कि हमें अग्निवर्षा के बावजूद भटकना नहीं चाहिए, चाहे जितनी भी विचित्र घटनाओं का हमें सामना करना पड़े।

1. आठ नवंबर 2016 को जब प्रधानमंत्री मोदी ने टीवी पर नमूदार होकर देश के 80 फीसदी प्रचलित नोटों को एक झटके में बंद कर दिया, उस घटना को घटे एक वर्ष और नौ महीने हो गए हैं। ऐसा लगता है कि उनके उस फैसले से उनके कैबिनेट के मंत्री भी भौचक थे। अब भारतीय रिजर्व बैंक ने घोषणा की है कि 99 फीसदी से अधिक राशि बैंकों में वापस आ चुकी है। इंग्लैंड के गार्जियन अखबार ने 30 अगस्त को ही लिखा है कि इससे देश की अर्थव्यवस्था का एक फीसदी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) घट गया है और लगभग 15 लाख नौकरियां खत्म कर दी गई हैं। इस बीच सिर्फ नए नोट को छापने में कई हजार करोड़ रूपए ऊपर से खर्च हो गए हैं। नोटबंदी के बाद माल और सेवा कर (जीएसटी) लागू कर दिया गया, जो नोटबंदी से जूझ रहे छोटे व मझोले व्यापारियों के लिए दूसरा बड़ा झटका था। 

इससे छोटे व मझोले व्यापारियों और खासकर गरीबों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा है जबकि बीजेपी के करीबी कई निगमों ने अपनी संपत्ति में कई गुणा बढ़ोतरी कर ली है। विजय माल्या और नीरव मोदी जैसे व्यवसायियों को सरकार ने हजारों करोड़ की सार्वजनिक संपत्ति को लेकर भाग जाने दिया और सरकार मूकदर्शक बनकर देखती रही। 

इस तरह के क्रियाकलापों में हम किसी तरह की जवाबदेही की उम्मीद रखते हैं? कुछ नहीं? बिल्कुल शून्य? 

इसी बीच, जब 2019 में लोकसभा चुनाव की तैयारी शुरू हो गई है, भारतीय जनता पार्टी सबसे अमीर राजनीतिक दल बन गई है। सबसे अपमानजनक यह है कि हाल ही में पेश किए गए चुनावी बांड में यह कहा गया है कि राजनीतिक दलों को दान दिए गए चंदे का स्रोत पूरी तरह से गुप्त रखा जाएगा।

2. हम सभी को 2016 का मुबंई में ‘मेक इन इंडिया’ ईवेंट याद है जिसका उद्घाटन मोदी जी ने किया था और उस सांस्कृतिक महोत्सव में भीषण आग लग गई थी जिसमें उसका सबसे बड़ा पंडाल जलकर खाक हो गया था। खैर, दरअसल ‘मेक इन इंडिया’ के आइडिया को राख बनाने वाली चीज राफेल लड़ाकू विमान का वह सौदा है जिसकी पेरिस में प्रधानमंत्री ने कदाचित अपनी रक्षामंत्री की जानकारी के बगैर ही घोषणा कर दी थी।

यह घोषित शिष्टाचार के पूरी तरह खिलाफ है। हम मोटे तौर पर तथ्यों से वाकिफ हैं- कांग्रेसनीति यूपीए सरकार के तहत यह सौदा 2012 में ही किया जा चुका था जिसके तहत हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड की मदद से अपने ही देश में इसके कल-पुर्जों को जोड़ना था। इस सौदे को तो मोदी सरकार ने भंग कर दिया और इस सौदे का एक नया मसविदा तैयार किया गया। हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स, जो एक सरकारी कंपनी है- को अब इस सौदे से पूरी तरह गायब कर दिया गया है। कांग्रेस पार्टी के अलावा अन्य व्यक्तियों का, जिन्होंने इस सौदे का अध्ययन किया है- कहना है कि इसमें व्यापक पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ है और उन्होंने रिलायंस डिफेंस लिमिटेड के शामिल किए जाने पर सवाल भी उठाए हैं क्योंकि उसने आज तक कभी हवाई जहाज बनाया ही नहीं है।

विपक्ष ने संयुक्त संसदीय समिति से इस सौदे की जांच की मांग की है। क्या हमें इसकी अपेक्षा है? या फिर हमें अनिवार्यतः इन सभी जहाजों को बिना निगले ही पचा लेना चाहिए?

3. पत्रकार और एक्टिविस्ट गौरी लंकेश की हत्या में कर्नाटक पुलिस की जांच में कई लोगों की गिरफ्तारियां हुई हैं। इसके क्रियाकलापों से दक्षिणपंथी हिन्दूवादी संगठन सनातन संस्थान जैसे अनेकों कार्यों की जानकारी मिली है। इससे पता चलता है कि उनकी जड़ें इतना विस्तृत हैं कि उनके पास आतंक फैलाने का पूरी तरह से तैयार एक गुप्त नेटवर्क है, उनके पास हिटलिस्ट है, उनके छुपने-छुपाने की अपनी जगह है, हथियार है, गोला-बारूद है, हत्या करने की तैयारी है, बम लगाने की तकनीक है और जहरशुमारी की तरकीब भी है।

ऐसे कितने संगठन हैं जिनके बारे में हमें जानकारी है? इस तरह के और कितने गुप्त संगठन काम कर रहे हैं? वे लोग इस बात से आश्वस्त होंगे कि उसे ताकतवर लोगों का वरदहस्त है और संभवतः पुलिस का संरक्षण भी प्राप्त है, उसने कितनी योजनाएं हमारे लिए बनाकर रखी हैं? कितने फर्जी हमले? असली कितने? ये कहां-कहां होंगे? कश्मीर में? अयोध्या में?  या फिर कुंभ के मेले में? कितनी आसानी से वे किसी भी या सभी चीजों को- चाहे छोटा हो या बड़ा उत्पात मचाकर पालतू मीडिया घरानों की मदद से वे पटरी से उतार दे सकते हैं। इन असली खतरों से हमारा ध्यान भटकाने के लिए अभी की ये गिरफ्तारी की गयी हैं।  

4. द्रुत गति से शैक्षणिक संस्थानों को नष्ट किया जा रहा है। बेहतर रिकार्ड वाले विश्वविद्यालयों को नष्ट किया जा रहा है और प्रेत की तरह सिर्फ कागजों पर मौजूद विश्वविद्यालय को महिमामंडित किया जा रहा है। तार्किक रूप से यह सबसे दुखदायी है। यह तरह-तरह से किया जा रहा है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) को देखते-देखते हमारी आंखों के सामने मिट्टी में मिलाया जा रहा है। वहां के विद्यार्थियों और कर्मचारियों पर लगातार हमले हो रहे हैं। कुछ टीवी चैनलों ने झूठा और नकली वीडियो दिखाकर, दुष्प्रचार करके वहां के छात्रों की जिंदगी खतरे में डाल दिया है।

उमर खालिद जैसे युवा स्कॉलर पर जानलेवा हमला हुआ क्योंकि उसके खिलाफ लगातार झूठ बोलकर उसे बदनाम किया जाता रहा। झूठे इतिहास और बेवकूफियों से भरे पाठ्यक्रम से हम इतने जाहिल हो जाएंगे कि हम उससे उबर ही नहीं पाएंगे। और अंत में, शिक्षा का निजीकरण किए जाने से, आरक्षण से मिले थोड़े बहुत लाभ का भी सत्यानाश किया जा रहा है। हम शिक्षा में फिर से ब्राह्मणवाद का प्रादुर्भाव देख रहे हैं, जिस पर कॉरपोरेट का मुलम्मा चढ़ा हुआ है। दलित, आदिवासी और पिछड़े छात्र-छात्राओं को एक बार फिर से शिक्षण संस्थाओं से बाहर धकेला जा रहा है क्योंकि वे अब मंहगी फीस नहीं भर सकते हैं। यह शुरू हो चुका है। यह किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है।

5. कृषि क्षेत्र में भीषण परेशानी, किसानों की आत्महत्या में लगातार बढ़ोतरी, मुसलमानों की पीट-पीटकर हत्या, दलितों पर हो रहे लगातार हमले, आम लोगों पर अत्याचार, सवर्णों के अत्याचार के खिलाफ तनकर खड़े होने की कोशिश करने वाले भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर आजाद की गिरफ्तारी, अनुसूचित जाति और जनजाति अत्याचार अधिनियम को कमतर करने का प्रयास। इन सबसे हमारा ध्यान भटकना नहीं चाहिए।

यह सब कुछ कहने के बाद मैं हाल में हुई गिरफ्तारियों पर बात करना चाहती हूं।

जिन पांच लोगों को गिरफ्तार किया गया है- वरनॉन गोनजाल्विस, अरुण फरेरा, सुधा भारद्वाज, वरवर राव और गौतम नवलखा- इनमें से एक भी व्यक्ति यलगार परिषद की 31 दिसबंर 2017 को हुई रैली में उपस्थित नहीं था। वे लोग अगले दिन हुई उस रैली में भी नहीं थे जिसमें लगभग 3 लाख से अधिक लोग, जो अधिकतर दलित थे, भीमा-कोरेगांव की 200वीं वर्षगांठ मनाने के लिए जमा हुए थे। (दलित ब्रिटिश हुकूमत के साथ मिलकर उत्पीड़क पेशवा के खिलाफ लड़े थे। कुछ गिनी-चुनी जीत में यह एक है जिसे उत्पीड़ित दलित गर्व के साथ मना सकते हैं।) यलगार परिषद दो विशिष्ट सेवानृवित्त जजों- जस्टिस सावंत और जस्टिस कोलसे पाटिल द्वारा बुलाई गई थी। रैली के अगले दिन हिन्दुत्व के उग्रपंथियों द्वारा हमले किए गए, जिसके चलते कई दिनों तक वहां अशांति का माहौल रहा।

इसके दो आरोपी मिलिन्द एकबोटे और संभाजी भिड़े हैं। दोनों अब भी बाहर हैं। उनके एक समर्थक द्वारा जनवरी 2018 में दर्ज कराई गई एफआईआर के बाद पुणे पुलिस ने पांच एक्टिविस्टों- रोना विल्सन, सुधीर ढावले, शोमा सेन, महेश राउत और वकील सुरेन्द्र गाडलिंग को गिरफ्तार कर लिया। उन लोगों पर आरोप है कि वे रैली के बाद हुई हिंसा के लिए जिम्मेदार हैं। साथ ही, वे लोग प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हत्या की साजिश भी रच रहे थे। उन पर गैरकानूनी क्रियाकलाप रोकथाम अधिनियम के तहत मुकदमा चल रहा है और वे अभी तक हिरासत में हैं। वे भाग्यशाली लोग हैं जो अभी भी जिंदा हैं क्योंकि इशरत जहां, सोहराबुद्दीन और कौसर बी के ऊपर भी यही आरोप लगाए गए थे, लेकिन उनमें से कोई भी अपने मुकदमे का ट्रायल देखने के लिए जिंदा नहीं रह पाया। 

जो भी दल सत्ता में होते हैं चाहे वह कांग्रेसनीत यूपीए की सरकार हो या बीजेपी की सरकार हो- वे आदिवासियों और दलितों पर किए जा रहे हमले को माओवादी या नक्सली कहकर सही साबित करते हैं। मुसलमानों को चुनावी गणित से लगभग गायब कर दिया गया है लेकिन सभी राजनीतिक दल अब भी दलितों और आदिवासियों को वोट बैंक के रूप में देखते हैं। एक्टिविस्टों को गिरफ्तार करके, उन्हें माओवादी या नक्सली कहकर, सरकार दलित आकांक्षाओं को कमजोर और अपमानित कर रही है जबकि दूसरी तरफ सरकार ऐसा दिखा रही है कि वह “दलित मुद्दों” को लेकर संवेदनशील है। इस वक्त जब हम लोग यह बात कर रहे हैं, पूरे देश में हजारों गरीबों और वंचितों को जेल में डाल दिया गया है, जो अपने स्वाभिमान, हक और हुकूक की लड़ाई लड़ रहे थे- उन पर राजद्रोह के मुकदमे दर्ज किए गए हैं, जिसकी सुनवाई भी नहीं हो रही है और वे भीड़ भरी जेलों में सड़ रहे हैं। 

जिन दस लोगों को सरकार ने गिरफ्तार किया है, जिनमें तीन वकील और सात मशहूर एक्टिविस्ट हैं, ऐसा कर के उसने हजारों लोगों को आशा और न्याय का प्रतिनिधित्व दिलाने से वंचित कर दिया है क्योंकि यही लोग उन मजलूमों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। वर्षों पहले, जब सरकार समर्थित गैरकानूनी फौजी जत्था सलवा जुडूम बस्तर में आदिवासियों के पूरे के पूरे गांव को जला देता था, उनका कत्लेआम किया जा रहा था, तब छत्तीसगढ़ पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज- (पीयूसीएल) के महासचिव डॉक्टर विनायक सेन ने पीड़ितों की आवाज को बुलंद किया था।

जब विनायक सेन को जेल में डाल दिया गया, तब सुधा भारद्वाज ने उस मसले को पुरजोर तरीके से उठाया था। वे वर्षों से उसी क्षेत्र में रहकर ट्रेड यूनियन चलाते हुए वकालत कर रही थीं। प्रोफेसर साईं बाबा, जो बस्तर में अर्धसैनिक बलों द्वारा किए जा रहे अत्याचार की बात उठा रहे थे, उन्होंने विनायक सेन के पक्ष में आवाज उठाना शुरू कर दिया। जब साईंबाबा को गिरफ्तार कर लिया गया तब उनके पक्ष में रोना विल्सन खड़े हो गए। सुरेन्द्र गाडलिंग साईंबाबा के वकील थे। जब रोना विल्सन और सुरेन्द्र गाडलिंग को गिरफ्तार किया गया तो उनके लिए सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा और दूसरे लोग खड़े हो गए…  और यह गिरफ्तारियां ऐसे ही चले जा रही हैं। 

सबसे कमजोर तबको की घेराबंदी की जा रही है और उनकी आवाज दबाई जा रही है। मुखर लोगों को कैद किया जा रहा है। भगवान बचाए इस देश को।

(अरुंधति रॉय ने यही पर्चा प्रेस क्लब में आयोजित संवाददाता सम्मेलन के दौरान पढ़ा था। हिंदी में इसका अनुवाद वरिष्ठ पत्रकार जितेंद्र कुमार ने किया है।)



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