विधायक खरीदो और विपक्ष की सरकारें गिराओ

Posted on 18 Jul 2020 -by Watchdog

अनिल जैन

एक ओर दुनिया के तमाम देशों की सरकारें कोरोना महामारी का मुकाबला करने में जुटी हैं, वहीं भारत सरकार और सत्तारूढ़ दल का नेतृत्व इस भयावह महामारी के प्रति पूरी तरह बेफिक्र होकर विधायकों की खरीद फरोख्त के जरिए विपक्षी दलों की राज्य सरकारों को गिराने के अपने प्रिय खेल में जुटा हुआ है। कोरोना महामारी का मुकाबला करने के मामले में ताली, थाली, घंटी और शंख बजाने तथा दीया-मोमबत्ती जलाने जैसे देशव्यापी आयोजनों को अंजाम देने और बगैर किसी तैयारी के करीब दो महीने का लॉकडाउन देश पर थोप देने के बाद सत्ता के शीर्ष से जनता को कोरोना के साथ जीना सीखने और आत्मनिर्भर बनने का मंत्र दे दिया गया है। ईश्वर आराधना के लिए धार्मिक स्थल खोल देने की इजाजत भी दे दी गई है। शॉपिंग मॉल, रेस्त्रां, क्लब आदि भी धीरे-धीरे खुलते जा रहे हैं। 

कोरोना संक्रमण जिस तेजी से फैलता जा रहा है, उससे निबटने में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की लाचारी स्पष्ट हो जाने के बाद निजी अस्पतालों को लूट की खुली छूट मिल गई है। इस सबके चलते कोरोना की चपेट में आने वालों और उससे हो रही मौतों के मामले भारत बहुत तेजी से कदम बढ़ाते हुए दुनिया भर के देशों में तीसरे क्रम पर पहुंच गया है। आने वाले दिनों में शीर्ष पर पहुंचना भी लगभग तय है।

इसी सबके बीच पहले मध्य प्रदेश और अब राजस्थान के सियासी ड्रामे से साफ जाहिर हो गया है कि केंद्र सरकार कोरोना नियंत्रण को अपनी प्राथमिकता सूची में नीचे धकेल चुकी है या यूं कहें कि इस भयावह महामारी से निबटना कभी भी उसकी प्राथमिकताओं में शुमार रहा ही नहीं। यही वजह है कि इस वैश्विक महामारी के चलते देश-दुनिया के बाजारों में अभूतपूर्व मंदी है, लेकिन भारत की राजनीतिक मंडी में जनप्रतिनिधियों की खरीद-फरोख्त का कारोबार अबाध गति से जारी है। विधायकों के कीमतों में जबरदस्त उछाल देखने को मिल रहा है। केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व पूरी निर्लज्जता के साथ विपक्षी दलों की राज्य सरकारों को गिराने के खेल में मशगूल है। 

चूंकि सरकार कोरोना नियंत्रण को लेकर अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ चुकी है, इसलिए जनता भी अब संक्रमण के बढ़ते मामलों और उससे होने वाली मौतों के आंकड़ों को शेयर बाजार के सूचकांक के उतार-चढ़ाव की तरह देखने की अभ्यस्त हो रही है। विधायकों और सांसदों की खरीद-फरोख्त का खेल देखने की तो वह बहुत पहले से अभ्यस्त है, सो अभी भी देख रही है।

केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी की प्राथमिकता अब ‘आपदा को अवसर में बदलते’ हुए विपक्ष शासित राज्य सरकारों को अस्थिर करना और कुछ ही महीनों बाद बिहार तथा बंगाल के विधानसभा चुनाव तथा मध्य प्रदेश और गुजरात में विधानसभाओं की कई सीटों के लिए उपचुनाव की तैयारी करना है। इन सभी उपक्रमों का लक्ष्य एक ही है- कांग्रेस या कि विपक्ष मुक्त भारत। भाजपा का यह कोई दबा-छुपा लक्ष्य नहीं है। इसका ऐलान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने छह साल पूर्व अपने पहले कार्यकाल के शुरुआती दौर में ही कर दिया था और इसको अंजाम देने का जिम्मा संभाला था पार्टी अध्यक्ष के रूप में अमित शाह ने। उन्होंने पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद एक नहीं, कई बार सार्वजनिक तौर पर कहा कि हम देश के राजनीतिक नक्शे से कांग्रेस का नामोनिशान मिटा देंगे।

ऐसा नहीं है कि विपक्षी दलों की सरकारों को दलबदल के जरिए गिराने या उन्हें किसी न किसी बहाने बर्खास्त करने का अनैतिक और असंवैधानिक काम कांग्रेस के जमाने में नहीं हुआ हो। कांग्रेस के शासनकाल में भी यह खेल खूब खेला गया। लेकिन भाजपा अपने लक्ष्य को हासिल करने के सिलसिले में जो हथकंडे अपना रही है और जिस तरह तमाम संस्थाओं और एजेंसियों का दुरुपयोग कर रही है, उससे कांग्रेस के मौजूदा नेतृत्व के पूर्वजों द्वारा अपनाए गए सभी तौर तरीकों की ‘चमक’ फीकी पड़ गई है। 

विपक्षी दलों के विधायकों-सांसदों को तोड़ने, विपक्षी सरकारें गिराने और किसी विधानसभा में बहुमत से दूर रहने के बावजूद येन केन प्रकारेण भाजपा की सरकार बनाने पूरा खेल यानी सत्ता के लिए सियासी कैबरे का प्रदर्शन चूंकि अमित शाह के निर्देशन में होता है, लिहाजा मुख्यधारा के मीडिया का एक बड़ा हिस्सा चीयर लीडर्स की भूमिका निभाते हुए बड़े मुदित भाव से उन्हें ‘चाणक्य’ के रूप में प्रचारित करता है और राजनीतिक नंगई के हर आइटम को ‘मास्टर स्ट्रोक’ करार देता है। 

इस सिलसिले में मध्य प्रदेश में पिछले दिनों हुए मंत्रिपरिषद के विस्तार को देखा जा सकता है, जिसमें ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए 14 विधायकों को मंत्री बनाया गया है। ऐसा करके भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने एक तरह से राजस्थान और महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ दलों के विधायकों को स्पष्ट संदेश दिया है कि मंत्री पद चाहिए तो उठाइए बगावत का झंडा और आइए हमारे (भाजपा के) साथ, किसी को निराश नहीं किया जाएगा। 

इस समय भाजपा के निशाने पर राजस्थान की कांग्रेस सरकार है। एक केंद्रीय मंत्री, एक भाजपा नेता और कांग्रेस के एक विधायक की टेलीफोन पर हुई बातचीत के दो ऑडियो टेप सामने आने के बाद अब यह पूरी तरह साफ हो गया है कि वहां कांग्रेस की अशोक गहलोत सरकार के समक्ष पैदा हुआ संकट महज कांग्रेस का अंदरुनी मामला नहीं है, बल्कि उसमें केंद्र सरकार और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की भी अहम भूमिका है। हालांकि ऑडियो टेप की सत्यता अभी प्रमाणित होना है, लेकिन उस टेप की जो बातचीत सामने आई है, उससे स्पष्ट है कि वहां विधायकों की खरीद-फरोख्त के जरिए सरकार गिराने की साजिश रची गई थी। वहां गहलोत सरकार में उप मुख्यमंत्री रहे सचिन पायलट ने अपने समर्थक कुछ विधायकों के साथ जिस तरह बागी तेवर अपनाए, उससे भी जाहिर होता है कि उनकी मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा को भाजपा की ओर से सहलाया गया था। इस सिलसिले में कांग्रेस के विधायकों पर दबाव बनाने और उन्हें डराने के लिए आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय का इस्तेमाल करते हुए जयपुर में कुछ कांग्रेस नेताओं के यहां छापे भी डलवाए गए।

पिछले महीने राज्य सभा चुनाव के पहले भी भाजपा की ओर से राजस्थान में एक अतिरिक्त सीट जीतने के मकसद से इसी तरह कांग्रेस विधायक दल में तोड़-फोड़ की कोशिश की गई थी, जो कि नाकाम रही थी। उस समय कांग्रेस को निर्दलीयों सहित अपने सभी विधायकों को भाजपा से बचाने के लिए जयपुर के एक रिसॉर्ट में ठहराना पड़ा था। तब भी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने आरोप लगाया था कि भाजपा ने कांग्रेस और निर्दलीय विधायकों को 25-25 करोड़ रुपए का ऑफर दिया है। 

हालांकि उस समय भाजपा राजस्थान में तो कांग्रेस के किसी विधायक को नहीं तोड़ पाई थी लेकिन मध्य प्रदेश और गुजरात में वह बड़े पैमाने पर दलबदल कराने में सफल हो गई थी। मध्य प्रदेश में कांग्रेस के 22 विधायक इस्तीफा देकर कांग्रेस में शामिल हो गए थे, जिसकी वजह से कांग्रेस को न सिर्फ राज्य सभा की एक सीट का नुकसान हुआ था, बल्कि उसकी 15 महीने पुरानी सरकार भी गिर गई थी। इसी तरह का खेल गुजरात में भी दोहराया गया था। वहां भी राज्य सभा चुनाव से पहले कांग्रेस के आठ विधायक कांग्रेस से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हो गए थे, जिसकी वजह भाजपा राज्य सभा की एक अतिरिक्त सीट जीतने में सफल हो गई थी। ऐसी ही कोशिश झारखंड में भी की गई थी, लेकिन वहां सफलता नहीं मिली थी। 

मध्य प्रदेश, गुजरात और राजस्थान की घटनाएं तो अभी हाल की हैं। इससे पहले बीते छह सालों के दौरान उत्तराखंड, बिहार, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, गोवा, हरियाणा, महाराष्ट्र और कर्नाटक में भी बड़े पैमाने पर कांग्रेस के विधायकों से दल बदल करा कर सरकारें गिराने-बनाने का खेल खेला जा चुका है। हालांकि महाराष्ट्र में तो बाजी दो दिन में ही पलट गई और भाजपा के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस को इस्तीफा देना पड़ा। ऐसी ही कोशिश सिक्किम में भी की गई थी लेकिन नाकाम रही। फिर भी वहां विधानसभा के चुनाव में खाता न खुल पाने के बावजूद 32 सदस्यीय विधानसभा सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट के 15 में से 10 दस विधायकों से दलबदल कराकर विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल की हैसियत तो भाजपा ने हासिल कर ही ली। इस सिलसिले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस धमकी का उल्लेख करना भी लाजिमी होगा, जो पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान पश्चिम बंगाल की एक चुनावी रैली के मंच से उन्होंने ममता बनर्जी को दी थी। उन्होंने कहा था, ”ममता दीदी, कान खोल कर सुन लो, आपके 40 विधायक मेरे संपर्क में हैं।’’ 

विधायकों की खरीद-फरोख्त के जरिए जहां राज्यों में सरकारें बनाने-गिराने का खेल खेला गया, वहीं राज्यसभा में पहले सबसे बड़ी पार्टी बनने के लिए और फिर बहुमत के नजदीक पहुंचने के लिए विपक्षी दलों के सांसदों से भी इस्तीफा करा कर दल बदल कराया गया और फिर उन्हें उपचुनाव में भाजपा के टिकट पर राज्य सभा में भेजा गया। इस सिलसिले में कांग्रेस ही नहीं बल्कि समाजवादी पार्टी, तेलुगू देशम पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, बीजू जनता दल के सांसदों को भी तोड़ा गया।

कहने की आवश्यकता नहीं कि मोदी-शाह की जोड़ी ने सत्ता में आने के बाद कांग्रेस मुक्त भारत बनाने का जो ऐलान किया था, उस दिशा में उन्होंने बड़े मनोयोग से काम भी किया है। उन्हें स्वाधीनता संग्राम के धर्मनिरपेक्षता जैसे संवैधानिक मूल्य से भले ही नफरत हो और वे जब-तब उसकी खिल्ली उड़ाते हों, मगर शर्म-निरपेक्षता से उन्हें कतई परहेज नहीं है। उनकी राजनीति में शर्म-निरपेक्षता ने एक अनिवार्य मूल्य के रूप में जगह बना ली है। इसी मूल्य के अनुरूप उनके सारे प्रयासों को देखकर यह भी कहा जा सकता है कि वे ‘एक देश-एक पार्टी’ के लक्ष्य को लेकर आगे बढ़ रहे हैं। 

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)



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