जुमले में बदलने के लिए अभिशप्त है बीजेपी का नया घोषणा पत्र

Posted on 09 Apr 2019 -by Watchdog

बीजेपी ने कल अपना बहुप्रतीक्षित मैनिफेस्टो जारी किया। पहले फेज के चुनाव प्रचार की समाप्ति की पूर्व संध्या पर जारी यह मैनिफेस्टो इस हिस्से के मतदाताओं तक कितना पहुंच पाएगा यह सवाल तो है ही। ऊपर से उसमें ऐसा कुछ नहीं है जिससे मतदाता भविष्य की अपनी जिंदगी में किसी परिवर्तन की नई उम्मीद कर सके। दरअसल पूरे मैनिफेस्टो में कोई नई बात नहीं है। न पिछले कार्यकाल की समीक्षा की गयी है और न ही आगे के लिए कोई ठोस वादे किए गए हैं। वादों के नाम पर उसमें कुछ बड़ी-बड़ी बातें जरूर की गयी हैं जो नया जुमला बनने के लिए अभिशप्त हैं। मसलन 2024 तक 2047 में मनाए जाने वाली आजादी के 100वीं वर्षगांठ के लिए नींव रखी जाएगी। यह बात इस तरह से की गयी है जैसे इसके पहले देश बगैर नींव के ही चल रहा था।

मैनिफेस्टो में न तो शिक्षा है न रोजगार की बात है। स्वास्थ्य के नाम पर बीमा कंपनियों को लाभ पहुंचाने का पूरा दस्तावेज है। और पुराने वादे डिब्बे में बंद कर दिए गए हैं।

इस मौके पर पीएम मोदी ने कहा कि राष्ट्रवाद उनका प्रमुख मुद्दा है। पीएम मोदी का राष्ट्रवाद अगर अब जागा है तो उस पर जरूर गौर किया जाना चाहिए। पीएम मोदी अपनी जगह सही हैं। दअरअसल इस देश के भीतर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ते हुए देश के रणबांकुरे जब कुर्बानियां दे रहे थे तब पीएम मोदी के पुरखे न केवल अंग्रेजी हुकूमत की सेवा में लगे हुए थे बल्कि उनके लिए हर तरीके से मुखबिर बने हुए थे। लिहाजा इस जमात का कभी उस राष्ट्रीय चेतना और उसकी भावना से जुड़ाव हो ही नहीं सका। पीएम मोदी जिस राष्ट्रवाद की बात कर रहे हैं वह राष्ट्रवाद सांप्रदायिकता और भेदभाव पर आधारित है। जो जनता को ही आपस में लड़ाने और उसे बांटने की बात करता है। नफरत और घृणा जिसकी बुनियाद है। सही मायने में वह राष्ट्रवाद नहीं बल्कि खंडित राष्ट्रवाद है।

इस बात में कोई शक नहीं कि सांप्रदायिक राष्ट्रवाद की इस जमीन को पुख्ता करने के लिए मैनिफेस्टो में ठोस वादे किए गए हैं। मसलन राम मंदिर एजेंडे में है। कॉमन सिविल कोड का वादा फिर दोहराया गया है। धारा 370 और 35 ए को खत्म करने की बात मैनिफेस्टो में शामिल है। सिटीजनशिप बिल को किसी भी तरीके से पारित कराने की बात कही गयी है।

लेकिन क्या सचमुच में इससे राष्ट्र मजबूत होगा? या फिर उसमें कोई एकता आएगी?  एक परिवार के भीतर भी किसी शख्स की इच्छा के बगैर कोई सामूहिक फैसला नहीं किया जा सकता है। फिर इतने बड़े देश में यह बात कैसे संभव है। यहां तो राज्य के राज्य और कई मामलों में एक तिहाई जनता को दरकिनार कर फैसले लेने की बात की गयी है। धारा 370 महज एक धारा नहीं बल्कि संविधान के भीतर भारत और घाटी को जोड़ने वाला वह पुल है। जिससे दोनों पक्ष जुड़े हुए हैं। अब अगर कोई इस पुल को तोड़ना चाहता है। या फिर उसकी जगह कुछ नया बनाना चाहता है तो यह काम वहां की जनता को विश्वास में लेकर ही किया जा सकता है। लेकिन सच यही है कि हुर्रियत की बात तो छोड़ दीजिए वहां की मुख्यधारा की पार्टियां नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी तक इसके खिलाफ हैं। ऐसे में अगर पूरी घाटी और सारी राजनीतिक पार्टियां इसके खिलाफ खड़ी हो गयीं तो क्या हम कश्मीर को बचा पाएंगे। और फिर सबको नाराज करके बंदूक के बल पर कितने दिनों तक उसे अपने साथ रख सकेंगे?

हमें नहीं भूलना चाहिए कि जिस 35 ए को हटाने की बात की जा रही है उसको खुद वहां के कश्मीरी पंडितों और डोगरा शासकों ने लागू किया था। क्योंकि उन्हें लगता था कि बाहरी लोग बस जाएंगे तो फिर न केवल उनकी संपत्ति का बंटवारा हो जाएगा बल्कि जनसांख्यकीय रूप से भी वो कमजोर हो जाएंगे। 

उत्तर-पूर्व में सिटीजनशिप बिल को लागू करने की कोशिश किस तरह से उस पूरे क्षेत्र के लोगों के अस्तित्व के लिए संकट बन गया है यह पिछले दिनों इसके खिलाफ चले आंदोलनों में देखा जा सकता था। उनको यह बात बिल्कुल साफ-साफ दिखने लगी है कि इस बिल के लागू होने के साथ ही खुद उनके अपने इलाकों में उनके अल्पसंख्यक होने का खतरा पैदा हो जाएगा। इससे न केवल उनकी स्थानीय संस्कृति पर असर पड़ेगा बल्कि उनका पूरा वजूद ही खतरे में पड़ जाएगा। अनायास नहीं नगालैंड से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक में पहली बार चीन में शामिल होने का नारा लगा है। 

और देश के भीतर राम मंदिर और कॉमन सिविल कोड की बात कर समाज के हर हिस्से को असुरक्षित कर देना किस राष्ट्रवाद की पहचान हो सकता है? राष्ट्रवाद तो लोगों को जोड़ने का काम करता है। और अगर कोई जनता की भावनाओं को चोट पहुंचाने, उसके वजूद को खतरे में डालने और हर तरीके से उसे सीमित करने की कोशिश करेगा तो क्या उस हिस्से की भावना देश के साथ जुड़ पाएगी? लिहाजा इसे राष्ट्रवाद तो नहीं बल्कि खंडित राष्ट्रवाद जरूर कहा जा सकता है। पीएम मोदी और उनकी पूरी जमात इस खंडित राष्ट्रवाद के ही प्रतिनिधि बन गए हैं।

और आखिर में बात घोषणा पत्र के संकल्प पत्र होने की बात। जिस शख्स ने देश के संविधान की शपथ लेकर पांच सालों में उसकी धज्जियां उड़ाने का काम किया हो। जिसका हर वादा जुमला बनकर रह गया हो। और जिसकी लागू होने वाली चीजें किसी त्रासदी से कम नहीं रही हों। उसके किसी संकल्प के अब क्या कोई मायने रह जाते हैं? 



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