प्रसिद्ध पत्रकार व कवि चारुचन्द्र चंदोला नहीं रहे

Posted on 19 Aug 2018 -by Watchdog

जगमोहन रौतेला

प्रसिद्ध पत्रकार व कवि चारुचन्द्र चंदोला का कल 18 अगस्त 2018 को देर रात देहरादून के दून अस्पताल में निधन होे गया है . चंदोला जी को मस्तिष्काघात के कारण दून अस्पताल के आईसीयू में एक हफ्ते पहले भर्ती कराया गया था . जहॉ उपचार के दौरान कल देर रात उनका निधन हो गया . चंदोला जी अपने पीछे पत्नी , एक अविवाहिता व एक विवाहिता बेटी को शोकाकुल छोड़ गए हैं . अपनी पत्रकारिता व कविताओं के माध्यम से व्यवस्था की कमियों पर तीखा व सीधा हमला करने वाले चंदोला जी का जन्म 22 सितम्बर 1938 को " दि पाइन्स " , लॉज रोड , मेमयोनगर , म्यॉमार ( पहले का नाम बर्मा ) में हुआ . वे मूल रुप से पौड़ी के कपोलस्यूँ पट्टी के थापली गॉव के थे और पिछले लगभग पॉच दशकों के देहरादून के " गढ़वालायन " , 18/12 - पटेल मार्ग नजदीक पंचायती मंदिर में अपने पैत्रिक आवास में रह रहे थे . उनकी मॉ का नाम राजेश्वरी चंदोला व पिता का नाम रत्नाम्बर दत्त चंदोला था . पिता के बाहर नौकरी में होने के कारण ही उनका जन्म म्यॉमार में हुआ और उनका बचपन मामकोट सुमाड़ी में व्यतीत हुआ . इसी कारण उनकी प्रारम्भिक शिक्षा सुमाड़ी ( पौड़ी गढ़वाल ) के प्राथमिक विद्यालय में हुई . उनके बाद उन्होंने हाई स्कूल पौड़ी के डीएवी कॉलेज से किया . इंटर इलाहाबाद के क्रिश्चियन स्कूल से और स्नातक पुणे के फर्ग्यूसन कॉलेज से किया .

चंदोला जी ने अपनी पत्रकारिता का सफर " टाइम्स ऑफ इंडिया " मुम्बई से शुरु किया . वे बतौर प्रशिक्षु पत्रकार " टाइम्स ऑफ इंडिया " में भर्ती हुए . उसके बाद मुम्बई के " फ्री प्रेस जर्नल " , " पूना हेरल्ड " ( पूना ) , पायनियर , स्वतंत्र भारत , नेशनल हेरल्ड " , अमर उजाला ( मेरठ ) , युगवाणी आदि विभिन्न पत्र - पत्रकाओं के लिए पत्रकारिता की . वे 1966 में देहरादून आ गए थे और पिछले पॉच दशकों से " युगवाणी " अखबार व पत्रिका के समन्वय सम्पादक थे . देहरादून में कविता और साहित्य के पक्ष में एक वातावरण बनाने के लिए उन्होंने कुछ साथियों के साथ मिलकर " पूर्वान्त " नाम की एक संस्था भी बनाई .

उनकी हिन्दी में लिखी गई कविताओं का पहला प्रकाशन हिन्दी की प्रसिद्ध पत्रिका " धर्मयुग " में हुआ था . उनकी कविताएँ " साप्ताहिक हिन्दुस्तान " व " जनसत्ता " में भी प्रकाशित हुई . चंदोला जी ने कुछ समय तक पौड़ी से " हिमवन्त " साप्ताहिक का सम्पादन व प्रकाशन भी किया . उन्होंने एक स्तम्भकार के तौर पर विभिन्न नामों " मन्जुल - मयंक " , " मनभावन " ," यात्रीमित्र " ," कालारक्त " ," अग्निबाण " ," त्रिच " और " सर्गदिदा " उपनामों से तीखे राजनैतिक व सामाजिक व्यंग्य भी लिखे . युगवाणी में " सर्गदिदा " के नाम से लिखे जाने वाला उनका स्तम्भ बहुत ही चर्चित व प्रसिद्ध था . हेमवती नन्दन बहुगुणा विश्वविद्यालय , श्रीनगर ( गढ़वाल ) के बीए के पाठ्यक्रम में उनकी कविताएँ शामिल हैं . उनकी प्रकाशित कविता की पुस्तकों में " कुछ नहीं होगा ", " अच्छी सॉस " ," पौ " , पहाड़ में कविता " ," उगने दो दूब " हैं , उनका गढ़वाली में भी एक कविता संग्रह " बिन्सरि " के नाम से प्रकाशित हुआ . उन्हें पत्रकारिता व कविता में उल्लेखनीय योगदान के लिए " उमेश डोभाल स्मृति सम्मान " , " आदि शंकाराचार्य पत्रकारिता सम्मान " , " जयश्री सम्मान " व " वसन्तश्री " सम्मान भी मिले . पत्रकारिता सम्मान से उन्हें द्वारिका पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरुपानन्द सरस्वती जी ने सम्मानित किया था . 

चंदोला जी की कविताएँ जनसरोकारों से जुड़ी कविताएँ हैं , जिनमें वे सीधे व्यवस्था को ललकारने से भी नहीं हिचके . अपनी कई कविताओं में तो उन्होंने " जन " से सड़ी - गली व्यवस्था के खिलाफ " विद्रोेह " करने तक का आह्वान किया . चंदोला जी ने " युगवाणी " के माध्यम से गढ़वाल में अनेक नवोदित पत्रकारों व कवि को सँवारने और उन्हें एक दिशा देने का काम किया . आधुनिक नई कविताओं को प्रारम्भिक दौर में उन्होंने युगवाणी के माध्यम से ही पाठकों के सामने रखा . तब उनकी इस हिमाकत के लिए हिन्दी साहित्य जगत में उनकी तीखी आलोचना भी हुई . चंदोला जी पर परम्परागत कविता लेखन के स्वरुप को बिगाड़ने के आरोप भी तत्कालीन हिन्दी कवियों ने लगाए . पर हिन्दी कविता को कुछ नया देने की ठान चुके चंदोला जी अपनी आलोचनाओं से विचलित नहीं हुए और उन्होंने युगवाणी में आधुनिक हिन्दी कविताओं का प्रकाशन व कवियों का प्रोत्साहन जारी रखा . हिन्दी की आधुनिक कविताओं के प्रसिद्ध कवि लीलाधर जगूड़ी , मंगलेश डबराल , राजेश सकलानी जैसे बहुत से कवियों को तराशने का काम पहले पहल चंदोला जी ने ही युगवाणी के माध्यम से किया . 

वे एक तरह से नए पत्रकारो , लेखकोंं व कवियों के लिए एक प्रारम्भिक पाठशाला की तरह थे . जहॉ उनके साथ कुछ समय व्यतीत करने वाला नया पत्रकार , रचनाकार कुछ व कुछ सीख कर अवश्य जाता था . अनेक पत्रकार , लेखकों व कवियों के पहले सम्पादक चंदोला जी ही थे . जिनकी रचनाओं , रिपोर्टों , कविताओं , लेखों को सुधार कर उन्होंने छपने लायक बनाया और उन्हें पत्रकारिता व लेखन के लिए प्रोत्साहित करने के लिए " युगवाणी " में प्रकाशित भी किया .

युगवाणी से जुड़े हुए अधिकतर पत्रकार व रचनाकार उन्हें मामू कहते थे . मुझे भी युगवाणी में मामू के साथ लगभग डेढ़ दशक तक काम करने का अवसर मिला . पत्रकारिता में " स्टोरी " कैसी लिखी जानी चाहिए ? और क्यों लिखी जानी चाहिए ? किसी आधार के साथ लिखी जानी चाहिए ? एक स्टोरी को जनसरोकारों से कैसे जोड़ा जा सकता है ? इस पर बहुत कुछ मामू से सीखने का अवसर मिला . अब मामू हमारे बीच नहीं हैं , पर उनकी यादें व उनका महत्वपूर्ण मार्गदर्शन हमेशा हमारे बीच रहेगा .

मामू चारुचन्द्र चंदोला जी को भावपूर्ण अंतिम नमन ! अलविदा मामू !!



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