सीजेआई यौन उत्पीड़न मामला: शिकायतकर्ता ने कहा- ‘हम सब खो चुके हैं, अब कुछ नहीं बचा’

Posted on 13 May 2019 -by Watchdog

और

जिस दिन आपके यौन उत्पीड़न वाली खबर प्रकाश में आई, उसी दिन भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने एक पीठ का गठन किया और दावा किया कि उन पर लगा आरोप भारत के मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय को निष्क्रिय बनाने का षड्यंत्र है. इस मामले में आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या थी?

मैं बस इतना जानती हूं कि मैं किसी षड्यंत्र का हिस्सा नहीं हूं. मैंने अपने शपथपत्र में जो भी कहा है उसके सबूत दिए हैं.

उन्होंने मेरा चरित्र हनन यह कहकर किया है कि मेरी आपराधिक पृष्ठभूमि है. जो मामला 2016 में खत्म हो गया था उसे आधार बना कर मेरे चरित्र पर सवाल उठाया गया. जब यह साबित हो गया कि मुझ पर लगे आरोप आधारहीन हैं तो दूसरा आरोप लगाया गया कि मेरा अनिल अंबानी से कनेक्शन है.

मुझे नहीं पता कि इन बातों का स्रोत क्या है. जब मैंने शपथपत्र दायर किया था तब मुझे एहसास भी नहीं था कि मेरे खिलाफ ऐसी कहानियां गढ़ी जाएंगी.

शपथ पत्र दायर करते वक्त आपको कैसी प्रतिक्रिया की उम्मीद थी?

मुझे लगा था कि वे लोग सच देखेंगे क्योंकि जिस किसी ने भी मेरा शपथपत्र पढ़ा है उसे यह पता चल जाएगा कि मेरे और मेरे परिवार के साथ वास्तव में क्या हुआ था. मुझे लग रहा था कि मुझे न्याय मिलेगा. लेकिन आज आप देख सकते हैं कि इसका क्या परिणाम आया. जांच समिति का कहना है कि मेरे शपथपत्र निराधार है जबकि मैंने पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध कराए थे.

जब मैं कार्यवाही के लिए आई तीन या चार महिला पुलिसकर्मियों ने मेरी तलाशी ली और मेरे साथ आतंकवादियों जैसा व्यवहार किया. उन्होंने मेरी हर चीज की जांच की.

आप हमें जस्टिस एसए बोवडे समिति के बारे में कुछ बताएंगी?

जिस दिन मुझे यह नोटिस मिला था उसी दिन से मैंने उनसे अनुरोध किया था कि मुझे कार्यवाही के दौरान सहयोगी को साथ लेकर आने दिया जाए, मुझे वीडियो रिकॉर्डिंग की अनुमति दी जाए और विशाखा गाइडलाइन्स (दिशानिर्देशों) के तहत कार्यवाही की जाए. उन्होंने यह नहीं किया. उन्होंने बस मेरे जस्टिस रमन्ना वाले अनुरोध पर विचार किया क्योंकि मैं जानती थी कि वह न्यायाधीश गोगोई के अच्छे परिचित हैं. उन्होंने केवल इस बात पर विचार किया. (शिकायतकर्ता के न्यायाधीश रमन्ना के बारे में जांच समिति को लिखने के बाद न्यायाधीश रमन्ना ने मामले से खुद को मुक्त कर लिया. उनके स्थान पर न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा को नियुक्त किया गया.)

मैंने उनसे कहा कि मैं अपने दाएं कान से सुन नहीं पाती हूं और कई बार बाएं कान से भी सुनने में मुझे परेशानी होती है. कार्यवाही के दौरान जब मुझसे पूछा जाता था, “क्या आपको बात समझ में आई?” और मैं कहती थी, “लॉर्डशिप क्या आप इसे दुबारा कहेंगे”. आपको समझना चाहिए कि ऐसा कहते हुए मुझे डर लगता था. मैं कितनी बार दोबारा कहने के लिए कह सकती थी? यह भी एक कारण था कि मैं उनसे सहयोगी व्यक्ति को साथ लेकर आने की मांग कर रही थी. लेकिन उन्होंने इसकी अनुमति नहीं दी.

जब मैं कार्यवाही के लिए आई तीन या चार महिला पुलिसकर्मियों ने मेरी तलाशी ली और मेरे साथ आतंकवादियों जैसा व्यवहार किया. उन्होंने मेरी हर चीज की जांच की, मुझे केश खोलने के लिए कहा, मेरे कपड़ों की तलाशी ली और वह भी बहुत ही रफ तरीके से. मैं रो और चिल्ला रही थी. वृंदा ग्रोवर मैडम के आने के बाद मुझे भीतर ले जाया गया.

कार्यवाही के पहले दिन जजों ने मुझसे कहा, “हम यौन उत्पीड़न समिति और विभागीय तथा इन-हाउस कार्यवाही भी नहीं है. उन्होने कहा, “हम यहां केवल आपकी शिकायत पर काम करने के लिए बैठे हैं”. वह बहुत अनौपचारिक किस्म की कार्यवाही थी.

उन्होंने मुझसे कहा, “हम यह सुनिश्चित करते हैं कि भविष्य में आपको कोई खतरा नहीं होगा”. न्यायाधीश बोवडे ने यह भी पूछा, “क्या आप जानती हैं कि आपकी नौकरी वापस मिल सकती है”. इसके जवाब में मैंने कहा, “नहीं लॉर्डशिप मुझे नौकरी वापस नहीं चाहिए, मुझे न्याय चाहिए. मैं यह सब नौकरी वापस पाने के लिए नहीं कर रही हूं. उस घटना के बाद जिस तरह से मुझे परेशान किया जा रहा है वह रुकना चाहिए”.

मैंने उनसे कहा, “लॉर्डशिप मैं सुप्रीम कोर्ट में अपनी नियुक्ति के दिन से आपको बताना चाहती हूं”. उसके बाद मैंने उन्हें न्यायाधीश गोगोई के बारे में सब कुछ बताया. यह पहले दिन हुआ. मैंने उन्हें पूरी बात बता दी.

उन्होंने मुझसे कहा, “आपको मीडिया से बात नहीं करनी चाहिए. आप जानती हैं कि मीडिया के लोग, कैसे होते हैं?” उन्होंने कहा, “आपको वकीलों से भी बात नहीं करनी चाहिए.” मुझसे यहां तक कहा गया कि मुझे वृंदा मैडम से भी बात नहीं करनी चाहिए”. इसके बाद मुझे 29 अप्रैल को पेश होने के लिए कहा गया.

आपको किसने वकीलों से बात नहीं करने को कहा था?

न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा ने.

उन्होंने ऐसा क्यों कहा?

मुझे नहीं पता. उन्होंने कुछ इस तरह कहा था, “वकील ऐसे ही होते हैं”. पहले दिन सब कुछ बहुत अनौपचारिक था. ऐसा नहीं लग रहा था कि वे लोग वास्तव में इस मामले पर विचार कर रहे हैं. वे लोग तो बस इस मामले को दरकिनार करना चाहते थे ताकि किसी तरह यह मामला खत्म हो जाए.

यह बहुत डरावना और भयानक है. अनजान लोग मेरे रिश्तेदारों के घर आ जा रहे हैं. दो लोग मेरी बहन के घर पहुंच गए थे. उन्होंने कहा कि मेरी हत्या कर दी जाएगी.

जब आपने उनसे कहा कि आपको नौकरी नहीं न्याय चाहिए, तो उनकी क्या प्रतिक्रिया थी?

मुझे ठीक से तो याद नहीं लेकिन मैंने कुछ इस तरह कहा था कि मुझे अपनी नौकरी वापस नहीं चाहिए, मैं चाहती हूं कि 6-7 महीनों से जिस तरह मुझे परेशान किया जा रहा है वह रुक जाए. जस्टिस बोवडे ने कहा, “वह रुक जाएगा आप बेफिक्र रहें.”

आपको क्यों लगता है कि समिति की कार्यवाही अनौपचारिक थी?

ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि वे लोग कह रहे थे कि वह इन-हाउस कार्यवाही भी नहीं है और विभागीय जांच भी नहीं है और न ही वह यौन उत्पीड़न समिति है. तो फिर वह क्या था?

किसने कहा था कि वह इन-हाउस जांच समिति नहीं है?

न्यायधीश बोवडे ने. उन्होंने कहा, “यह इन-हाउस जांच समिति नहीं है. यह यौन उत्पीड़न जांच समिति भी नहीं है. हम सिर्फ आपकी शिकायत पर गौर कर रहे हैं”.

एक बात और, जैसे ही मैंने सुप्रीम कोर्ट गेस्ट हाउस, जहां यह कार्यवाही चल रही थी, से बाहर कदम रखा मेरा और मेरे पति का अनजान लोग बाइक से पीछा करने लगे. 26, 29 और 30 अप्रैल को भी मेरा पीछा किया गया. यह सुबह-सुबह की बात है. मैं बहुत डर गई थी. मैंने तुगलक रोड पुलिस स्टेशन में इस संबंध में शिकायत दर्ज कराई. इस बारे में जस्टिस बोवडे ने कहा था, “आप इतने बड़े परिवार से आती हैं और आपके परिवार के सभी लोग पुलिस में हैं. उनको पता होना चाहिए कि आप की सुरक्षा कैसे की जानी चाहिए”.

जब बोवडे ने यह कहा कि आपके परिवार को आपकी रक्षा करनी चाहिए तब अन्य जजों ने क्या कहा?

उन लोगों ने कुछ नहीं कहा. न्यायाधीश मल्होत्रा ने मुझसे पूछा कि मैं देर से घर क्यों पहुंची थी. मैं तकरीबन आधी रात को घर पहुंची थी. मैंने बताया कि मैं इंतजार में थी कि मोटरबाइक पर मेरा पीछा कर रहे लोग चले जाएं. ठीक इसी समय न्यायाधीश बोवडे ने वह टिप्पणी की थी.

क्या बोवडे इस टिप्पणी से आप को दुख हुआ?

जी हां. मैंने कहा कि मेरे परिवार के सभी लोग पुलिस में हैं तो भी दिल्ली पुलिस मुझे और मेरे परिवार को परेशान कर रही है. वह भी किसी और के इशारे पर.

क्या उन्होंने जवाब दिया?

नहीं.

पहले दिन की कार्यवाही के बाद आपने समिति को एक पत्र लिखा था जिसमें आपने कहां है कि आपको वहां का वातावरण डराने वाला लगा.

पहले दिन तो उन्होंने कहा कि वह यौन उत्पीड़न जांच समिति नहीं है. लेकिन दूसरे दिन उस पत्र को पढ़ने के बाद उनका व्यवहार पूरी तरह से बदल गया. वे लोग बहुत सख्त हो गए और मेरे सवालों और शपथपत्र को लेकर गंभीर हो गए. मैंने यहीं से बात शुरु की. वे पूछने लगे कि यह कैसे हुआ, घटना का वक्त क्या था. लेकिन उनका एक सवाल पर बहुत जोर था, “मैंने यह शिकायत अभी क्यों दर्ज कराई. इतने लंबे अंतराल के बाद”. मैंने जवाब दिया, लेकिन उन्होंने मेरे जवाब पर विचार नहीं किया. उन्होंने कहा, “ऐसा नहीं होता, वैसा नहीं होता”. मैंने दोबारा उन्हें एक पत्र भेजा कि मुझे एक सहयोगी व्यक्ति को साथ लेकर आने दिया जाए क्योंकि मुझे पता नहीं था कि किन बातों को रिकॉर्ड किया जाएगा.

क्या आप हमें तीनों जजों के व्यवहार के बारे में बता सकती हैं?

मुझसे सबसे ज्यादा सवाल न्यायाधीश बोवडे ने किया. न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा ने भी सवाल पूछे लेकिन न्यायाधीश इंदिरा बैनर्जी बहुत ज्यादा सवाल जवाब नहीं कर रही थीं.

क्या आप उनके सामने सहज थीं?

पहले दिन मैं ज्यादा सहज थी क्योंकि वे मुझे शांत करने की कोशिश कर रहे थे. मुझे यह समझाने की कोशिश कर रहे थे कि जो शपथपत्र मैंने दायर किया है उसे इस तरह से दायर नहीं किया जाना चाहिए था. वह लोग पूछ रहे थे कि मैंने जस्टिस गोगोई के खिलाफ शिकायत प्रशांत भूषण सर और वृंदा ग्रोवर मैडम से मिलने के बाद दर्ज कराई है तो उन्होंने यह सारी बातें आपको सुझाई होगीं. यह सही नहीं है. मुझे लगा कि जो कुछ मेरे साथ हुआ है उसके बाद मेरे पास सच को सामने लाने के सिवा कोई विकल्प नहीं है. मुझे समझ में आया कि चुप रहना सही नहीं होगा.

क्या उस कार्यवाही को रिकॉर्ड करने वाला कोई था?

एक व्यक्ति बैठा था जो टाइप कर रहा था. स्टेनोग्राफर नहीं था. मैंने सब कुछ समझाया लेकिन जब मैंने अपनी बात पूरी कर ली तब न्यायाधीश बोवडे टाइपिस्ट से लिखवाने लगे कि मैंने क्या बोला है.

कई बार ऐसा होता है कि आपको कानूनी भाषा समझ में नहीं आती. यह दूसरा कारण था कि मैं अपने साथ कमरे में किसी को ले जाना चाहती थी.

क्या और भी ऐसे सवाल थे जो उन्होंने आपसे पूछे?

उन्हें यह जानने की बड़ी इच्छा थी कि एसएचओ वाला वीडियो किसने बनाया था. वह मैं थी जो यह वीडियो रिकॉर्ड कर रही थी, मात्र अपने बचाव के लिए. क्योंकि मेरे साथ इतना सब कुछ हो चुका था और मैं अब किसी भी तरह का रिस्क नहीं लेना चाहती थी.

उनका दूसरा सवाल था किसके पास एच. के. जुनेजा, मेरी और मेरे पति की बातचीत की रिकॉर्डिंग है. वह रिकॉर्डिंग मेरे फोन में है या पति के. इस तरह के सवाल मुझसे पूछ रहे थे.

क्या आपको विचलित करने वाले सवाल भी पूछे?

उन्होंने मुझसे पूछा कि मैंने नौकरी से निकाले जाने के खिलाफ अपील क्यों नहीं की. मैंने उनसे कहा कि मैं संस्था में वापस आना नहीं चाहती थी. जस्टिस बोवडे ने मुझसे पूछा, “नहीं, नहीं आपको फिर भी अपने निकाले जाने के खिलाफ अपील फाइल करनी थी”. मैंने कहा कि वह अपील यदि भारत के मुख्य न्यायाधीश के पास जाती तो निश्चित तौर पर खारिज कर दी जाती.

जब आप ने जजों को बताया कि 10 और 11 अक्टूबर 2018 को आपको यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ा तो उनकी प्रतिक्रिया क्या थी?

उन्होंने मुझे सुना और केवल एक या दो सवाल पूछे जैसे, वह वाकया किस वक्त हुआ था. मैंने बताया कि यह सुबह 8:30 और 9:00 बजे की बात है.

उसके बाद क्या हुआ?

उन्होंने एक सवाल पूछा कि मैंने 10 अक्टूबर को किस रंग के कपड़े पहने हुए थे. मैंने उन्हें बताया कि मैंने नारंगी और हरे रंग का दुपट्टा पहना था. एक सवाल और था जो मिठाई-प्रसाद से संबंधित था. इस तरह के सवाल पूछे गए.

जब आपने पति को नौकरी से निकाले जाने के बारे में बताया तो क्या हुआ?

उन्होंने मेरे शपथपत्र का उल्लेख किया.

उन्होंने इस बारे में सवाल नहीं पूछे?

उन्होंने केवल एक या दो सवाल पूछे.

सवालों का सिलसिला कितनी देर चला?

मुझे दोपहर 12:30 पर बुलाया था और 4:00 बजे कार्यवाही पूरी हो गई. दूसरे दिन की कार्यवाही शाम 4:30 से 7:30 तक चली.

आपके 30 अप्रैल के पत्र में लिखा है कि मीडिया ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को सवाल भेजे थे लेकिन सेक्रेट्री जनरल ने कोर्ट की तरफ से उन सवालों के जवाब दिए. दूसरी चिंता यह थी कि मुख्य न्यायाधीश ने एक बेंच गठित कर अपने बचाव का प्रस्ताव रखा. जब आपने इस बारे में अपनी बात रखी तो उस पैनल ने क्या कहा?

उन्होंने इसका जवाब नहीं दिया. वे लोग बस मुझे सुनते रहे. वह कोई जवाब नहीं दे रहे थे.

क्या आपने जांच समिति के सामने 20 अप्रैल को गोगोई ने जो सुनवाई के दौरान किया उस बारे में अपनी नाराजगी रखी थी?

जी हां, मैंने उन्हें बता दिया था.

क्या उन लोगों ने आपसे जनवरी की उस घटना के बारे में पूछा जब आप गोगोई की पत्नी से मिली थीं?

जी नहीं, उन्होंने नहीं पूछा.

क्या उन्होंने इस मामले को उठाना चाहा? एफिडेविट के दर्ज होने तक आपने बहुत कुछ सहा था?

मैंने 11 जनवरी को उन्हें बताया कि तिलक मार्ग पुलिस स्टेशन के एसएचओ ने मुझे और मेरे पति को बुलाया था. वह सादे कपड़ों में, अपनी सफेद रंग की स्विफ्ट कार में हमें, न्यायाधीश गोगोई के आवास पर लेकर गया था. सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार दीपक जैन वहां पहले से ही मौजूद थे. एसएचओ ने जैन से संपर्क कर पता किया कि आवास तक कैसे पहुंचना है. श्रीमती गोगोई वहां उपस्थित थीं और उन्होंने मुझे अपने पैरों पर नाक रगड़ने को कहा…

जब आपने समिति के जजों को यह बात बताई तो क्या उन्होंने आपसे कोई सवाल पूछा?

नहीं उन्होंने कोई सवाल नहीं पूछा.

क्या समिति की दो महिला जजों का व्यवहार बोवडे से अलग था?

न्यायधीश इंदिरा बैनर्जी निष्पक्ष थीं. वह ज्यादा सक्रियता नहीं दिखा रहीं थीं. न्यायधीश इंदु मैडम ने जस्टिस बोवडे के सवालों के आधार पर सवाल पूछे. बोवडे ने मेरे विकलांग देवर को काम से निकाले जाने के बारे में सवाल पूछा और न्यायाधीश मल्होत्रा ने यह कहा कि हो सकता है उसे संतोषजनक सेवा न दे पाने की वजह से निकाला गया हो क्योंकि वह प्रोबेशन में था.

आखिरी दिन जब मैं तमाम कार्यवाही से हट जाना चाहती थी तो जस्टिस मल्होत्रा ने पूछा कि मैं ऐसा क्यों करना चाहती हूं, और कहा “तुम अच्छा कर रही हो”. मैंने उनसे कहा, “मैं एक ही बार में सवाल को समझ नहीं पाती हूं और कई बार ऐसा होता है कि मैं सुन नहीं पाती हूं कि बोवडे क्या कह रहे हैं. उन्होंने कहा, “ऐसा नहीं है. आप अच्छी तरह से जवाब दे रही हैं. आप प्रत्येक चीज को जानती हैं. आप अपने शपथपत्र के तथ्यों से अवगत हैं. आप अच्छा कर रहीं हैं तो क्यों शपथपत्र को विड्रॉ करना चाहती हैं”. मैंने उनसे बार-बार अनुरोध किया कि मुझे सहयोग करने के लिए व्यक्ति की आवश्यकता है.

क्या बोवडे या बनर्जी ने विड्रॉ करने पर अपनी प्रतिक्रिया दी थी?

वह चुप रहे और उन्होंने एक कागज पर कुछ लिखकर न्यायाधीश इंदु मैडम को दिया. इंदु मैडम ने कागज पढ़ा और न्यायाधीश बोवडे बाहर चले गए. मैंने न्यायाधीश मल्होत्रा को बताया कि यह केस भारत के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ है जो बहुत शक्तिशाली व्यक्ति हैं.

बोवडे वापस कब आए?

5 मिनट बाद. उन्होंने कहा कि वह वॉशरूम गए थे.

इसके बाद उन्होंने कुछ कहा?

उन्होंने कहा हम आपको इस बारे में सोचने के लिए 5 मिनट देते हैं अन्यथा हम कार्यवाही को एकपक्षीय मान कर चलाएंगे. मैंने कहा ठीक है. मैं जानती थी कि जिस तरह से कार्यवाही की जा रही है और जिस तरह के सवाल पूछे जा रहे हैं, इससे मुझे न्याय नहीं मिलेगा. वह सिर्फ एक ही सवाल पर अटके हुए थे कि मैंने देर से शिकायत क्यों की. मैंने उन्हें संतोषजनक जवाब दिया लेकिन वे बार-बार यही सवाल पूछते रहे. वे कहते रहे कि ऐसा नहीं होता, ऐसा नहीं होता.

क्या आप बीच में ही बाहर आ गईं थी या आपने सवाल-जवाब सत्र के पूरा होने का इंतजार किया?

नहीं, मैंने उन्हें सारे दस्तावेज सौंप दिए क्योंकि दूसरे दिन की सुनवाई में मुझसे 2016 के मामले का सेटलमेंट डीड, जमानत खारिजी आवेदन और अन्य दस्तावेज जैसे मेरा देवर का टर्मिनेशन आदेश लेकर आने को कहा गया था. जो मैंने उन्हें पहले ही दे दिया था.

मैंने वह दस्तावेज उन्हें सौंप दिए. इसके बाद मैंने माननीय न्यायाधीशों से कहा कि मैं सिर्फ एक अनुरोध करना चाहती हूं. मैंने एक पत्र लिखा है. वह पत्र पढ़ने के बाद उन्होंने कहा कि इन-हाउस कार्यवाही के नियमों के तहत वे सहयोग के लिए किसी व्यक्ति को सुनवाई के दौरान उपस्थित रहने नहीं दे सकते. तब मैंने कहा, “माननीय न्यायाधीशों यदि यह बात है तो मैं कार्यवाही जारी नहीं रख सकती”. फिर उन्होंने कहा कि वह मुझे वकील करने की अनुमति नहीं दे सकते. ठीक इसी वक्त न्यायाधीश बोवडे ने कागज पर कुछ लिखा और बाहर चले गए.

एकपक्षीय जांच करने वाले उनके वक्तव्य से क्या आप सहमत हैं?

उन्होंने कहा कि वह मुझे वकील करने की इजाजत नहीं देंगे, जिन चीजों की मांग मैंने अपने पत्र में की है उसकी अनुमति भी मुझे नहीं देंगे. जब मैंने उनसे कहा कि यदि ऐसा है तो मैं इस केस हट जाऊंगी तो उनका कहना था कि वह इसे एकपक्षीय करार दे देंगे. मैंने कहा ठीक है. मेरे 30 अप्रैल के पत्र में इसका उल्लेख है.

क्या आप बता सकती हैं कि इस मामले में किसी और से भी पूछताछ की गई है?

मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं है. मैं बाहर आ गई थी और उसके बाद मुझे नहीं पता कि उन्होंने किसे बुलाया और किसी नहीं बुलाया. उन लोगों ने मुख्य न्यायाधीश को बुलाया है इस बात का पता मुझे समाचार पत्रों से चला.

अपनी रिपोर्ट में समिति ने कहा है कि आपके आरोपों का कोई आधार उन्हें नहीं मिला. जब आप ने यह सुना तो आपको कैसा महसूस हुआ?

मैं पूरी तरह से टूट गई थी, मुझे झटका लगा. मैंने अपनी नौकरी खो दी, मेरा सब कुछ लुट गया, मेरे परिवार के सदस्यों की नौकरी छीन ली गई. मुझे लगा कि मेरे और मेरे परिवार के साथ बहुत बड़ा अन्याय हुआ है. हम सबको इस बात को सुनकर झटका लगा की उनको लगता है कि आरोप निराधार हैं.

मेरी दूसरी याचिकाओं का क्या हुआ? उन्होंने जांच के बारे में कुछ नहीं बताया. मुझे यह नहीं पता कि उन लोगों ने एसएचओ की जांच की या इस वीडियो पर विचार किया या उन लोगों से पूछताछ की जिन लोगों का जिक्र मैंने अपने शपथपत्र में किया है. मुझे कुछ नहीं पता.

जब तक वह मुझे कारण नहीं बताएंगे तब तक मैं आगे कैसे जा सकती हूं? देखिए, मैंने अपना केस सभी के सामने रखा है, सुप्रीम कोर्ट के सभी न्यायाधीशों को अपने मामले से अवगत कराया है. अब उनकी बारी है. रिपोर्ट को पाना मेरा अधिकार है.

क्या आपने उनसे रिपोर्ट की कॉपी मांगी है?

मैंने 7 मई को इस संबंध में पत्र लिखा था.

आप ने बताया कि जब आप सुप्रीम कोर्ट के गेस्ट हाउस में सुनवाई के लिए प्रवेश कर रही थीं तो महिला पुलिस ने आपके साथ बुरा बर्ताव किया. क्या आप इस बारे में हमें विस्तार से बताएंगी?

वह बहुत डरावना था. पहला दिन भयानक था. इसने मुझे तिलक मार्ग पुलिस स्टेशन और तिहाड़ जेल में जो मेरे साथ हुआ था उसकी याद दिला दी. मैं रोने लगी. सच तो यह है कि वहां पर अधिकांश पुलिस अधिकारी तिलक मार्ग पुलिस स्टेशन के थे.

आप इस आशा के साथ सुप्रीम कोर्ट गईं थीं कि वे लोग आपकी शिकायत पर कार्यवाही करेंगे? अब तक उनकी प्रक्रिया से आपको क्या लगता है?

खबरों के मुताबिक न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ ने कहा है कि जांच समिति के सामने मुझे वकील को साथ लेकर जाने दिया जाना चाहिए. उनके अलावा मुझे और किसी के बारे में कुछ नहीं पता.

न्यायपालिका के अन्य हिस्सों से आ रही प्रतिक्रिया के बारे में आपका क्या कहना है?

नहीं, मुझे किसी भी प्रकार की राहत महसूस नहीं हो रही है.

मेरे साथ यहां भी वैसा ही हुआ जैसा विभागीय जांच के समय हुआ था. वहां भी पहले दिन मुझसे अच्छा बर्ताव किया गया था और दूसरे दिन मुझे साफ-साफ कह दिया गया कि मेरे हाथ में तो कुछ नहीं है सब ऊपर से होगा.

आपको लगता है कि यौन उत्पीड़न समिति उसी तरह कार्यवाही कर रही है?

जी हां. पहले दिन मुझे कितनी सारी बातें बताई गईं, यह हो सकता है, वह हो सकता है. दूसरे दिन ऐसा दिखाया गया कि “हमने यह नहीं कहा, आपने गलत समझ लिया था”. उन्होंने विशाखा गाइडलाइन्स या यौन उत्पीड़न कानून जैसे किसी भी नियम का पालन नहीं किया. उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि वह मुझे वकील रखने की अनुमति नहीं देंगे. मैं चाहती थी मेरे साथ कोई हो और इसलिए में कैस से बाहर हो गई.

आपकी शिकायत के मीडिया में आने के बाद क्या आपके पूर्व सहकर्मियों ने आपसे संपर्क किया?

नहीं. वे ऐसा करने की हिम्मत नहीं कर सकते. सच तो यह है कि मेरी हालत देख लेने के बाद कोई भी व्यक्ति सामने नहीं आना चाहेगा.

सुप्रीम कोर्ट कर्मचारी कल्याण संगठन के अध्यक्ष बी. ए. राव, जिनसे आपने बार-बार होने वाले ट्रांसफर के बारे में बात की थी, वह पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने गोगोई के समर्थन में वक्तव्य जारी किया था. क्या उन्होंने आपसे बातचीत की?

यह मैं जानती हूं. मैंने उनका नंबर ब्लॉक कर दिया है.

सुप्रीम कोर्ट ने आप के आरोपों पर सुनवाई करने के लिए एक समिति का गठन किया और एक दूसरी समिति अवकाश प्राप्त जज ए. के. पटनायक की अध्यक्षता में गठित की जो गोगोई के षडयंत्र के आरोपों की जांच करेगी. एरिक्सन के मामले में उद्योगपति अनिल अंबानी के खिलाफ अवमानना के आदेश के साथ छेड़छाड़ करने के मामले में कोर्ट के अधिकारी तपन चक्रवर्ती और मानव शर्मा को गिरफ्तार किया गया था. क्या आप दोनों में से किसी से मिली हैं?

मैं तपन चक्रवर्ती को इसलिए जानती हूं क्योंकि जब आशा सोनी कोर्ट मास्टर हुआ करती थीं तब वह न्यायाधीश गोगोई की कोर्ट में आए थे. आशा सोनी के परिवार में किसी की मृत्यु हो गई थी और श्री तपन चक्रवती उस कोर्ट में आए थे. मैं उन्हें इसी कारण से जानती हूं. मेरी उनसे कोई प्रत्यक्ष बातचीत नहीं है.

आपने दोनों में से किसी से भी सीधी बातचीत नहीं की?

मैं मानव शर्मा को नहीं जानती. मैं उनकी शक्ल तक नहीं पहचानती.

3 मार्च 2019 को आप के खिलाफ दायर एफआईआर में नवीन कुमार नाम के एक शख्स ने दावा किया है कि उसने आपसे मंसाराम के साथ मुलाकात की थी और आपने नौकरी लगाने के लिए उनसे घूस मांगी थी. क्या आप कभी नवीन कुमार या मंसाराम से मिली हैं.

नहीं, मुझे यह भी नहीं पता कि नवीन या मंसाराम कौन हैं. सच तो यह है कि जब मार्च 2019 में इस मामले में मुझे गिरफ्तार करने के लिए तिलक मार्ग पुलिस स्टेशन की टीम राजस्थान आई थी तो उन्होंने भी मुझसे यही सवाल पूछा था कि क्या मैं मंसाराम या नवीन कुमार को जानती हूं. मैंने कहा था मैं नहीं जानती. मुझे कुछ पता नहीं कि वे कौन हैं. मैं उनसे कभी नहीं मिली.

इससे पहले आप न्यायपालिका में काम करना चाहती थीं. क्या आपको इसकी प्रक्रिया में अभी भी विश्वास है?

नहीं, मुझे नहीं लगता. सच तो यह है कि जांच समिति की रिपोर्ट के बाद किसी को भी भरोसा नहीं रहेगा.

आज मैं किसी पर भरोसा नहीं कर सकती. मेरे खिलाफ सब हो गए हैं यह जानते हुए कि मैंने सच बोला है. मेरे साथ सब कुछ गलत हुआ है, पुलिस ने गलत किया है. इसलिए मेरा भरोसा उठ गया है.

शपथपत्र दायर करने से लेकर अब तक आपके साथ क्या गुजरी है?

यह बहुत डरावना और भयानक है. अनजान लोग मेरे रिश्तेदारों के घर आ जा रहे हैं. दो लोग मेरी बहन के घर पहुंच गए थे. वह उत्तर प्रदेश के बहुत छोटे शहर में रहतीं हैं. इन लोगों ने खुद को वकील बताया और मेरे जीजा को बताया कि मैं किसी मामले में फंसी हूं. उन्होंने कहा कि मेरी हत्या कर दी जाएगी. मेरे जीजा ने मेरे भाई को फोन लगाया और उसने मुझे बताया कि क्या चल रहा है.

क्या आपके परिवार के अन्य सदस्यों को भी ऐसी धमकियां मिली हैं?

कुछ लोग राजस्थान मैं मेरे ससुराल वालों के घर गए और हमारे बारे में पूछताछ की.

कौन?

मैं नहीं जानती उन्हें. वे अजनबी लोग थे.

क्या आप उस घर की बात कर रही हैं जहां से मार्च में आप को गिरफ्तार किया था?

जी हां, मैं उसी जगह की बात कर रही हूं. उन्होंने गांव के सरपंच से भी बात की और हमारे बारे में पूछताछ की.

आपने बताया है कि जब आप सुनवाई के लिए जा रही थी तो एक मोटरसाइकिल आपका पीछा कर रही थी. क्या आप हमें बताएंगी कि क्या हुआ था?

पहले दिन की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट गेस्ट हाउस से निकलते वक्त मैं अपने पति और उनके दोस्त के साथ थी. उसने कहा कि कुछ लोग हमारा पीछा कर रहे हैं. मेरे पति ने दो बार कार रोकी और दोनों ही बार इन लोगों ने अपनी बाइक को दूर ही रोक लिया. बाइक का रंग सेना के हरे रंग का था. उस पर दो लोग सवार थे जो हमारा पीछा कर रहे थे.

क्या दोनों दिन एक ही बाइक थी?

नहीं, अलग-अलग बाइकें थीं. दूसरे दिन दो से अधिक लोग थे. जब हमने दोबारा यह जानने के लिए कि लोग हमारा पीछा कर रहे हैं गाड़ी रोकी तो वह लोग भी रुक गए. तो हमें अहसास हुआ कि वे लोग हमारा पीछा कर रहे हैं. मुझे डॉक्टर से मिलने जाना था इसलिए मेरे पति ने अपने दोस्त से कहा था कि वह कार लेकर चला जाए क्योंकि वह मुझे डॉक्टर के पास ले जाएंगे. लेकिन वह उस वक्त भी हमें चैज कर रहे थे. इस बार मेरे पति ने गाड़ी का नंबर कुछ नोट कर लिया.

जब आपके पति के दोस्त कार लेकर चले गए तो उसके बाद आप और आपके पति कैसे गए?

हमने ऑटो कर लिया.

क्या उन लोगों ने आपके ऑटो का भी पीछा किया?

नहीं, वे लोग कार का पीछा कर रहे थे क्योंकि उनको लग कि हम लोग कार में हैं.

दूसरे दिन वहां बहुत सारे लोग थे. जब उन्होंने मुझे कार्यवाही के बाद बाहर आते देखा तो मैंने एक आदमी को यह कहते सुना, “ओए जल्दी आ, जल्दी आ”.

मैंने वृंदा ग्रोवर की जूनियर को यह बात बताई थी जो उस वक्त मेरे साथ थीं. मैंने उन्हें बताया कि कुछ लोग हमारा पीछा कर रहे हैं. अलग-अलग बाइकों पर तीन-चार लोग थे. तो वे हमें गेस्ट हाउस में तैनात पुलिस दल के पास ले गईं. उन लोगों ने हमें सलाह दी कि हम लोग तुगलक रोड पुलिस स्टेशन जाएं और वहां लिखित शिकायत दर्ज कराएं. हमने वहां जाकर अपनी शिकायत दर्ज कराई. जिस वक्त हम वहां पहुंचे वृंदा मैडम भी आ गईं. एसएचओ ने हमसे कहा कि “आपको पहले से ही सुरक्षा दी जा रही है अब आपको किस तरह की सुरक्षा की जरूरत है”.

यही वह समय था जब उन्होंने हमारा पीछा करना बंद कर दिया. शायद वे लोग डर गए थे कि हम लोग पुलिस स्टेशन गए हैं.

तो क्या वह बाइक वाले लोग सुप्रीम कोर्ट गेस्ट हाउस परिसर के अंदर थे?

नहीं. लेकिन जब हम अपने घर से निकलते हैं तो हमें महसूस होता है कि कोई हमारा पीछा कर रहा है. मेरी सास दिल की मरीज हैं. जो कुछ भी मेरे साथ हुआ उसके बाद वह मुझे बिना किसी कारण बाहर जाने नहीं देतीं. मैं केवल अपने पति के साथ घर से निकलती हूं.

आपने समिति को बताया था कि अनुसूचित जाति समुदाय की महिला होने के कारण आपको अपने करियर में यहां तक पहुंचने के लिए संघर्ष करना पड़ा. क्या आप इस बारे में हमें बताएंगी?

जब लोगों को आप की जाति का पता चलता है तो वे आप से दूरी बना लेते हैं और आपका सम्मान नहीं करते. यदि आप अपने काम में अत्यंत दक्ष नहीं हैं तो आप जीवन में आसानी से कुछ नहीं पा सकते. मैंने हमेशा अपनी जातीय पहचान को यह सोच कर अलग रखा कि मैं एक सामान्य इंसान की तरह काम करूंगी.

मैं निजी स्कूल में नहीं पढ़ सकती थी, इसलिए मैंने सरकारी स्कूलों में पढ़ाई की. कई बार आपको अपनी पहचान छुपानी पड़ती है क्योंकि जैसे ही उन्हें आप की जाति का पता चलता है वह आप के साथ अलग तरह का व्यवहार करने लगते हैं.

आमतौर पर लोग आप को बराबरी का नहीं मानते. हमारा समाज ऐसा ही है. 2016 का मामला अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम के तहत आता है. उस औरत ने मुझे जातिवादी गालियां दीं. (न्यायधीश गोगोई विशेष की सुनवाई में महिला के आपराधिक पृष्ठभूमि सबूत के तौर पर इस मामले का उदाहरण दिया था.)

उस महिला ने ऐसा क्या कहा था?

वह फाइल में दर्ज है. उसने कहा था कि हमारी जाति के लोग सिर्फ झाड़ू लगा सकते हैं.

क्या गोगोई को आपकी सामाजिक पृष्ठभूमि का पता था?

वह मुझसे सभी चीजों के बारे में पूछा करते थे.

तो इसका मतलब है कि उन्हें पता था?

वे जानते थे. वह मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में पूछा करते थे. एक दिन उन्होंने मुझसे पूछा था कि मैं कानून की पढ़ाई क्यों कर रही हूं. मैं न्यायिक परीक्षा देने के बारे में सोच रही थी. तब उम्र को लेकर बात चली तो उन्होंने पूछा क्या मुझे आरक्षण मिलता है. उस दिन मैंने उन्हें अपनी जाति के बारे में बताया था.

आपने अपने शपथपत्र में लिखा है कि जब आपको न्यायाधीश गोगोई की पत्नी के सामने माफी मांगने के लिए ले जाया गया तो उन्होंने आपसे कहा था “नाक रगड़ो और जाओ”. आपने कहा है कि तिलक मार्ग पुलिस स्टेशन के एसएचओ नरेश सोलंकी आपको वहां लेकर गए थे और उस वक्त सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार दीपक जैन भी वहां उपस्थित थे. क्या आप उस बातचीत के बारे में बता सकती हैं?

सोलंकी ने मुझे निर्देश दिया था कि मुख्य न्यायाधीश के घर जाने के बाद मैं सॉरी के अलावा एक शब्द भी नहीं बोलूंगी. उसने कहा था, “तुम एक भी सवाल नहीं पूछ सकतीं”. मैं उनसे पूछना चाहती थी कि मैं वहां क्यों लाई गई हूं, जबकि मेरे साथ ही कितना गलत हो रहा है.

मुझे किस तरह से सॉरी कहना है यह ठीक से नहीं बताया गया था. सच तो यह है कि सोलंकी को भी शायद यह नहीं पता था.

वहां श्रीमती गोगोई ने मुझसे कहा, “नाक रगड़ो और जाओ.”

जब सोलंकी के साथ आपकी बातचीत वाला वह वीडियो सामने आया जिसमें वह आपसे माफी वाली घटना के बारे में बात कर रहे हैं तो क्या सोलंकी ने आपसे संपर्क करने की कोशिश की?

सच तो यह है कि वीडियो बाहर आने के बाद ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. जब जमानत के संबंध में कार्यवाही चल रही थी तब हमने उनसे संपर्क किया था यह पूछने के लिए कि “सर आपने कहा था कि माफी मांगने के बाद कुछ नहीं होगा”. तो सोलंकी ने कहा, “मेरा वहां से ट्रांसफर हो गया है. मैं कुछ नहीं कर सकता”.

जब आप पर यह गुजर रही थी तो आपको आपके परिवार का सहयोग मिला?

मैं अपने परिवार की वजह से ही आज जिंदा हूं. नहीं तो जो कुछ भी मेरे साथ हुआ उसके बाद मैं मर गई होती. जब मैं पुलिस हिरासत में थी तब मेरी सास, जो 70 साल की हैं, मेरी बेटी की देखभाल कर रहीं थीं.

नौकरी कर पाना आपके लिए इतना जरूरी है?

मैं एक खिलाड़ी थी. मैं बास्केटबॉल खेला करती थी और तैराकी प्रतियोगिता में भाग लिया करती थी. मैं जहां भी जाती थी अपना शत-प्रतिशत लगाती थी. यहां तक कि न्यायाधीश गोगोई ने मुझे जो काम सौंपा मैंने उसमें अपना 100 प्रतिशत लगाया. कई बार वे कहते थे, “तुम जानती हो, ऐसे बहुत सारे मेरे काम हैं जो मेरे लॉ क्लर्क भी नहीं कर पाते जो तुम मेरे लिए कर रही हो”.

आप को न्यायपालिका में भर्ती होने की प्रेरणा कैसे मिली?

जब मैं निजी क्षेत्र में काम कर रही थी तब मेरी बेटी केवल 6 महीने की थी. वह बीमार रहती थी. मेरे पति ने मुझसे कहा कि वह बस एक प्राइवेट नौकरी है इसलिए उसे छोड़ो और बेटी का ख्याल रखो. उस वक्त मैं अपने निजी जीवन और प्रोफेशनल जीवन को बैलेंस नहीं कर पा रही थी. सुप्रीम कोर्ट के पद के लिए विज्ञापन आया. मेरे पति ने मुझसे कहा यदि तुम सरकारी नौकरी के लिए अप्लाई करना चाहती हो तो करो. इसी एक परीक्षा में मुख्य विषय अंग्रेजी और हिंदी थे जो कठिन नहीं थे. मैंने अप्लाई किया और मुझे जॉब मिल गई.

सुप्रीम कोर्ट में नौकरी लगने के कुछ ही दिनों बाद आपने लॉ स्कूल में दाखिला ले लिया और कानून की पढ़ाई करने लगीं. ऐसा क्यों?

मैंने सोचा कि मैं सुप्रीम कोर्ट में काम कर रही हूं तो मुझे कानून से संबंधित कुछ चीजें जान लेनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट लाइब्रेरी के लोग लॉ की पढ़ाई कर रहे थे और मुझे उनसे प्रेरणा मिली. मैंने सोचा कि मुझे कानून की पढ़ाई करनी चाहिए क्योंकि पढ़ना हमेशा अच्छा होता है चाहे उम्र जो भी हो. मैंने 2015 में विश्वविद्यालय में दाखिला ले लिया.

तो क्या उस वक्त आपको इस क्षेत्र में लंबा करियर बनाने की उम्मीद थी?

जाहिर सी बात है. मैं उस तरह के काम में तब शामिल हो गई जब न्यायधीश गोगोई मुझे पेपर, किताबें और ब्रीफ देने लगे. मुझे लगा मैं भाग्यशाली हूं कि मुझे जस्टिस गोगोई जैसे जज के साथ काम करने का मौका मिल रहा है और मैं इतना कुछ सीख पा रही हूं.

आपने अपने शपथपत्र में लिखा है कि जब नवीन कुमार वाले मामले में आप की जमानत रद्द करने की सिफारिश पुलिस ने की तब आपने तय किया कि आप शपथपत्र दाखिल करेंगी. अपनी बात खुलकर रखने के बारे में कब निर्णय किया?

देखिए मैं एक बेटी की मां हूं इसके बावजूद मुझे जेल भेजा जा रहा था. मेरे जेल जाने के बाद उसकी देखभाल कौन करता. मुझे पता है कि पुलिस को ऐसा करने के निर्देश दिए गए थे. जिस तरह से मुझे गिरफ्तार किया गया और सताया गया उससे यह बात साबित होती है. उन्हें कोई रोकने वाला नहीं था. यदि वह मुझे फिर जेल में डाल देते तो... उस दिन मैंने सोचा जब सब कुछ होना ही है तो क्यों न मैं सच बोलूं. मैंने अपने पति से इस बारे में बात की और हमने तय किया कि हम लोग प्रशांत भूषण और वृंदा ग्रोवर से मिलेंगे.

आपने पहले किस से संपर्क किया?

प्रशांत सर से.

आप प्रशांत भूषण और वृंदा ग्रोवर के संपर्क में कैसे आईं?

मैं प्रशांत सर को जानती थी. मैंने उन्हें सुप्रीम कोर्ट में देखा था, मैंने अपनी सारी कहानी उन्हें बताई. उन्हें मुझे सुना और मुझसे कुछ क्रॉस क्वेश्चन जैसे सवाल पूछे. फिर उन्होंने मेरे दस्तावेजों को देखा. उसके बाद उन्होंने कहा कि वृंदा ग्रोवर ऐसे केसों को देखती हैं. उन्होंने मुझे सुझाव दिया कि मैं उनसे संपर्क करूं. वृंदा मैडम ने जांच की और मेरे दस्तावेजों को चेक किया. पूछा कि यह सब कैसे हुआ. उसके बाद दोनों ने मुझे नैतिक समर्थन दिया. उन्होंने कहा, “हम तुम्हारे साथ खड़े रहेंगे”. इससे पहले तक हमारे साथ कोई नहीं था. आप समझ सकती हैं कि हम किन मुश्किलों से गुजर रहे थे.

आपने कैसे और कब तय किया कि आप शपथपत्र दर्ज करेंगी?

मुझे नहीं पता था कि आगे कैसे जाना है. मुझे बस यह पता था कि मुझे अपना सच सामने लाना है. इस मामले को कैसे आगे ले जाएं, कौन सी प्रक्रिया का पालन किया जाए आदि बातों के लिए हमने प्रशांत भूषण सर और अन्य की सहायता ली.

आपने अपने शपथपत्र में बताया है कि आप को गैरकानूनी तरीके से तिलक मार्ग पुलिस स्टेशन में 10 मार्च 2019 की रात को रखा गया. उस रात पुलिस स्टेशन में रखे जाने का आप पर कैसा असर पड़ा?

वह बहुत डरावनी रात थी. रात के करीब 2 बजे मुझे एसएचओ देवेंद्र कुमार ने गिरफ्तार किया था. वह अपने दल के साथ मुझे गिरफ्तार करने खुद आए थे और उन्होंने मेरी जांघ पर अपने पैर मारे और मुझे गालियां दी. उन्होंने कहा, “मैं तुम्हारी खाल निकाल दूंगा. जज के केबिन में तू क्या करने जाती थी”. उन्होंने बैंच पर मेरा पैर बांध दिया (महिला रोने लगी).

मैं जब भी पुलिस वाले को देखती थी मुझे बड़ा गर्व महसूस होता था. आज मुझे महसूस होता है कि यह लोग उतने ईमानदार नहीं होते जितना मैं सोचा करती थी.

आपको कोर्ट की नौकरी से निकाल दिया गया, आपकी सुनने की क्षमता कमजोर हो गई और आपने बताया कि आप डिप्रेशन से गुजर रही हैं.

आप कह सकते हैं कि मेरी लाइफ पूरी तरह से बदल गई है. यदि मैं अपनी लाइफ की तुलना अक्टूबर से पहले के अपने जीवन से करूं तो वह एकदम अलग है (रोने लगती हैं). मेरा सब कुछ लूट गया. पैसा, मानसिक शांति सब कुछ.

आपके पति और आपके देवरो को भी नौकरियों से निलंबित कर दिया गया है. इसका आपके परिवार पर कैसा असर पड़ा है?

हमारे परिवार के सभी सदस्य तनाव में हैं. इतना सब कुछ हो गया है. वित्तीय परेशानी और मानसिक शांति डिस्टर्ब हो गई है.

हम लोगों को हमेशा डर लगा रहता है कि हमारे साथ क्या होगा और कब होगा. हम कुछ नहीं कह सकते. हमें धमकियां मिल कर रही हैं. अनजान लोग हमें फोन करते हैं और हमारे बारे में पूछते हैं कि मेरे परिवार में कौन क्या करता है. वैसी ही धमकियां जो मेरी बहन के घर पर जा कर दी गई थीं. उससे बोला गया था कि मेरी हत्या हो सकती है. उसे डराया गया था.

अभी आपने बताया कि पुलिस के बारे में आप कैसा महसूस करती हैं. क्या आप चाहेंगी कि आपके पति वापस काम पर जाएं?

हमारे लिए यह आजीविका का साधन है. मेरे पास नौकरी नहीं है इसलिए हम कर भी क्या सकते हैं.

आपने पहले बताया था चुप रहना कोई विकल्प नहीं है. आपको ऐसा क्यों लगता है?

देखिए, हमने अपना सब कुछ खो दिया है. हमारे पास कुछ भी नहीं है. मेरी एक बेटी है और मैं उसके साथ वक्त गुजारना चाहती हूं. यह मैं ही जानती हूं कि मैं कैसे तीन दिन उससे दूर रही (पुलिस हिरासत में). हर बार लोग उससे कहते थे कि “मम्मी अस्पताल में है, वह अस्पताल में भर्ती है”.

जनवरी 2019 में गलत बर्खास्तगी के बारे में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग और दिल्ली महिला आयोग को पत्र लिखे थे?

हमने कई लोगों को पत्र लिखे लेकिन किसी ने भी अब तक कोई एक्शन नहीं लिया है.

एक भी संस्थान ने नहीं?

जी नहीं.

समिति ने अपनी जांच पूरी कर ली है. अब आप क्या करेंगी? क्या आप पुनर्विचार याचिका दायर करेंगी?

जी हां, मैं अपनी बर्खास्तगी के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर करूंगी. मैंने जांच समिति को पत्र लिखकर फाइनल रिपोर्ट की कॉपी मांगी है. अब मैं उनके जवाब का इंतजार कर रही हूं ताकि मैं अगला कदम उठा सकूं. उन्होंने पहले ही कह दिया है कि मेरे आरोप निराधार हैं. अब मैं यह जानना चाहती हूं कि वह ऐसा किन कारणों से कह रहे हैं जबकि मैंने उन्हें सारे साक्ष्य दिए थे. मैंने अपने शपथपत्र में सब कुछ बता दिया है. तो कैसे उन लोगों ने यह तय कर लिया यह मुझे नहीं पता.

अब आपकी मांगे क्या हैं?

वही, जो मैं शुरु से कह रही हूं कि जो मेरे साथ हुआ उसे देखते हुए मुझे न्याय दिलाने के लिए मेरी मदद की जाए. जिन लोगों ने पुलिस कस्टडी में मेरा टॉर्चर किया उन्हें जेल भेजा जाए ताकि वे जान लें कि सताया जाना क्या हो होता है?

इतनी कठिन लड़ाई के लिए आपको प्रेरणा कहां से मिल रही है?

मेरे परिवार के साथ जो गलत किया गया है उसे मैं अब सहन नहीं कर सकती. हमारे खिलाफ झूठे आरोप लगाए गए. क्यों गड़े मुर्दे उखाड़े गए?

जो कुछ भी आपके साथ हुआ उसे कैसे देखते हैं?

ईमानदारी से कहूं तो 11 अक्टूबर के बाद मुझे इस बात का थोड़ा एहसास है कि मैंने क्या किया और क्या नहीं. क्योंकि मैं पूरी तरह से स्तब्ध थी. आपके दिमाग में चलता रहता है कि जो कुछ भी आपके साथ हुआ वह बहुत गलत था फिर भी आप इस अवस्था में नहीं रहते कि आप अपनी बात लोगों से साझा करें. आप दोबारा उसी जगह वापस चले जाते हैं जहां आप जाना नहीं चाहते.

मुझे नींद नहीं आती. अब मैं सो नहीं पाती यह सोच कर कि आगे क्या होगा. मैं जानती हूं कि जस्टिस पटनायक वाली इस दूसरी समिति में भी मेरी कोई भूमिका नहीं होगी. कहानियां इसलिए बनाई जा रही है ताकि लोगों का ध्यान भटकाया जा सके और उन्हें विश्वास दिलाया जा सके कि यह मामला किसी बड़े षड्यंत्र का हिस्सा है. लेकिन ऐसा नहीं है. (



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