इसे चुनाव आयोग की लाचारी कहा जाए या मक्कारी?

Posted on 16 Apr 2019 -by Watchdog

अनिल जैन-

चुनाव आयोग का कहना है कि चुनाव में नेताओं की आपत्तिजनक बयानबाजी पर अंकुश लगाने के लिए उसके पास पर्याप्त अधिकार नहीं है। यह बात आयोग के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कही है। हालांकि अपनी इस लचर दलील के बावजूद आयोग ने चुनावी रैलियों में जाति और धर्म के आधार पर विद्वेष फैलाने वाले भाषण देने पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और सपा नेता आजम खान के लिए 72 घंटे के लिए तथा बसपा अध्यक्ष मायावती और केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी के लिए 48 घंटे तक चुनाव प्रचार करने पर प्रतिबंध लगा दिया है।

मायावती ने गत 7 अप्रैल को उत्तर प्रदेश के देवबंद में एक रैली को संबोधित करते हुए मुस्लिम समुदाय से एकजुट होकर अपने महागठबंधन के पक्ष में मतदान करने की अपील की थी। मायावती की इस अपील के जवाब में योगी आदित्यनाथ ने सपा, बसपा और कांग्रेस को अली की पार्टी बताते हुए बजरंगबली के नाम हिंदुओं से भाजपा को वोट देने के लिए कहा था। आजम खान ने अपने विरोधी नेताओं पर अभद्र टिप्पणी की थी और मेनका गांधी ने चुनाव प्रचार के दौरान मुसलमानों से कहा था कि अगर मुझे वोट नहीं दिया तो फिर मैं देख लूंगी। 

हालांकि चुनाव आयोग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा चुनाव प्रचार के दौरान सेना के नाम का लगातार इस्तेमाल किए जाने और धर्म के आधार वोट देने की अपील करने के मामले का अभी कोई संज्ञान नहीं लिया है, जबकि ये दोनों ही मामले स्पष्ट तौर पर चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के दायरे में आते हैं।

कुछ पूर्व सैन्य अधिकारियों ने तो इस बारे में बाकायदा पत्र लिखकर राष्ट्रपति का भी ध्यान आकर्षित कराया है। इसके बावजूद चुनाव आयोग ने इस मामले का संज्ञान नहीं लिया है। प्रधानमंत्री मोदी इससे पहले भी पिछले वर्षों में कई चुनावों के दौरान आचार संहिता का सरेआम मखौल उड़ाते हुए न सिर्फ अपने विरोधियों पर अभद्र टिप्पणियां करते रहे हैं बल्कि धार्मिक और जातीय ध्रुवीकरण पैदा करने वाले भाषण भी देते रहे हैं। बिहार विधानसभा के चुनाव में उन्होंने अपनी अधिकांश रैलियों में जाति और संप्रदाय के नाम पर वोट लोगों से वोट देने की अपील की थी तो उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने श्मशान बनाम कब्रिस्तान और दिवाली बनाम ईद को मुद्दा बनाया था। गुजरात और कर्नाटक के विधानसभा चुनाव में भी उन्होंने अपनी ज्यादातर रैलियों में धार्मिक और जातीय कार्ड का खुलेआम इस्तेमाल किया।

पिछले दिनों पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के दौरान भी उन्होंने कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी को कांग्रेस पार्टी की विधवा बताने जैसी बेहद निम्न स्तरीय टिप्पणियां की थीं। उनके भाषणों को लेकर इस तरह के अनिगिनत उदाहरण दिए जा सकते हैं। लेकिन याद नहीं आता कि चुनाव आयोग ने उन्हें कभी ऐसा न करने के लिए टोका हो।

बहरहाल,चुनाव आयोग ने जिन चार नेताओं के खिलाफ जो कदम उठाया है वह बिल्कुल उचित तो है, लेकिन चूंकि उसने यह कदम अपनी पहल पर नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट से मिली फटकार के बाद उठाया है,लिहाजा इसके लिए उसकी तारीफ कतई नहीं की जा सकती। चुनाव आयोग तो अपने अधिकार विहीन होने का बहाना बनाकर अभी भी यह कार्रवाई नहीं करता,अगर सुप्रीम कोर्ट ने इन नेताओं के बयानों का स्वत: संज्ञान न लेकर उसे कडी फटकार न लगाई होती।

चुनाव प्रचार के दौरान विद्वेष फैलाने वाले बयान देने या अपने विरोधियों के प्रति बदजुबानी के ये मामले कोई नए नहीं हैं। ऐसे मामले हर चुनाव में सामने आते हैं, लेकिन इस बार के चुनाव में तो मानों ऐसे बयानों का सैलाब उमड रहा है और बात मां-बहन की ठेठ गालियों और विरोधी नेता के अंतर्वस्त्रों के रंग की शिनाख्त तक जा पहुंची है। 

दरअसल इस स्थिति के लिए राजनीतिक दलों का शीर्ष नेतृत्व और उनके दूसरे नेता तो जिम्मेदार हैं ही,चुनाव आयोग को भी इसकी जिम्मेदारी से बरी नहीं किया जा सकता। योगी और मायावती के मामले की सुनवाई के दौरान जब सुप्रीम कोर्ट ने आयोग से जानना चाहा कि उसने इनके खिलाफ अभी तक क्या कार्रवाई की, तो आयोग के वकील ने मासूम दलील दी कि आयोग के पास ऐसे मामलों में सिर्फ नोटिस जारी करने और हिदायत देने के अलावा कोई अधिकार नहीं है।

हैरानी की बात यह भी है कि आयोग के वकील की इस दलील से सुप्रीम कोर्ट ने सहमति भी जता दी। सवाल है कि अगर चुनाव आयोग के पास पर्याप्त अधिकार नहीं हैं तो अतीत में मुख्य चुनाव आयुक्त रहे टीएन शेषन और जेएम लिंगदोह के कार्यकाल में आयोग के पास अधिकार कहां से आ गए थे? क्या वे लोग अपने घर से अधिकार लेकर आए थे? वे चुनावी गड़बड़ियों को रोकने और नेताओं की बदजुबानी पर लगाम कैसे लगाते रहे? क्या वे नियमों और कानून से परे जाकर स्वेच्छाचारी बनकर काम कर रहे थे? अगर वे मनमानी कर रहे थे तो किसी राजनीतिक दल ने उनके कामकाज के तौर-तरीकों को अदालत में कभी चुनौती क्यों नहीं दी?

मुख्य चुनाव आयुक्त के तौर पर शेषन और लिंगदोह के अलावा डॉ. मनोहर सिंह गिल, टीएस कृष्णमूर्ति, और एसवाई कुरैशी ने भी चुनाव आयोग का नेतृत्व करते हुए कमोबेश अपनी जिम्मेदारी को मुस्तैदी से निभाया है। ऐसे में चुनाव आयोग के मौजूदा नेतृत्व की ओर से आई यह दलील बेमानी है कि आयोग के पास पर्याप्त अधिकार नहीं है। 

सवाल यह भी है कि अगर आयोग के पास अधिकार नहीं है तो फिर उसने किस अधिकार के तहत योगी और मायावती के प्रचार करने पर अलग-अलग समयावधि के लिए प्रतिबंध लगाया? और जिस अधिकार के तहत यह कार्रवाई उसने अभी की है वह पहले ही क्यों नहीं की? इस चुनाव में आपत्तिजनक भाषण देने वाले योगी और मायावती ही नहीं हैं,बल्कि बीस से अधिक मामले सामने आ चुके हैं लेकिन आयोग मूकदर्शक बना रहा है। और तो और नमो टीवी के प्रसारण पर रोक लगाने के मामले भी चुनाव आयोग ने काफी हीला-हवाली के बाद रोक लगाने का आदेश जारी किया। हालांकि उसके आदेश के बावजूद भी कई जगह यह चैनल दिखाया जा रहा है,लेकिन आयोग बेखबर बना हुआ है

यह सही है कि आयोग के पास अभी जितने अधिकार हैं,उससे ज्यादा होने चाहिए,लेकिन बात सिर्फ अधिकार से ही नहीं बनती। अधिकार के साथ-साथ चुनाव आयोग के पास ईमानदार इच्छा शक्ति और नैतिक बल का होना भी बेहद जरू री है। अगर ये चीजें नहीं हो तो अधिकार होते हुए भी कोई कुछ नहीं कर सकता और अगर ये दो चीजें हो तो सीमित अधिकारों के तहत भी अपने फर्ज को बेहतर तरीके से अंजाम दिया जा सकता है। टीएन शेषन और जेएम लिंगदोह इस बात को साबित कर गए हैं।



Generic placeholder image


ये सर्वे खतरनाक और किसी बडी साजिश का हिस्सा लगते हैं
20 May 2019 - Watchdog

डर पैदा कर रहे हैं एक्गिट पोल के नतीजे
20 May 2019 - Watchdog

न्यूज़ चैनल भारत के लोकतंत्र को बर्बाद कर चुके हैं
19 May 2019 - Watchdog

प्रधानमंत्री की केदारनाथ यात्रा मतदान प्रभावित करने की साजिश : रवीश कुमार
19 May 2019 - Watchdog

अर्थव्यवस्था मंदी में धकेली जा चुकी है और मोदी नाकटबाजी में मग्न हैं
19 May 2019 - Watchdog

भक्ति के नाम पर अभिनय कर रहे हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
18 May 2019 - Watchdog

चुनाव आयोग में बग़ावत, आयोग की बैठकों में शामिल होने से आयुक्त अशोक ल्वासा का इंकार
18 May 2019 - Watchdog

पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी बिना सवाल-जवाब के लौटे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
17 May 2019 - Watchdog

प्रज्ञा ठाकुर ने नाथूराम गोडसे को बताया 'देशभक्त'
16 May 2019 - Watchdog

प्रज्ञा ठाकुर ने नाथूराम गोडसे को बताया 'देशभक्त'
16 May 2019 - Watchdog

छत्तीसगढ़ की जेलों में बंद चार हजार से ज्यादा आदिवासी जल्द ही होंगे रिहा
15 May 2019 - Watchdog

खराब गोला-बारूद से हो रहे हादसों पर सेना ने जताई चिंता
15 May 2019 - Watchdog

मोदी की रैली के पास पकौड़ा बेचने पर 12 स्टूडेंट हिरासत में लिए
15 May 2019 - Watchdog

भारत माता हो या पिता मगर उसकी डेढ़ करोड़ संतानें वेश्या क्यों हैं ?
14 May 2019 - Watchdog

सुपरफास्ट मोदी: 1988 में अपना पहला ईमेल भेज चुके थे बाल नरेंद्र, जबकि भारत में 1995 में शुरू हुई Email की सुविधा
13 May 2019 - Watchdog

आजाद भारत का पहला आतंकी नाथूराम गोडसे हिंदू था
13 May 2019 - Watchdog

सीजेआई यौन उत्पीड़न मामला: शिकायतकर्ता ने कहा- ‘हम सब खो चुके हैं, अब कुछ नहीं बचा’
13 May 2019 - Watchdog

मोदी सरकार में हुआ 4 लाख करोड़ रुपये का बड़ा घोटाला ?
11 May 2019 - Watchdog

क्या मोदी ने भारत की अर्थव्यवस्था चौपट कर दी है?
11 May 2019 - Watchdog

यौन उत्पीड़न के आरोपों में सीजेआई को क्लीन चिट देने का विरोध, सुप्रीम कोर्ट के बाहर प्रदर्शन
07 May 2019 - Watchdog

यौन उत्पीड़न के आरोपों में सीजेआई को क्लीन चिट देने का विरोध, सुप्रीम कोर्ट के बाहर प्रदर्शन
07 May 2019 - Watchdog

अदालत ने अपने मुखिया की रक्षा में न्याय व्यवस्था पर जनता के विश्वास की हत्या कर डाली
07 May 2019 - Watchdog

मोदी-शाह द्वारा चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के आरोपों पर कल सुप्रीम कोर्ट में होगी सुनवाई
29 Apr 2019 - Watchdog

वाराणसी में मोदी के ख़िलाफ़ खड़े बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव को सपा ने बनाया उम्मीदवार
29 Apr 2019 - Watchdog

मोदी के हेलीकॉप्टर की तलाशी लेने वाला चुनाव अधिकारी निलंबित
18 Apr 2019 - Watchdog

साध्वी प्रज्ञा को प्रत्याशी बना भाजपा देखना चाहती है कि हिंदुओं को कितना नीचे घसीटा जा सकता है
18 Apr 2019 - Watchdog

मोदी पर चुनावी हलफनामे में संपत्ति की जानकारी छिपाने का आरोप, सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर
16 Apr 2019 - Watchdog

इसे चुनाव आयोग की लाचारी कहा जाए या मक्कारी?
16 Apr 2019 - Watchdog

रफाल सौदे के बाद फ्रांस सरकार ने अनिल अंबानी के 1100 करोड़ रुपये के टैक्स माफ़ किए: रिपोर्ट
13 Apr 2019 - Watchdog

पूर्व सेनाध्यक्षों ने लिखा राष्ट्रपति को पत्र, कहा-सेना के इस्तेमाल से बाज आने का राजनीतिक दलों को दें निर्देश
12 Apr 2019 - Watchdog


इसे चुनाव आयोग की लाचारी कहा जाए या मक्कारी?