ईवीएम हैकिंग के दावों पर न तो उत्साहित होने की ज़रूरत है और न तुरंत ख़ारिज करने की

Posted on 22 Jan 2019 -by Watchdog

रवीश कुमार

लंदन के इस प्रेस कॉन्फ्रेंस की पत्रकारों के बीच कई दिनों से चर्चा चल रही थी. इंडियन जर्नलिस्ट एसोसिएशन ( यूरोप) और फॉरेन प्रेस एसोसिएशन ने इस आयोजन के लिए आमंत्रण भेजा था. यह सवाल जायज़ है कि इतने बड़े प्रेस कॉन्फ्रेंस में सबूत भी रखे जाने चाहिए थे. जिनके नहीं होने कारण छेड़खानी वाला हिस्सा कमजोर लगा.

सैयद शुजा को स्काइप के ज़रिए पेश किया गया. शुजा के कई दावे हास्यास्पद बताए जा रहे हैं. मगर जब वो कह रहा है कि उसने या उसकी टीम ने हैक की जा सकने वाली ईवीएम मशीन डिज़ाइन की थी तो उससे आगे की पूछताछ होनी चाहिए.

ईवीएम मशीन को लेकर किसी भी सवाल को मज़ाक का सामना करना ही पड़ता है. कोई नई बात नहीं है. मगर आज की दुनिया में जहां ईवीएम मशीन से चुनाव नहीं होते हैं वहा भी बिग डेटा मैनीपुलेशन से चुनाव अपने पक्ष में मोड़ लेने पर बहस चल रही है. मशीन को लेकर भी और फेक न्यूज़ के ज़रिए भी.

सैयद शुजा ने तकनीकी आधार पर बताया है कि कैसे ईवीएम को हैक किया जा सकता है. जिसे समझने की क्षमता मुझमें तो नहीं है. मैंने अपने शो में भी कहा कि अक्षम हूं. उन दावों को सुन सकता हूं, रिपोर्ट कर सकता हूं मगर सही हैं या नहीं, इसे करीब करीब कहने के लिए कई तरह की जानकारी की ज़रूरत थी.

कई लोग जो तकनीकी समझ रखते हैं उसके इन दावों पर हंस रहे हैं. हो सकता है हंसने वाले सही हो मगर जब बंदा कह रहा है कि मशीन उसने बनाई है तो बात कर लेने में हर्ज़ क्या है?

इसलिए ज़रूरी है कि चुनाव आयोग एक और बार के लिए उसे मौका दे. सबके सामने जैसा चाहता है, जो मांगता है उसे उपलब्ध कराए और कहे कि साबित कर दिखाओ. क्योंकि यह शख्स न सिर्फ मशीन बनाने की बात कर रहा है बल्कि यह भी कह रहा है कि इसकी टीम भारत में है जो हैकिंग को रोकती है और भारत के लोकतंत्र को बचाती है.

अगर ऐसी कोई टीम है और ऐसा कर सकती है तो क्या वो किसी के पक्ष में हैक नहीं कर सकती है? मुझे भी इस बात पर हंसी आई लेकिन बात कहने वाले के जोखिम को देखते हुए हंसी रुक भी गई.

यही नहीं इसकी टीम हैकिंग रोक रही है यानी अभी हैकिंग हो रही है. यह बात बिल्कुल काल्पनिक लग सकती है मगर कोई खुद को सामने लाकर कहे तो मज़ाक उड़ाने के साथ इसकी जांच करने में कोई बुराई नहीं है.

शुजा आकर सबके सामने बताए कि कैसे और किस फ्रीक्वेंसी से डेटा ट्रांसमिट होता है और उसे रोका जाता है. वह खुद सामने आकर कह रहा है कि प्रेस कॉन्फ्रेंस से चार दिन पहले हमला हुआ है. उसकी छाती पर 18 टांके लगे हैं. कोई डॉक्टर बता सकता है कि ऐसी स्थिति में क्या कोई अस्पताल से इतनी जल्दी बाहर हो सकता है?

सैयद शुजा को भाजपा की जीत पर सवाल उठाने वाले शख्स के रूप में बताया जा रहा है. बेशक वह कह रहा है कि 2014 के चुनाव के नतीजे बदल दिए गए मगर वो यह भी कह रहा है कि 12 राजनीतिक दलों ने उससे संपर्क किया था.

यह मज़ाक भी हो सकता है और मज़ाक है तब भी इसकी जांच करनी चाहिए. क्या हमारे देश के सारे दल शुजा को जानते हैं? क्या वे हैक किए जाने की संभावना की तलाश में भटक रहे हैं?

सैयद शुजा ने कांग्रेस, बसपा, सपा के नाम लिए हैं. उसने कहा कि 12 छोटे-बड़े दल संपर्क में थे. सवाल यही था कि क्या ये दल उससे यही काम कराना चाहते थे, जिसके जवाब में कहा कि हां.

तो जनता को जानने का हक है कि ये कौन शख्स है. इसके पास जो जानकारी है, जो तकनीकी क्षमता है, वो क्या है. बात सिर्फ भाजपा की नहीं है, उन 12 दलों की नीयत की भी है. इसे भाजपा की जीत या हार से जोड़ कर देखना ठीक नहीं रहेगा.

चुनाव आयोग ने कहा है कि वह इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में उठाए गए दावों से सहमत नहीं है. फिर भी चुनाव आयोग का विशेष दायित्व बनता है कि अपने तंत्र और मशीन को सवालों से ऊपर करे. चुनाव आय़ोग की हाल की कई भूमिकाओं को लेकर सवाल उठे हैं.

तेलंगाना में बीस लाख मतदाताओं के नाम सूची से बाहर थे. आयोग ने माफी मांग कर किनारे कर लिया जबकि यह गंभीर आरोप था. तो मशीन भले ही संदेह के परे हो, आयोग समय-समय पर संदेह के दायरे में रहा है. टीएन शेषन के पहले चुनाव आयोग की क्या प्रतिष्ठा थी, बताने की क्या ज़रूरत नहीं है.

शुजा की कुछ बातें हास्यास्पद हैं और कुछ गंभीर भी. जैसे उसने ब्रेक्ज़िट को हैक किए जाने की बात कह दी तो पत्रकारों ने कहा कि वहां तो बैलेट पेपर से हुआ था.

गोपीनाथ मुंडे वाला प्रसंग भी नहीं जमा. उनकी बेटी पंकजा भाजपा में हैं. वो अपनी स्वतंत्र जगह बनाना चाहती है. अगर ऐसा होता तो वे इसी को उठाकर अपनी दावेदारी मज़बूत कर सकती थीं क्योंकि गोपीनाथ मुंडे महाराष्ट्र के एक सामाजिक वर्ग के बड़े नेता तो थे ही.

बेशक शुजा जिन अन्य हत्याओं की बात कर रहा है वे डराने वाली हैं. मज़ाक उड़ाने वालों को भी बताना चाहिए कि वे किस आधार पर मज़ाक उड़ा रहे हैं. कोई कह रहा है कि मुझे और मेरे साथियों को गोली लगी है. तो इसका मज़ाक उड़ाना चाहिए या मेडिकल जांच होनी चाहिए?

वह बाकायदा नाम ले रहा है कि हैदराबाद में एक इलाके में एक नेता के गेस्ट हाउस में हत्या हुई थी जिसे बाद में किशन बाग दंगों की आड़ में गायब कर दिया गया. 13 मई 2014 को हत्या हुई थी. वहां मौजूद 13 में से 11 लोग मारे गए थे. कितने लोग उस कमरे में दाखिल हुए थे और गोलियां चलाने वाले कौन थे?

मज़ाक उड़ाने वाले पत्रकारों के पास क्या कोई पुख्ता जानकारी है जो मज़ाक उड़ा रहे है?

सैयद शुजा का कहना है कि अमेरिका आने के बाद जब उसने पता किया तो उसके माता-पिता की हत्या हो गई थी. घर जल गया था. क्या ये बात सही है?

कोई यह कह रहा है कि उसके मां बाप को मार दिया गया. उसकी पत्नी और बच्चे का पता नहीं तो फिर किस बात के लिए मजाक उड़ाया जा रहा है?

क्या उसे आश्वस्त करने के लिए हर तरह के सवाल नहीं पूछे जाने चाहिए? इसमें मज़ाक उड़ाने वाली बात क्या है? वह यह भी कह रहा है कि उसकी टीम के परिवार के किसी सदस्य का पता नहीं.

11 लोग मारे जाते हैं. उनके परिवार वाले मारे जाते हैं. क्या इसकी जांच नहीं होनी चाहिए? वे कौन लोग हैं जो मज़ाक की आड़ में इतने गंभीर सवाल को किनारे कर देना चाहते हैं?

क्या इस देश में कलबुर्गी, पानसरे और गौरी लंकेश की हत्या नहीं हुई है? गौरी लंकेश की हत्या का तार भी जोड़ा गया है. दावा किया है कि गौरी इस रिपोर्ट के बारे में जानकारी जुटा रही थीं मगर उनकी हत्या हो गई.

शुजा ने कमल राव, प्रकाश रेड्डी, राज अयप्पा, अनुश्री दिनकर, श्रीकांत तम्नेरवर, अनिरुद्ध बहल, केशव प्रभु, सैयद मोहीउद्दीन, एजाज़ ख़ान के नाम लिए जिनकी हत्या हुई थी. क्या इन सबको एक कमरे में बुलाकर उड़ा दिया गया था? इसकी विश्वसनीय जांच क्यों नहीं हो सकती है?

इनका और इनके परिवारों और ख़ानदान को ट्रैक क्यों नहीं किया जाना चाहिए? कोई कहे कि मुझे और मेरे साथियों को उड़ा दिया गया है. उनके परिवार को उड़ा दिया गया है तो क्या सभ्य समाज उसकी हंसी उड़ाएगा?

या कहेगा कि अगर ऐसा है तो इसकी जांच होनी चाहिए. जांच करेगा कौन. सीबीआई? अब हंसना शुरू कीजिए आप.

सैयद शुजा बता रहा है कि उसे अमेरिका ने राजनीतिक शरण दी है. उसके लिए उसने कई दस्तावेज़ जमा किए थे. ये सारे दस्तावेज़ हैंकिंग और हैकिंग करने वाली टीम की हत्या से संबंधित हैं. तो यह बात जांच से सामने आ जाएगी. देखा जा सकता है कि उसके दस्तावेज़ क्या हैं.

सैयद शुजा की बातों को लेकर न तो उत्साहित होने की ज़रूरत है और न तुरंत खारिज करने की. जो बातें उसने बताई है उनमें से कुछ ज़रूर अविश्वसनीय लगती हैं मगर कई बातों का वह प्रमाण दे रहा है. ऐसी बातें कह रहा है जिनका पता लगाया जा सकता है. तो फिर इसे जग्गा जासूस का प्लाट कहना उचित रहेगा?

बेशक इस पूरे प्रेस कॉन्फ्रेंस को संदिग्ध करने के लिए कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल की मौजूदगी काफी थी. पत्रकारों की कॉन्फ्रेंस में सिब्बल क्या सोच कर गए. वे एक काबिल वकील रहे हैं. इतनी बातों की तो उन्हें समझ है.

उन्होंने ऐसा क्यों किया जिससे प्रेस कॉन्फ्रेंस संदिग्ध हो जाए? उनके जवाब का इंतज़ार रहेगा लेकिन भाजपा को मौका मिल गया है कि कांग्रेस मोदी को हटाने के लिए कुछ भी कर सकती है.

क्या कांग्रेस भाजपा की आड़ में उन हत्याओं पर हमेशा के लिए पर्दा गिरा दिया जाएगा, जिसे उठाने के लिए सैयद शुजा बाहर आया है?

व्हिसल ब्लोअर की बात पर कोई जल्दी यकीन नहीं करता. क्योंकि वे सामान्य लोगों और पत्रकारों की हदों को पार करते हुए ज्यादा जानकारी जुटा लाते हैं. इसलिए उनके मार दिए जाने के बाद भी ज़माना ध्यान नहीं देता है. इस देश में ऐसी हत्याओं की बात क्या अजूबा है?

इसलिए इस प्रेस कॉन्फ्रेंस को दो हिस्से में देखा जाना चाहिए. एक मशीन को छेड़ने की तकनीक के रूप में. जिस पर टिप्पणी करने की मेरी कोई क्षमता नहीं है. मैं इस पर हंसने वालों के साथ हंस सकता हूं.

मगर दूसरा हिस्सा जो हत्याओं के सिलसिले का है, मैं उस पर नहीं हंसूगा. चाहूंगा कि सब कुछ साफ हो जाए. एक कमरे में 11 लोगों को भून दिया जाए, जो ईवीएम मशीन को छेड़ने की तकनीकी जानकारी रखते हो, यह बात फिल्मी लग सकती है तब भी हंसना नहीं चाहूंगा.

(यह लेख मूल रूप से रवीश कुमार के फेसबुक पेज पर प्रकाशित हुआ है. लेख को आंशिक रूप से संपादित किया गया है.)



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