इलेक्टोरल बॉन्ड ने ‘क्रोनी कैपिटलिज़्म’ को वैध बना दिया: पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त

Posted on 08 Apr 2019 -by Watchdog

नई दिल्ली: केंद्र की मोदी सरकार द्वारा लाए गए इलेक्टोरल बॉन्ड योजना की कठोर आलोचना करते हुए पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने कहा कि इलेक्टोरल बॉन्ड ने ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ (सांठ-गांठ वाले पूंजीवाद) को कानूनी और वैध बना दिया है.

एक इंटरव्यू में कुरैशी ने कहा कि सरकार द्वारा किए गए वादों के उलट ये कदम पूरी तरह से असंगत है. कुरैशी ने कहा कि पहले चुनाव आयोग को ये पता चलता था कि 20,000 रुपये के ऊपर का चंदा किसने और किस पार्टी को दिया है. लेकिन, इलेक्टोरल बॉन्ड की वजह से अब ये जानकारी पूरी नहीं मिलती है. 

मालूम हो कि जनवरी 2018 में भाजपा की अगुवाई वाली एनडीए सरकार द्वारा इलेक्टोरल बॉन्ड योजना लाई गई थी. इसके तहत दानकर्ता अधिकृत बैंकों से बांड खरीद सकता है.

ये बॉन्ड 15 दिन के लिए वैध होते हैं और पात्र राजनीतिक दल इस अवधि में किसी अधिकृत बैंक में बैंक खाते के जरिये इन्हें भुना सकता है. इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए पार्टियों को चंदा वाले व्यक्ति के बारे में पता नहीं चल पाता है.

सरकार का दावा है कि इस योजना का उद्देश्य राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले चंदे में पारदर्शिता लाना है.

हालांकि चुनाव आयोग और कई पूर्व चुनाव आयुक्तों ने इलेक्टोरल बॉन्ड की कड़ी आलोचना की है. हाल ही में चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट ने हलफनामा दायर कर कहा कि इलेक्टोरल बॉन्ड पार्टियों को मिलने वाले चंदे की पारदर्शिता के लिए खतरनाक है.

बता दें कि लोकसभा चुनाव से पहले इलेक्टोरल बॉन्ड की बिक्री में 62 प्रतिशत का जोरदार उछाल आया है. सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत मांगी गई जानकारी से पता चला है कि इलेक्टोरल बॉन्ड की बिक्री पिछले साल की तुलना में करीब 62 प्रतिशत बढ़ गई है. साल 2019 में भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) ने 1,700 करोड़ रुपये से अधिक के इलेक्टोरल बॉन्ड बेचे हैं.

इससे पहले साल 2018 में मार्च, अप्रैल, मई, जुलाई, अक्टूबर और नवंबर के माह में 1,056.73 करोड़ रुपये के बॉन्ड बेचे गए थे.

चुनाव आयोग ने कहा है कि इलेक्टोरल बॉन्ड योजना और कॉरपोरेट फंडिंग को असीमित करने से राजनीतिक दलों के पारदर्शिता/ राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे के पारदर्शिता पहलू पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा.

‘विदेशी योगदान नियमन कानून‘ में संशोधन के केंद्र के फैसले पर, चुनाव आयोग ने कहा कि इससे भारत में राजनीतिक दलों को अनियंत्रित विदेशी फंडिंग की अनुमति मिलेगी और इससे भारतीय नीतियां विदेशी कंपनियों से प्रभावित हो सकती हैं.

चुनाव सुधारों के लिए काम करने वाले गैर सरकारी संगठन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने हाल में इलेक्टोरल बॉन्ड की बिक्री पर रोक की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में अपील की है. माकपा ने एक अलग याचिका में इसे शीर्ष अदालत में चुनौती दी है.



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