स्थाई राजधानी को लेकर भाजपा का दोगलापन एक बार फिर से सामने आया है

Posted on 30 Nov 2018 -by Watchdog

जगमोहन रौतेला 

     उत्तराखण्ड की स्थाई राजधानी को लेकर भाजपा का दोगलापन एक बार फिर से सामने आया है . भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट ने गत 23 नवम्बर 2018 को विधानसभा का शीतकालीन सत्र गैरसैंण की बजाय देहरादून में करने का स्वागत करते हुए कहा कि गैरसैंण में बिना सुविधा के विधानसभा सत्र का आयोजन नहीं करना चाहिए . वहॉ सत्र आयोजित करने की राजनीति अब बंद की जानी चाहिए . भट्ट नहीं पर नहीं रुके , बल्कि यह तक कह दिया कि ऐसा किसी राज्य में नहीं होता कि सरकार सत्र के दौरान सभी को खाना खिलाए . उल्लेखनीय है कि जब भी गैरसैंण में सत्र का आयोजन किया जाता है तो सरकार की ओर से विधायकों , मन्त्रियों , अधिकारियों व कवरेज के लिए पहुँचने वाले मीडिया कर्मियों के लिए खाने की व्यवस्था करनी पड़ती हैं , क्योंकि भराड़ीसैंण में जहॉ विधानसभा सचिवालय बन रहा है , वहॉ खाने के होटलों की पूर्ण व्यवस्था नहीं है . 

     उल्लेखनीय है कि विधानसभा का शीतकालीन सत्र पहले गैरसैंण में आयोजित किए जाने की चर्चा थी . जो अब केवल तीन दिन के लिए 4 दिसम्बर से  6 दिसम्बर 2018 तक देहरादून में हो रहा है .  इसी को आधार बना कर अजय भट्ट ने गैरसैंण में विधानसभा सत्र आयोजित किए जाने का विरोध ही कर डाला . भट्ट के इस बयान के बाद जहॉ भाजपा पर राजनैतिक हमला तेज हो गया है , वहीं सोशल मीडिया में भी भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट की जमकर आलोचना हो रही है . कॉग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह ने भाजपा पर हमला करते हुए कहा कि इससे भाजपा की कथनी और करनी का अन्तर पता चलता है और गैरसैंण को लेकर उसका असली चेहरा सामने आ गया है . वह हमेशा से गैरसैंण को लेकर जनता में भ्रम पैदा करती रही है . इसके विपरीत गैरसैंण को लेकर कॉग्रेस का हमेशा से सकारात्मक रुख रहा है . राज्य आन्दोलनकारियों की भावनाओं के अनुरुप ही कॉग्रेस की प्रदेश सरकार ने गैरसैंण में विधानसभा भवन का निर्माण करवा कर उसे राज्य की राजधानी बनाने की ओर कदम उठाया . जब से भाजपा की सरकार प्रदेश में बनी है , तब से गैरसैंण में विधानसभा भवन के निर्माण और वहॉ दूसरी आधारभूत सुविधाएँ बनाने की गति काफी कम हुई है और अब भाजपा वहॉ विधानसभा सत्र आयोजित करना ही गलत बता रही है .

     गैरसैंण के मामले में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट की परेशानी तब और बढ़ गई , जब गत 26 नवम्बर को मुख्यमन्त्री त्रिवेन्द्र रावत ने एक तरह से भट्ट को नसीहत देते हुए कहा कि सत्र कहॉ करना है और कितने दिन का करना है ? इसका निर्णय सरकार करती है , कोई और नहीं . मुख्यमन्त्री ने कहा कि हमारी सरकार इससे पहले भी दो बार गैरसैंण में विधानसभा के सत्र कर चुकी है . आगे भी परिस्थितियों के अनुसार निर्णय किया जाएगा . इस बारे में बेवजह बयान देने वाले नेता समझदार हैं . सरकार व संगठन से जुड़े लोग बयान देने से पहले एक बार सोचें जरुर !

    यह पहली बार नहीं है कि भाजपा का गैरसैंण को लेकर दोहरापन सामने आया हो . वह कभी गैरसैंण को राज्य की राजधानी बनाने की बात करती है तो कभी कहती है कि उसे ग्रीष्मकालीन राजधानी बनायेंगे . इतने छोटे राज्य में दो - दो राजधानियों की क्या आवश्यकता है ? इसका जवाब आज तक भाजपा नेताओं ने नहीं दिया . यही हाल गैरसैंण को लेकर कॉग्रेस का भी रहा है , आज गैरसैंण पर भाजपा को कोसने वाली कॉग्रेस की पिछली सरकार ने भी इस बारे में हमेशा टालने वाला रवैया ही अपनाया . विजय बहुगुणा ने अपने कार्यकाल में वहॉ विधानसभा भवन का शिलान्यास जरुर किया , लेकिन उनके बाद मुख्यमन्त्री हरीश रावत गैरसैंण में विधानसभा के सत्र तो आयोजित करते रहे , लेकिन वहॉ राजधानी बनाने को लेकर को हमेशा चुप्पी साधे रहे और यह कहते रहे कि पहले वहॉ सुविधाएँ तो होने दीजिए , उसके बाद ही राजधानी को लेकर कोई निर्णय होगा . 

   इन दोनों दलों का रवैया हमेशा से गैरसैंण कोे लेकर विवाद पैदा करने का ही रहा है . अजय भट्ट का ताजा बयान उसी की पुनरावृत्ति है और कुछ नहीं ! 



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