हरीश रावत का " उपवास " गॉधीवाद का भी घोर अपमान है

Posted on 05 Dec 2019 -by Watchdog

जगमोहन रौतेला

     भराड़ीसैंण ( गैरसैंण ) में भारतीय जनता पार्टी की प्रदेश सरकार द्वारा विधानसभा का शीतकालीन सत्र न करवा कर 4 दिसम्बर 2019 से देहरादून में विधानसभा का सत्र करवाया जा रहा है । मुख्यमन्त्री त्रिवेन्द्र रावत द्वारा इसका कारण वहॉ अत्यधिक ठंड होना बताया गया और नेता प्रतिपक्ष डॉ. इंदिरा ह्रदयेश ने भी मुख्यमन्त्री की बात का समर्थन करते हुए देहरादून में शीतकालीन सत्र कराने पर सरकार का समर्थन किया। भराड़ीसैंण ( गैरसैंण ) में विधानसभा का शीतकालीन सत्र न कराए जाने के विरोध में पूर्व मुख्यमन्त्री हरीश रावत ने 4 दिसम्बर 2019 को गैरसैंण के रामलीला मैदान में " तीन घंटे " का उपवास किया । इस कथित उपवास में उनके साथ कॉग्रेस के अनेक बड़े नेता शामिल हुए । जिनमें पूर्व विधायक व महिला कॉग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष सरिता आर्य , पूर्व विधायक गणेश गोदियाल , डॉ. जीतराम , मदन बिष्ट , ललित फर्स्वाण , मनोज तिवारी , डॉ. अनुसूया प्रसाद मैखुरी , पूर्व मन्त्री राजेन्द्र भण्डारी और कॉग्रेस के वरिष्ठ नेता मनीष खण्ड़ूड़ी , किरन बिष्ट , सुरेन्द्र बिष्ट , पृथ्वीपाल चौहान , भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन ( एनएसयूआई ) के प्रदेश अध्यक्ष मोहन भण्डारी , युवक कॉग्रेस के कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष सुमित भुल्लर , कॉग्रेस सेवादल के प्रदेश उपाध्यक्ष रमेश गोस्वामी आदि अनेक नेता शामिल हुए । 

     कभी हल्द्वानी में दो सौ मीटर की पदयात्रा तो अब गैरसैंण में तीन घंटे का उपवास । लगता है कि हरीश रावत ने सत्ता से बाहर हो जाने पर भी जनता व मुद्दों से छल करना नहीं छोड़ा । उनकी इन्हीं हरकतों से पता चलता है कि ये छद्म लड़ाईयॉ जनता के लिए नहीं , बल्कि अपना राजनैतिक अस्तित्व बचाने और कॉग्रेस में अपनी धड़ेबाजी को मजबूत करने के लिए हैं और कुछ नहीं । जनता को मूर्ख समझने का खामियाजा 2017 विधानसभा चुनाव और 2019 लोकसभा चुनाव में भुगत चुके हैं , तब भी भरेब , राजनीतिक चालबाजियों , प्रपंच से बाज नहीं आ रहे हैं ।

    हरीश रावत जी तीन घंटे का उपवास नहीं , धरना होता है । लगता है कि गैरसैंण की " ठंड " से आप भी डर गए । जितनी देर आप " उपवास " में गैरसैंण में अपनी पार्टी के समर्थक नेताओं व कार्यकर्ताओं के साथ बैठे , उतनी देर में तो अगर आप गैरसैंण में जन सम्पर्क करते तो वह भी पूरा नहीं होता । उसमें भी चार - पॉच घंटे से ज्यादा लग जाते । तीन घंटे के लिए किसी एक निश्चित स्थान पर बैठे रहना " उपवास " करना है तो पहाड़ के सैकड़ों लोग हर रोज सड़क किनारे " उपवास " करते हैं , जब उन्हें कहीं जाने के लिए घंटों बस , जीप नहीं मिलती । राज्य में हर रोज सैकड़ों लोग तब भी " उपवास " में होते हैं , जब वे अस्पतालों , क्लिनिकों में डॉक्टर को दिखाने के इंतजार में चार - पॉच - छह घंटे तक बिता देते हैं ।

   आपका यह " उपवास " तो गॉधीवाद का भी घोर अपमान है । गॉधी जी कई - कई दिनों तक नींबू - शहद - पानी के साथ उपवास पर रहते थे । उन्होंने अपने इस तरह के कार्यक्रमों को भी इसी वजह से कभी भी अनशन का नाम नहीं दिया । वे सरकार ( अंग्रेजी सरकार ) का विरोध करते हुए भी कहते थे कि मैं अपने अन्त:करण की शुद्धि और मन की शान्ति के लिए उपवास करता हूँ । गॉधी जी उपवास के दौरान अपने विरोधी ( अंग्रेज सरकार ) के खिलाफ भाषण नहीं देते थे , बल्कि उस दौरान लिखने - पढ़ने का कार्य और ज्यादा करते थे ।

     कॉग्रेस व इस पार्टी में राजनीति करने वाले लोग गॉधी जी पर अपना कापीराइट मानते हैं । किन्हीं और लोगों का गॉधी जी पर बात करना कॉग्रेस को कभी भाया नहीं । इसी वजह से सच्चे गॉधीवादियों से भी कॉग्रेस व उसकी सरकारों को हमेशा चिढ़ रही । यह वर्ष गॉधी जी की 150वीं जयन्ती का भी वर्ष है । कम से कम इस साल तो " तीन घंटे का उपवास " कर के गॉधी जी के उपवास की धज्जियॉ उड़ाने व उसका मजाक बनाने जैसा कार्य " अनजाने " में ही सही , नहीं करते । वैसे आपकी अपनी पार्टी के " उत्तराखण्ड के गॉधी " भी आपके पक्के समर्थक हैं ? क्या उन्होंने भी आपको " उपवास " व धरने में अन्तर नहीं बताया ? ये कैसे " गॉधी " हैं आपकी पार्टी के ? जिन्हें यह तक नहीं पता कि " उपवास " होता क्या है ? इससे साफ होता है कि कितने छद्म वाले हैं आपके संगी - साथी और आपकी पार्टी के उत्तराखण्ड के गॉधी ? ऐसे लोगों को " उत्तराखण्ड का गॉधी " कह कर पुरी दुनिया के लिए आदर्श बन चुके " महात्मा गॉधी " का अपमान तो कम से कम न करना ।

    यह तो भोजन लेने की प्रक्रिया का भी मजाक ही बनाना है । कौन व्यक्ति है जो हर पल कुछ न कुछ खाते हुए चपर - चपर करता रहता है ? चिकित्सा विज्ञान भी सही पाचन के लिए एक बार खाना खाने के बाद कम से कम छह घंटे बाद ही खाना खाने को कहता है । इतनी जल्दी तो मधुमेह के रोगी भी खाना नहीं खाते हैं । जिन्हें थोड़ा - थोड़ा और जल्दी खाने की सलाह डॉक्टर देते हैं । सवेरे आठ बजे नाश्ता करने के बाद दोपहर का भोजन भी लोग लगभग एक - दो बजे के बीच ही दोपहर में करते हैं । तो क्या ऐसे सभी लोग हर रोज पॉच घंटे का उपवास करते हैं ? माननीय पूर्व मुख्यमन्त्री रावत जी अगर ऐसा है तो हर व्यक्ति हर रोज दिन में दो बार उपवास करता है । एक सवेरे नाश्ता कर लेने के बाद दोपहर के भोजन तक और फिर दोपहर का भोजन कर लेने के बाद रात्रि का भोजन करने तक ।

   इस मामले में मीडिया का बचकानापन भी सामने आया है । जिसने बड़े महत्व के साथ इस धरने को " उपवास " कह कर प्रकाशित और प्रसारित किया । किसी ने हरीश रावत जी के इस राजनीतिक " उपवास " पर न तो कोई सवाल उठाया और उनसे इस बारे में सवाल पूछा । ये कौन सी पत्रकारिता कर रहे हो भाई ? सत्ताओं के साथ बने रहना और उससे सवाल न करना तो थोड़ी देर के लिए अब समझ भी आ जाता है , क्योंकि उससे कई काम करवाने भी होते हैं । पर अगर नेताओं से भी सवाल नहीं करोगे तो " पत्रकारिता " कैसे होगी ?

   तीन घंटे का " उपवास " करने की खबर तो अखबारों के हर संस्करण में है , लेकिन उत्तराखण्ड क्रान्ति दल के नेता त्रिवेन्द्र पंवार द्वारा 4 दिसम्बर 2019 को ही अपने साथियों के साथ भराड़ीसैंण ( जहॉ विधानसभा भवन बना है ) में 24 घंटे के " उपवास " की खबर स्थानीय स्तर पर ही अखबारों ने प्रकाशित कर के निपटा दी है। राज्य के दूसरों संस्करणों से यह खबर पूरी तरह से " गायब " कर दी गई है । ऐसा क्यों ? शायद मीडिया के लिए भी कार्यक्रमों व आन्दोलनों का महत्व नहीं है , बल्कि उसके लिए महत्वपूर्ण " नेता " हो गये हैं । पूर्व मुख्यमन्त्री का " तीन घंटे का उपवास " महत्वपूर्ण है , बजाय कि एक क्षेत्रीय पार्टी के 24 घंटे के उपवास से । मु्दा जबकि दोनों का एक ही था । उक्रान्द नेता तो गैरसैंण को राजधानी घोषित करने की भी मॉग कर रहे थे । बेशक " पूर्व मुख्यमन्त्री " पद नाम बड़ा है । मीडिया का इस पद - नाम के प्रति आकर्षित होना सम्भव है , पर क्या आप दूसरे संगठन के कार्यक्रम को  बिल्कुल भी नजरअंदाज कर देंगे ? ***



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