वाम नेतृत्व को अपना खोल पलटने की ज़रूरत है

Posted on 03 Jun 2019 -by Watchdog

अरुण माहेश्वरी-

1996 में, जब ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने के प्रस्ताव को सीपीआई (एम) की केंद्रीय कमेटी ने ठुकरा दिया था, तब से लेकर आज तक के सीपीएम के नेतृत्व ने पार्टी को और पूरे वामपंथ को राजसत्ता के लिये संघर्ष से अलग कर दिया है । इसी नेतृत्व के 2008 में यूपीए सरकार से समर्थन वापस लेने के निर्णय ने 2011 में पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा सरकार के पतन की ज़मीन तैयार की । 1996 और 2008 भारतीय वामपंथ के इतिहास में सर्वनाश के ऐसे बिंदु रहे हैं, जिनकी समीक्षा से मिलने वाली शिक्षा इसीलिये किसी काम की नहीं है क्योंकि वैसे मौक़े फिर कभी आने वाले नहीं हैं । इन फ़ैसलों के लिये ज़िम्मेदार नेतृत्व किसी भी राजनीतिक दल के लिये सिवाय नुक़सान के और कुछ साबित नहीं हो सकता है । यह नेतृत्व वामपंथ के वर्तमान संकट की व्याख्या भी नहीं कर सकता है ।

हम विशेष तौर पर अभी कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास के इन दो नुक़्तों को ही रेखांकित कर रहे हैं क्योंकि जब आपका सत्य ही दांव पर लग जाता हो, यही सवाल उठ जाता हो कि राजसत्ता के विषय में आप गंभीर हैं या नहीं, तब पूरे आंदोलन के घटनाचक्र की पुनरुक्ति के आधार पर विफलता की कोई सैद्धांतिकी हासिल नहीं की जा सकती है । कहा जाता है कि कोई भी दुनिया क्यों न हो, उसका अपना स्वरूप कुछ खास बिंदुओं से ही तय होता है । इसी तर्क पर यह सच है कि पार्टियों की कठिनाइयों का कोई सार्वदेशिक रूप नहीं होता है, जैसे पार्टी के शत्रु के प्रचार का भी एक सार्वदेशिक रूप नहीं होता है। कम्युनिज्म की पूरी लड़ाई ही काल्पनिक है, हमला यहां से भी शुरू होता है । पार्टी की कठिनाइयों को उन्हीं नुक़्तों पर पकड़ा जा सकता है, जिनमें वे किसी महत्वपूर्ण घड़ी में सबसे प्रकट रूप में सामने आती हैं । इसीलिये किन्हीं ख़ास बिंदुओं पर बल देना मूल विषय को किसी समग्रता के बोझ तले दबाने से बचना भी है ।

भूलों की समीक्षाओं से शिक्षा ली जा सकती है । लेकिन इन भूलों की समीक्षा बेकार है । इसीलिये हमने इन्हें सर्वनाश करने वाली भूलें कहा है । सीपीआई(एम) का नेतृत्व भी इन्हें कभी छूने की भी हिम्मत नहीं करता है, क्योंकि ऐसी भूलों के बाद किसी के पास नेतृत्व में रहने का हक़ नहीं रह जाता है । राजनीति में व्यक्ति की सीमित भूमिका से अच्छी तरह से परिचित होने पर भी जब मित्र वाम के आगे के रास्ते पर सवाल करते हैं तो हमारी राय में पुनरुद्धार के पहले बड़े क़दम के तौर पर सारे वामपंथी दलों को एक होने की दिशा में बढ़ना चाहिए । वामपंथ के आत्म-विश्वास का भव्य प्रदर्शन हो । मेहनतकश जनता की शक्ति की कामनाओं का एक मूर्त मायावी रूप । इसके अंदर का जादू तभी बोलेगा जब यह एकता जनता के जनवाद के लक्ष्य के लिये संसद और संसद के बाहर, दोनों स्तरों पर संघर्ष की साफ़ समझ पर टिकी हो । इसके साथ फासीवाद के खिलाफ सभी जनतांत्रिक और धर्म निरपेक्ष ताक़तों की संयुक्त विशाल शक्ति भी प्रकट रूप से जुड़ी हो ।

वाम की शक्ति का व्यापक स्वरूप इसी संयुक्त मोर्चा की कारगर कार्यनीति से संभव है । इस व्यापक मोर्चा के नेतृत्व के बारे में किसी की कोई शर्त नहीं होनी चाहिए । इस समुच्चय में हर किसी का स्थान उसके ऐतिहासिक स्वरूप से तय होगा । सभी जनतांत्रिक ताक़तों के संयुक्त मोर्चे के बीच से ही जनता के जनवाद की लड़ाई का भी नेतृत्व तैयार होना चाहिए । सभी ताक़तों के बीच एक मामले में बिल्कुल स्पष्टता और दृढ़ता होनी चाहिए कि भाजपा को लाभ हो, वैसा मामूली क़दम भी कोई नहीं उठाया जाएगा । आज के समय में किसी भी कार्यनीति का यह एक बुनियादी संदर्भ बिंदु होना चाहिए । इसी से इस मोर्चे की प्रासंगिकता तय होगी । इस मामले में वामपंथी दलों की समन्वित शक्ति पहल के साथ अगर सामने आती है तो भारतीय वाम के अपने गौरवमय अतीत को देखते हुए उसकी ज़बर्दस्त वापसी को कोई रोक नहीं सकता है । इस दिशा में वामपंथी दलों को ही रास्ता बनाना होगा ।

(अरुण माहेश्वरी वरिष्ठ लेखक हैं और आजकल कोलकाता में रहते हैं।)



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