स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में इसी तरह मरती रहेंगी पहाड़ की मेधाएं?

Posted on 07 Oct 2018 -by Watchdog

शंकर सिंह भाटिया

उत्तर प्रदेश के दौर में सन् 2000 से पहले पहाड़ में जो सीमित स्वास्थ्य सुविधाएं मौजूद थी, इन 18 सालों में वह सभी ध्वस्त हो गई हैं। राज्य बनने के बाद पहाड़ के गंभीर मरीजों के लिए एयर अंबुलेंस की बात की जा रही थी, लेकिन आम आदमी की पहुंच से वह भी बाहर ही है। यही वजह है कि गढ़वाल मंडल मुख्यालय पौड़ी में एक संघर्षशील, समाज के लिए समर्पित पत्रकार/लेखक ललित मोहन कोठियाल हृदयघात से करीब तीन-चार घंटे जूझने के बाद इस दुनिया से अलविदा कह गए। यदि उन्हें समय पर स्वास्थ सुविधाएं मिल गई होती तो शायद वह आज हमारे बीच होते। सवाल उठ रहा है कि क्या इसीलिए उत्तराखंड राज्य यही दिन देखने के लिए बनाया गया?

अविवाहित ललित मोहन कोठियाल अपने घर में अकेले रहते थे। बताया जा रहा है कि उन्हें सुबह करीब सात बजे हृदयघात ने आ घेरा। उनके किरायेदार पत्रकार मनोहर चमोली को थोड़ा देर से इसकी भनक लगी। वे उन्हें मंडल मुख्यालय पौड़ी के जिला अस्पताल में लेकर पहुंचे। मंडल मुख्यालय के जिला अस्पताल की हालत इस कदर खराब थी कि उन्हें इस क्रिटिकल हालात में प्राथमिक उपचार देने की स्थिति तक नहीं थी। उन्हें तुरंत श्रीनगर के बेस अस्पताल रेफर कर दिया गया। पौड़ी से श्रीनगर पहुंचने की इस प्रक्रिया में काफी देर हो गई थी। 

इस बीच सुबह करीब दस बजे वरिष्ठ पत्रकार गैरसैंण निवासी पुरुषोत्तम असनोड़ा का फोन आया कि ललित मोहन कोठियाल की हालत हृदयघात से बहुत खराब हो गई है, उन्हें पौड़ी से श्रीनगर ले जाया जा रहा है, यदि उन्हें एयरलिफ्टिंग की सुविधा मिल जाए तो संभव है, उनकी जान बच जाए। मैं देहरादून में हूं शायद सत्ता के करीब हो सकता हूं, इसलिए असनोड़ाजी ने यह सोचकर मुझे फोन किया होगा। उन्हें क्या पता कि मैं सत्ता के करीब फटकता भी नहीं हूं। क्योंकि सवाल एक बेहद गंभीर, संवेदनशील और समाज के लिए समर्पित लेखक, पत्रकार साथी ललित मोहन कोठियाल से जुड़ा था, इसलिए उन्हें बचाने के लिए एयरलिफ्ट की सुविधा जुटाने में मैं जी जान से जुट गया। अन्य पत्रकार साथी भी अपने-अपने स्तर से इस काम में जुटे हुए थे। सबसे पहले मुख्यमंत्री के दरबार में मौजूद मुख्यमंत्री के मीडिया कोआर्डिनेटर दर्शन सिंह रावत को फोन लगाया। कुछ समय के अंतराल में चार बार उन्हें फोन लगाता रहा, लेकिन उनका फोन नहीं उठा। उसके बाद वरिष्ठ मंत्री प्रकाश पंत को फोन लगाया। उन्होंने बताया कि वह मीटिंग में हैं। विधानसभा अध्यक्ष प्रेम अग्रवाल को फोन किया। उन्होंने कहा कि यह शासन का मामला है, फिर भी वह कोशिश करेंगे। मंत्रिमंडल में और भी कई मंत्री थे, जो मुझे जानते थे, लेकिन इस हड़बड़ाहट में किसी को फोन लगाने की याद ही नहीं रही। तब मुख्यमंत्री के औद्योगिक सलाहकार केएस पंवार को फोन लगाया। इंवेस्टर समिट में व्यस्त होने के बाद भी उन्होंने न केवल फोन उठाया, बल्कि संवेदनशील होकर हेलीकाप्टर की व्यवस्था भी की। 

उन्होंने बताया कि इस संबंध में उनकी अपर मुख्य सचिव ओमप्रकाश से बात हुई है। डाक्टर यदि उन्हें देहरादून रेफर करते हैं तो वे एयरअंबुलेंस भेज देंगे। यह प्रक्रिया चल ही रही थी कि श्रीनगर से साथियों से सूचना मिली कि ललित मोहन कोठियाल हमारे बीच नहीं रहे। इस सूचना ने दिल को बहुत अधिक व्यथित कर दिया। तथ्यपरक लेखन और संवेदनाओं को छूने वाली कोठियालजी की लेखनी का मैं कायल रहा हूं। वे न केवल एक वरिष्ठ पत्रकार थे, बल्कि एतिहासिक मुद्दों पर पुस्तकों के लेखन में उनका कोई सानी नहीं था। लेखन के साथ सामाजिक कार्यों से भी उनका बहुत गहरा जुड़ा रहा। मैं उनके व्यक्तिगत जीवन के बारे में बहुत नहीं जानता था, संभवतः अविवाहित रहने की वजह से उनके जीवन की संपूर्ण ऊर्जा तथ्यपरक लेखन, सामाजिक कार्यों से जुड़ाव और दूसरों की मदद करना था। यही उनका पेशन था। हाल ही में लेखन को लेकर वे पूर्वोत्तर राज्यों का दौरा कर लौटे थे। उत्तराखंड के छोटे-बड़े शहरों-कस्बों के बारे में वह संकल जुटा रहे थे। उमेश डोभाल ट्रस्ट की गतिविधियों से वे बहुत करीब से जुटे हुए थे। 

एक ऐसे व्यक्ति का अल्पायु में ही स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में इस दुनिया से चला जाना कई प्रश्न खड़े करता है। अभी हाल ही में पूर्व मंत्री केदार सिंह फोनिया को भी दौरा पड़ा था। जोशीमठ में सेना द्वारा समय पर एयरलिफ्ट कर उन्हें हिमालयन अस्पताल देहरादून पहुंचा दिया गया था, जिससे 90 वर्ष से अधिक की आयु में फोनियाजी का न केवल जीवन बच गया, बल्कि दौरा पड़ने के बाद शरीर के पैरालाइज होने के जो साइड इफेक्ट पड़ते हैं, उनसे भी वे बच गए थे। यदि पहाड़ के आम व्यक्ति को भी दौरा पड़ने पर एयरलिफ्ट की यह सुविधा मिल जाती तो कोठियालजी तीन-चार घंटे पौड़ी-श्रीनगर के बीच झूलने के बजाय देहरादून पहुंचकर स्वास्थ्य सुविधाएं ले पाते, संभवतः वह आज हमारे बीच होते। ऐसी किसी सुविधा के अभाव में उत्तराखंड के वह भी पहाड़ के साधारण पत्रकार अपने स्तर पर उन्हें एयरलिफ्ट करने के लिए सरकारी तंत्र के आगे अपने-अपने स्तर पर नाक रगड़ रहे थे, जब तक उन्हें लिफ्ट किया जाता, वह हमारे बीच से उठ गए। 

इतना ही नहीं संकट उन्हें देहरादून लाकर किसी अस्पताल में रखने का भी था। निजी बड़े अस्पताल एडवांस में फीस जमा किए बिना मरीज पर हाथ तक नहीं डालते। कोठियालजी भी आर्थिक रूप से कमजोर पत्रकार ही थे, न ही वे मान्यता प्राप्त पत्रकार थे, जिनको सरकार से कुछ सुविधाएं अनुमन्य होती हैं। इसके लिए सूचना विभाग में अपर निदेशक अनिल चंदोला से संपर्क करने का प्रयास किया। दूसरे एटेम्प्ट में उन्होंने फोन उठाया। उन्होंने भी मुख्यमंत्री के स्टाफ से फोन कर व्यवस्था करने का आश्वासन दिया। विडंबना देखिये पौड़ी निवासी संघर्षशील लेखकर पत्रकार ललित मोहन कोठियाल को देहरादून लाया जाएगा तो अस्पताल का खर्च कहां से आएगा? यह सवाल उठने लगा था। मान्यता न होने के कारण सरकारी सुविधा मिलने में भी दिक्कत हो सकती थी। पहाड़ में ललित मोहन कोठियाल जैसे कितने पत्रकार हैं, जिन्हें मान्यता नहीं मिली है। लेकिन देहरादून में कोई भी दलाल आकर पत्रकार की मान्यता ले लेता है। देहरादून में राज्य स्तरीय तथा जिला स्तरीय मान्यता प्राप्त पत्रकारों की संख्या पांच सौ से अधिक है, जबकि नैनीताल समेत दस पर्वतीय जिलों सिर्फ 196 मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। ऐसा नहीं कि पहाड़ में पत्रकार नहीं हैं, देहरादून में कोई दलाल किस्म का पत्रकार पहुंच लगाकर मान्यता ले लेता है, पहाड़ के पत्रकारों को कठोर मानकों से गुजरना पड़ता है। यही वजह है कि एक जिले देहरादून में पांच सौ से अधिक मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं तो रुद्रप्रयाग जिले में छह और चंपावत में सिर्फ पांच मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 

सवाल उठता है कि क्या उत्तराखंड इसीलिए बनाया गया था? जहां तक हम समझते हैं, पहाड़ की दुरूह भौगोलिक स्थिति, विकास का अभाव, शिक्षा, स्वास्थ्य के अभाव को दूर करने के लिए उत्तराखंड राज्य के औचित्य को स्वीकार किया गया था। लेकिन उत्तराखंड की सरकारें जानबूझकर इस औचित्य को नकार रही हैं। उत्तराखंड को मिलने वाली सारी सुविधाएं देहरादून, हरिद्वार, उधमसिंह नगर में जुटा रही हैं, इस हालत में पहाड़ का आदमी इन्हीं स्थितियों में मरने के लिए छोड़ दिया गया है। कई लोगों को हमने सुना है कि पहाड़ में स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में अपने को मरने के लिए छोड़ने से बेहतर है कि वहां से पलायन कर लिया जाए। क्या सरकार इस सच्चाई से अनविज्ञ है? या फिर सबकुछ जानकार भी वह पहाड़ को नजरंदाज कर रही है? इन हालात में पलायन आयोग बनाकर पलायन रोकने की बात करना सिर्फ सरकार का नाटक नहीं लगता?



ललित मोहन कोठियाल को दी अंतिम विदाई

Posted on 09 Oct 2018 -by Watchdog

श्रीनगर। श्रीनगर के घाट पर ललित मोहन कोठियाल को अंतिम विदाई दी गई। इस दौरान श्रीनगर, पौड़ी से लेकर पहाड़ के विभिन्न स्थानों से लेखक, पत्रकार एकत्रित हुए। 

ललित मोहन कोठियाल की असमय मौत तथा उन्हें समय पर चिकित्सा सुविधा न मिल पाने का मलाल सभी के मन में था। एक सहज और सरल व्यक्तित्व, हमेशा पहाड़ की सुविधाओं खासकर मंडल मुख्यालय पौड़ी के उजड़ते स्वरूप से खिन्न होकर संघर्ष के लिए तैयार रहने वाली संघर्षशील व्यक्ति का इस कदर चला जाना सभी को अखर गया।



Generic placeholder image


नहीं रहे वृक्ष मानव विश्वेश्वर दत्त सकलानी
19 Jan 2019 - Watchdog

मास्टर ऑफ रोस्टर अब मास्टर ऑफ कॉलेजियम भी बन गए हैं
19 Jan 2019 - Watchdog

जेएनयू मामला: कोर्ट ने लगाई दिल्ली पुलिस को फटकार
19 Jan 2019 - Watchdog

हम भ्रष्टाचार नही करेंगे, तो लोकपाल की क्या ज़रूरत है.-मुख्यमंत्री
18 Jan 2019 - Watchdog

द कारवां की स्टोरी ने अजित डोभाल के राष्ट्रवाद को नंगा कर दिया है!
18 Jan 2019 - Watchdog

नरेंद्र मोदी ने 36 रफाल विमानों का सौदा 41 प्रतिशत अधिक कीमत पर किया
18 Jan 2019 - Watchdog

मोदी सरकार की नौ फीसदी सस्ते दर पर रफाल खरीदने की बात असल में झांसा है
18 Jan 2019 - Watchdog

लोकपाल पर सर्च कमेटी फरवरी अंत तक नाम की सिफारिश करे: सुप्रीम कोर्ट
17 Jan 2019 - Watchdog

जुलाई माह तक प्रदेश के गांवों को इंटरनेट से कवर कर दिया जाएगा: सीएम
17 Jan 2019 - Watchdog

तेल्तुंबडे की गिरफ्तारी इतिहास का सबसे शर्मनाक और चकित कर देने वाला क्षण होगा: अरुंधति
17 Jan 2019 - Watchdog

राष्‍ट्रीय सुरक्षा सलाहकार डोभाल के बेटों की ‘फर्जी’ कंपनियों का जाल
16 Jan 2019 - Watchdog

एनएसए डोभाल के बेटे का मिला विदेशों में काले धन का कारख़ाना
16 Jan 2019 - Watchdog

जज लोया मामले में बांबे हाईकोर्ट ने मांगा याचिकाकर्ता से पूरा विवरण
15 Jan 2019 - Watchdog

उत्तराखंड में अनाथ बच्चों को सरकारी नौकरियों में 5 प्रतिशत आरक्षण
12 Jan 2019 - Watchdog

बीजेपी नेता के ठिकानों पर दून समेत अन्य शहरों में इनकम टैक्स के छापे
12 Jan 2019 - Watchdog

सीवीसी जांच की निगरानी करने वाले पूर्व जज ने कहा, आलोक वर्मा के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के सबूत नहीं
12 Jan 2019 - Watchdog

सपा-बसपा के बीच गठबंधन, उत्तर प्रदेश में 38-38 सीटों पर लड़ेंगे चुनाव
12 Jan 2019 - Watchdog

पूर्व सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा ने इस्तीफ़ा दिया
11 Jan 2019 - Watchdog

सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा आरक्षण बिल का मामला, NGO ने कहा- आर्थिक आधार पर आरक्षण नहीं दे सकते
10 Jan 2019 - Watchdog

सामान्य वर्ग को आरक्षण एक अव्यवस्थित सोच, गंभीर राजनीतिक-आर्थिक प्रभाव हो सकते हैं: अमर्त्य सेन
10 Jan 2019 - Watchdog

सामान्य वर्ग को आरक्षण सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ : जस्टिस एएम अहमदी
09 Jan 2019 - Watchdog

श्रमिक संगठनों के हड़ताल का देशव्यापी असर
09 Jan 2019 - Watchdog

दुविधा में दोनों गए, माया मिली न राम !
08 Jan 2019 - Watchdog

सुप्रीम कोर्ट में केंद्र को तगड़ा झटका, आलोक वर्मा सीबीआई चीफ के पद पर फिर से बहाल
08 Jan 2019 - Watchdog

सुप्रीम कोर्ट ने मोदी सरकार से कहा, हलफनामा दायर कर बताएं कि लोकपाल नियुक्ति के लिए क्या किया
07 Jan 2019 - Watchdog

सवर्णों को सरकारी नौकरी और शिक्षण संस्थानों में मिलेगा 10 फीसदी आरक्षण
07 Jan 2019 - Watchdog

भारत में पैर पसारता पॉर्न कारोबार
05 Jan 2019 - Watchdog

सावित्री बाई फुले: जिन्होंने औरतों को ही नहीं, मर्दों को भी उनकी जड़ता और मूर्खता से आज़ाद किया
04 Jan 2019 - Watchdog

सप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले की सुनवाई 10 जनवरी तक के लिए टाली
04 Jan 2019 - Watchdog

केरल की दो महिलाओं ने सबरीमला मंदिर में प्रवेश किया
02 Jan 2019 - Watchdog


स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में इसी तरह मरती रहेंगी पहाड़ की मेधाएं? ललित मोहन कोठियाल को दी अंतिम विदाई