जम्मू-कश्मीर: दलित आरक्षण पर मोदी-शाह ने बोला सफ़ेद झूठ, सच्चाई जानकर आप दंग रह जाएंगे

Posted on 12 Aug 2019 -by Watchdog

 दिलीप ख़ान 

“आप ये जानकर चौंक जाएंगे कि जम्मू-कश्मीर में दशकों से हज़ारों-लाखों की तादाद में ऐसे भाई-बहन रहते हैं, जिन्हें लोकसभा के चुनाव में..उसमें तो वोट डालने का अधिकार था, लेकिन वो विधानसभा और वहां की पंचायत या वहां की नगरपालिका या वहां की महानगरपालिका में ना तो चुनाव में मतदान कर सकते थे और ना ही चुनाव लड़ सकते थे. ये वो लोग हैं जो 1947 में बंटवारे के बाद पाकिस्तान से भारत आए थे. हिंदुस्तान के अन्य राज्यों में उनको सब अधिकार है. अकेले जम्मू-कश्मीर में नहीं है. क्या इन लोगों के साथ अन्याय ऐसे ही चलता रहता?”

नरेन्द्र मोदी, प्रधानमंत्री, 8 अगस्त 2018, रात 8:19 बजे  

नरेन्द्र मोदी ने धारा 370 में व्यापक बदलाव के फ़ैसले के बाद देश को संबोधित करते हुए जितनी बातें कहीं, उनमें से एक प्रमुख बात ये भी थी. उन्होंने भाषण में दो बार ये दावा किया कि धारा 370 और 35ए के चलते जम्मू-कश्मीर के दलितों को चुनाव में आरक्षण का लाभ नहीं मिलता था. क्या नरेन्द्र मोदी ने जो दावा किया वो सच है? क्या वो झूठ बोल रहे थे? हम इसकी तहक़ीकात आगे करेंगे, लेकिन बीजेपी के कई नेताओं ने बीते कुछ वर्षों से लगातार ये दावा किया है कि जम्मू-कश्मीर के दलितों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलता क्योंकि आरक्षण का क़ानून वहां लागू ही नहीं है.


मोदी के भाषण से पहले लोकसभा में जब गृहमंत्री अमित शाह धारा 370 से जुड़े विधेयक पर चर्चा का जवाब दे रहे थे तो उन्होंने दो टूक कहा कि जो लोग भी सरकार के विधेयक का विरोध कर रहे हैं वो दलित-आदिवासी विरोधी हैं. उन्होंने कहा कि धारा 370 ख़त्म होते से दलित और आदिवासियों को आरक्षण का लाभ मिलना शुरू हो जाएगा.

क्या दलितों को विधानसभा में आरक्षण हासिल नहीं है?

इतिहास में जाने और तथ्यों की जांच शुरू करने से पहले चंद महीने पहले का एक वाक़या देख लीजिए. 2018 में राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा को भंग किया तो उनके फ़ैसले के ख़िलाफ़ बीजेपी  विधायक गगन भगत सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए. बाद में अलग-अलग तरह के दो-तीन आरोपों के बाद गगन भगत को बीजेपी ने पार्टी से बाहर निकाल दिया. इसके बाद 14 दिसंबर 2018 को भगत ने कहा, “मुझे दलित होने की वजह से निशाने पर लिया गया...राज्य में बीजेपी का नेतृत्व 100 फ़ीसदी दलित-विरोधी है.”


जम्मू-कश्मीर विधानसभा की 87 में से 7 सीटें अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित हैं. ये सीटें हैं: रामबन, चनानी, हीरानगर, सांबा, आरएस पोरा, रायपुर दोमाना और छांब. 2014 के विधानसभा चुनाव में आरएस पोरा की आरक्षित सीट से गगन भगत बीजेपी के टिकट पर ही जीतकर विधायक बने थे. ज़ाहिर है इन सभी सात सीटों पर दलितों के अलावा और किसी भी वर्ग का उम्मीदवार चुनाव नहीं लड़ सकता. ये नियम वर्षों से बना हुआ है. राज्य की बाक़ी सीटों के अलावा इन सभी सीटों पर रहने वाले दलित ना सिर्फ़ विधानसभा में वोट डालते हैं, बल्कि वो चुनाव में उम्मीदवारी भी पेश करते हैं. ऐसा नहीं है कि वो सिर्फ़ इन्हीं सीटों से उम्मीदवार बन सकते हैं. भारत के दूसरे राज्यों की तरह उन्हें भी वहां किसी भी सीट से दावेदारी पेश करने का अधिकार है, लेकिन जैसा कि बाक़ी जगहों पर भी होता है, ठीक उसी तरह वहां की राजनीतिक पार्टियां भी दलितों को आम तौर पर सुरक्षित सीटों से ही टिकट थमाती हैं.  


क्या सरकारी नौकरियों में दलितों को आरक्षण नहीं है?

26 जनवरी 1950 को जब भारत का संविधान लागू हुआ तो सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में दलितों के लिए आरक्षण की व्यवस्था लागू की गई. ये देश के सभी राज्यों में लागू हुआ, लेकिन जम्मू-कश्मीर में नहीं हुआ. वजह बहुत साफ़ थी. जम्मू-कश्मीर से जुड़े क़ानून बनाने का अधिकार जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा को दिया गया था. वहां 1951 में संविधान सभा का गठन हुआ. वहां दलितों को आरक्षण की मांग के लिए ‘हरिजन मंडल’ उस वक़्त आंदोलन चला रहा था. शेख अब्दुल्ला ने भरोसा दिया कि जम्मू-कश्मीर में भी आरक्षण लागू किया जाएगा. उसके बाद ‘हरिजन मंडल’ का नेशनल कॉन्फेंस में विलय हो गया. लेकिन, जब संविधान तैयार हुआ तो उसमें एसी/एसटी के लिए आरक्षण का प्रावधान नहीं था. संविधान लागू होने से तीन-चार साल पहले ही शेख अब्दुल्ला को 11 साल के लिए जेल में बंद कर दिया गया था. 

इसके बाद वहां संगठनों ने राज्य सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल लिया. भगत अमरनाथ, बाबू परमानंद, भगत छज्जू राम, महासा नाहर सिंह और बाबू मिल्खी राम इनमें प्रमुख थे. भगत अमरनाथ ने 1968 में ‘पसमांदगी’ नामक अख़बार शुरू किया. पिशोरी लाल ने ‘मज़लूम की आवाज़’ नाम से अख़बार शुरू किया. 1970 आते-आते आंदोलन बहुत तीखा हो चुका था. कई लोगों के साथ भगत अमरनाथ भूख हड़ताल पर बैठ गए और 1 जून 1970 को उनका निधन हो गया. बढ़ते दबाव के बाद राज्य सरकार ने 1972 में एसआरओ फॉर्म 272 जारी किया और 1973 में जम्मू-कश्मीर में एससी/एसटी के लिए आरक्षण लागू हो गया. हरिजन मंडल का मुख्यालय उसी आरएस पोरा में था जहां से गगन भगत बीजेपी के टिकट पर जीतकर विधानसभा पहुंचे. लेख में आगे बताया जाएगा कि जम्मू-कश्मीर आरक्षण अधिनियम 2004 के बाद किस तरह दलितों और आदिवासियों के लिए ऐसे प्रावधान बनाए गए, जो देश के बाक़ी कई राज्यों में भी लागू नहीं हैं.


जम्मू-कश्मीर में दलित

जम्मू-कश्मीर में ‘संविधान (जम्मू-कश्मीर) अनुसूचित जाति आदेश, 1956’ में 13 जातियों को शामिल किया गया है. पहली बार 1956 में ये आदेश जारी किया गया था, लेकिन समय-समय में इस सूची को संशोधित किया जाता रहा. ये जातियां हैं:  1. बरवाला, 2. बारिथ, 3. बटवाल, 4. चमार या रामदासिया या रविदास या रोहिदास, 5. चूरा, भंगी, बाल्मीकि, मेहतर, 6. ध्यार, 7. डूम या महासा या डूमा 8. गार्दी, 9. जोलाहा, 10. मेघ या कबीरपंथी, 11. रताल, 12. सरयारा और 13. वताल. पूरी सरकारी सूची आप यहां देख सकते हैं. 


दलितों की सबसे ज़्यादा आबादी जम्मू, कठुआ और उधमपुर ज़िले में रहती है. मेघ वहां की सबसे बड़ी अनुसूचित जाती है. चमार और डूम आबादी के हिसाब से दूसरे और तीसरे नंबर पर हैं. इन सबको वहां 35ए के तहत स्थाई निवासी का दर्जा हासिल है और जम्मू-कश्मीर के किसी भी दूसरे नागरिकों के बराबर बाक़ी सारे अधिकार भी हासिल हैं. इतिहास बताता है कि जब 1950 में शेख अब्दुल्ला की सरकार ने वहां ऐतिहासिक भूमि सुधार के लिए “बिग लैंडेड एस्टेट्स एबॉलिशन एक्ट” पारित किया था तो इसके तहत 22.75 एकड़ से ज़्यादा ज़मीन रखने पर वहां पाबंदी लगा दी गई. 1977 के सोशल साइंटिस्ट में मोहम्मद असलम अपने शोध लेख में बताते हैं, “4.5 लाख एकड़ ज़मीन में से 2.31 लाख एकड़ ज़मीन छोटे-सीमांत किसानों को बांट दी गई.” 


भूमि सुधार का अध्ययन करने वाले मिचेल ब्रेशर ने ‘कश्मीर इन ट्रांजिशन’ में लिखा है, “इनमें से क़रीब ढाई लाख ऐसे ‘हिंदू अछूतों’ को ज़मीन मिली, जिनके पास ज़मीन नहीं थी.” 2008 में अपराजिता बख्शी ने अपने शोध में पाया कि जम्मू-कश्मीर की सिर्फ़ 11 फ़ीसदी ग्रामीण आबादी भूमिहीन है. देश के बाक़ी हिस्सों में ये आंकड़ा 41 फ़ीसदी है. शोध में ये भी पता चला कि मात्र 22 फ़ीसदी दलित आबादी के पास वहां ज़मीन नहीं है. पंजाब, केरल और हरियाणा में ये आंकड़ा 80 फ़ीसदी से भी ज़्यादा है. अगर धारा 370 नहीं होती, तो भूमि सुधार का ये कार्यक्रम जम्मू-कश्मीर में नहीं लागू किया जा सकता था. 1971 में वहां दलितों की साक्षरता दर 12 फ़ीसदी थी, 2001 में ये बढ़कर 59 फ़ीसदी तक हो गई. 2011 की जनगणना के मुताबिक़ वहां अनुसूचित जाति के कुल 9,24,991 और अनुसूचित जनजाति के कुल 14,93,299 लोग रहते हैं. 


पंचायत चुनावों में एससी/एसटी आरक्षण

देश में पंचायती राज व्यवस्था की शुरुआत 1957-58 में हुई. 1977 में अशोक मेहता समिति ने पंचायत में अनुसूचित जाति और जनजाति को आरक्षण देने का सुझाव दिया. 1991 में पीवी नरसिम्हा राव की सरकार ने 73वां संविधान संशोधन पारित कर पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा दिया. जम्मू-कश्मीर सरकार ने 1958 में ग्रामीण पंचायती अधिनियम लागू किया. बाद में कई समितियां बनीं और आख़िरकार 1988 में विधानसभा में पंचायती राज व्यवस्था से जुड़ा विधेयक पेश किया गया और 1989 में ये लागू हो गया. इसे जम्मू-कश्मीर पंचायती राज अधिनियम 1989 कहते हैं. ध्यान दीजिए भारत के संविधान ने पंयाचती राज व्यवस्था को 1991 में शामिल किया, जम्मू-कश्मीर ने 1989 में.

इसमें महिलाओं, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है. 2003 में 1989 के अधिनियम में बदलाव किया गया और महिलाओं, एससी और एसटी को मिलाकर कुल 33 फ़ीसदी सीटें आरक्षित कर दी गई. 2011 में जब वहां चुनाव हुए थे तो उस वक़्त अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित पंचायतों के लिए मुख्य चुनाव अधिकारी ने जो नोटिफिकेशन जारी किया था, उसे यहां पढ़िए. 2011 के पंचायत चुनाव में राज्य से अनुसूचित जाति के कुल 165, अनुसूचित जनजातियों के 294 और 25 महिला सरपंच चुने गए. विस्तार से जानने के लिए यहां क्लिक करें. 2018 में जब वहां पंचायत चुनाव हुआ तो इसमें भी एससी/एसटी और महिलाओं के लिए आरक्षण लागू था. पूरे मामले को अभी साल भर ही हुए हैं. यहां देखिए जम्मू-कश्मीर सरकार का 2018 के पंचायत चुनाव में आरक्षण पर आधिकारिक नोटिफ़िकेशन.

जम्मू-कश्मीर आरक्षण अधिनियम 2004

जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने साल 2004 में क़ानून पारित कर सरकारी नौकरियों में कई वर्गों के लिए आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था लागू की. सरकारी नौकरियों में आरक्षण के अलावा जम्मू-कश्मीर में प्रोमोशन में भी आरक्षण का नियम लागू है. पूरा अधिनियम यहां पढ़ें. इसके साल भर बाद जम्मू-कश्मीर आरक्षण नियम 2005 लागू हुआ और इसमें विस्तार से बताया गया है कि किस वर्ग को कितना आरक्षण मिलेगा. दस्तावेज़ के मुताबिक़अनुसूचित जाति को 8 फ़ीसदी, अनुसूचित जनजाति को 10 फ़ीसदी, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े तबके (एससी/एसटी को छोड़कर) के तहत कमज़ोर और वंचित वर्ग को 2 फ़ीसदी, लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल से सटे इलाक़ों में रहने वाले लोगों के लिए 3 फ़ीसदी और पिछड़े इलाक़ों में रहने वाले लोगों लिए 20 फ़ीसदी आरक्षण की व्यवस्था है. यही नहीं, पूर्व सैनिकों के लिए 6 प्रतिशत और विशेष रूप से सक्षम व्यक्तियों के लिए 3 फ़ीसदी हॉरिजोंटल रिज़र्वेशन की भी व्यवस्था है. पूरा नियम जानने के लिए यहां क्लिक करें.


इसी तरह प्रोमोशन में अनुसूचित जातियों को को 4 फ़ीसदी, जनजातियों को 5 फ़ीसदी, पिछड़े इलाक़ों में रहने वाले लोगों के लिए 10 फ़ीसदी, लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल से सटे इलाक़ों में रहने वाले लोगों के लिए 2 फ़ीसदी और कमज़ोर व वंचित तबकों के लिए एक फ़ीसदी आरक्षण की व्यवस्था है. जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में ओबीसी को कमज़ोर और वंचित तबकों की श्रेणी में गिना जाता है. प्रोमोशन के लिए 100 प्वाइंट्स रोस्टर व्यवस्था लागू है. मसलन, हर चौथी सीट बैकवर्ड एरिया के लोगों के लिए और हर छठी सीट एससी के लिए आरक्षित है. 


इसी तरह प्रोफेशनल संस्थानों में दाख़िलों में भी अनुसूचित जातियों और जनजातियों को आरक्षण हासिल है. प्रदेश का प्रभुत्वशाली तबक़ा आरक्षण की इस व्यवस्था से चिढ़ने लगा और प्रोमोशन में आरक्षण के नियम को जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट में चुनौती दे दी. 2015 में हाई कोर्ट ने इनमें से कई प्रावधानों को बदलने का आदेश सुनाया. मामला अभी भी अदालत में है. 


एससी/एसटी के लिए बोर्ड और अन्य संस्थाएं

जम्मू-कश्मीर में दलितों, आदिवासियों, और ओबीसी के लिए कई संस्थाएं बनी हैं. इनमें से कुछ की सूची नीचे है:
1.    अनुसूचित जातियों के विकास के लिए राज्य सलाह बोर्ड
2.    ओबीसी के कल्याण राज्य सलाह बोर्ड
3.    गुज्जर और बकरवाल के कल्याण और विकास के लिए राज्य सलाह बोर्ड
4.    एससी/एसटी और ओबीसी विकास कॉरपोरेशन लिमिटेड
5.    पहाड़ी बोलने वाले लोगों के विकास के लिए राज्य सलाह बोर्ड


ये सच है कि जम्मू-कश्मीर में आदिवासी मामलों का मंत्रालय बहुत बाद में बना. केंद्र में ये 1991 में ही बन गया था, लेकिन राज्य में ये मंत्रालय 2015 में अस्तित्व में आया, लेकिन मंत्रालय बनने से पहले से वहां आदिवासियों से जुड़े कुछ बोर्ड बन चुके थे. जम्मू-कश्मीर में आदिवासियों की तादाद दलितों से ज़्यादा हैं, लेकिन वहां की विधानसभा में एसटी के लिए सीटें आरक्षित नहीं हैं. पंचायतों और स्थानीय निकायों में आदिवासियों को आरक्षण हासिल है और विधानसभा में आरक्षण को लेकर वहां कई आंदोलन हो चुके हैं और राज्य की ज़्यादातर पार्टियों ने कई बार ये भरोसा दिया कि इससे जुड़ा क़ानून बनाया जाएगा.

दलितों को अधिकार नहीं मिलने की ख़बर बनी कैसे?

साल 1957 में जम्मू शहर गंदगी से बजबजा रहा था. सफ़ाई का कोई इंतज़ाम नहीं था. सरकार ने दूसरे राज्यों से सफ़ाई करवाने के लिए वाल्मीकि जाति के कुछ लोगों को जम्मू बुलाया. बख़्शी ग़ुलाम मोहम्मद उस वक़्त जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री थे. शेख अब्दुल्ला जेल में थे. पंजाब से बुलाए गए वाल्मीकियों की संख्या अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग दर्ज हैं. लेकिन ये 200 से 275 परिवारों के बीच थे. जम्मू-कश्मीर को गंदगी से निज़ात चाहिए था और इसके लिए उन्हें ‘सफ़ाईकर्मी’ वाल्मीकियों की दरकार थी. सरकार ने उनके लिए मुफ़्त यातायात और राज्य में रहने के लिए विशेष परमिट दिया. उन्हें रहने के लिए घर भी दिया गया, लेकिन वाल्मीकियों की मांग साफ़ थी. 


उन्होंने राज्य सरकार से कहा कि उन्हें भी ‘स्थाई निवासी’ का दर्जा दिया जाए. राज्य सरकार ने उस वक़्त वादा भी किया था, लेकिन ये वादा कभी भी पूरा नहीं हो पाया. उस वक़्त तात्कालिक तौर पर सरकार ने जम्मू-कश्मीर सिविल सर्विस रेगुलेशन एक्ट में एक उपबंध जोड़ा जिसके तहत इन लोगों को ‘सफ़ाई कर्मचारी’ के तौर पर काम करने की ‘छूट’ दी गई. आपको बता दें कि धारा 35ए के तहत राज्य के स्थाई निवासियों को ही राज्य सरकार की नौकरी करने का अधिकार हासिल है. उसके बाद दशकों गुज़र गए और इन परिवारों की संख्या अब बढ़कर 500 से 1000 के बीच पहुंच गई, लेकिन उन्हें परमानेंट रेजिडेंट नहीं माना गया. मामला अभी भी सुप्रीम कोर्ट में है. 

 
ऐसा नहीं है कि राज्य के सभी वाल्मीकियों को स्थाई निवासी नहीं माना गया है, ये नियम सिर्फ़ उन्हीं वाल्मीकियों के लिए हैं जिन्हें 1950 के दशक में पंजाब से जम्मू में बसाया गया था. इन्हीं लोगों की पीड़ा को बीजेपी ने समूचे दलित की पीड़ा के तौर पर पेश किया. वाल्मीकियों ने उसके बाद कई आंदोलन किए. 2010 में जम्मू-कश्मीर में राहत और पुनर्वास मंत्री रमन भल्ला ने स्वीकार किया था कि उनके साथ ज़्यादती हुई. उन्होंने कहा था, “वाल्मीकियों की मांग जायज़ है. वो बाहरी नहीं बल्कि ‘गोद लिए गए’ लोग हैं. धारा 370 के चलते उन्हें उनका वाज़िब हक़ नहीं मिल पाया है. हम जल्द ही इस पर सर्वदलीय बैठक बुलाएंगे और उनकी पीड़ा को ख़त्म करने की दिशा में कदम उठाएंगे.”


जम्मू-कश्मीर सरकार ने उसके बाद भी इन लोगों के लिए क़ानून नहीं बदला. इस समुदाय के लोग सफ़ाई कर्मचारी के अलावा राज्य सरकार की कोई और नौकरियां इसलिए नहीं कर सकते क्योंकि सफ़ाई कर्मचारी के लिए दशकों पहले नियम में बदलाव किए गए थे और बाक़ी अधिकारों के लिए विधानसभा से क़ानून पारित कराने होते. 


लेकिन नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने दलितों और आदिवासियों के अधिकारों के बहाने जिस अंदाज़ में 370 और 35ए को ख़त्म करने की आलोचना करने वाले लोगों को दलित-विरोधी करार दिया, वो बताता है कि उन्होंने पूरे मामले पर देश के सामने जूठ बोला है और देश को गुमराह किया है. देश के अलग-अलग राज्यों में सफ़ाई कर्मचारियों की गटर में उतरने से होने वाले मौत को लेकर सरकार की तरफ़ से कितनी कार्रवाइयां हुईं हैं, उससे हम सब वाकिफ़ हैं.  


दिलीप खान एशियाविल से जुड़े हैं। यह आलेख वहीं से साभार.



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