आपातकाल को भी मात देती मोदी सरकार की तानाशाही

Posted on 25 Jun 2020 -by Watchdog

ईश मिश्रा

जनचौक में छपी एक खबर के अनुसार, 2 दिन पहले आधी रात को वाराणसी में सीपीआई एमएल (लिबरेशन) के दफ्तर में बिना सर्च वारंट के छापा मारा गया। अर्बन नक्सल के नाम पर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की धर-पकड़ दो  साल से जारी है। महामारी के संकट काल का फायदा उठाकर सांप्रदायिक नागरिकता (संशोधन) कानून (सीएए) विरोधी आंदोलन के कार्यकर्ताओं को राज्य प्रायोजित दिल्ली की सांप्रदायिक हिंसा के फर्जी आरोपों में बंद किया जा रहा है। जामिया की गर्भवती शोध छात्रा सफूरा जरगर को दिल्ली उच्च न्यायालय ने “मानवीय आधार पर” हाल में ही जमानत दी। दिल्ली विश्वविद्यालय, जेएनयू और जामिया के तमाम छात्र छात्राओं पर आपातकाल के कुख्यात कानून मीसा के समतुल्य यूएपीए जैसे काले कानूनों के तहत वारंट जारी किये जा रहे हैं।

स्त्री अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले संगठन पिजरा तोड़ की कार्यकर्ताओं, देवांगना कलीता और नताशा नरवाल को य़ूएपीए में गिरफ्तार कर लिया गया है। उनके ऊपर उत्तर पूर्वी दिल्ली में दंगा भड़काने का आरोप लगाया गया है। इस अघोषित आपात काल की ही तरह साढ़े चार दशक पहले के घोषित आपात काल में भी गिरफ्तार करने बाद फर्जी आरोप गढ़े जाते थे। हाथ-पैर से लगभग 100% विकलांग जाने-माने साहित्यकार, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर डॉ. रघुवंश पर शहर की बिजली आपूर्ति बाधित करने का आरोप था। आज से  45 साल पहले, आज के ही दिन (25 जून 1975), आधी रात को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने संसद में प्रचंड बहुमत के सहारे देश में आपातकाल की घोषणा करके राजनैतिक विरोधियों का दमन शुरू कर दिया था। इतिहास खुद को दोहराता नहीं, सिर्फ उसकी प्रतिध्वनि सुनाई देती है। और 45 साल पहले लगाए गए आपातकाल की मौजूदा प्रतिध्वनि वाकई भयावह है। 

भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों से पैदा उथल-पुथल और अपनी सरकार की घटती विश्वसनीयता से इंदिरा गांधी परेशान थीं। एक संविधानेतर शक्ति के रूप में संजय गांधी का उदय भी भारतीय राजनीति, खासकर कांग्रेसी राजनीति में चिंताजनक परिघटना थी। 1971 में रायबरेली से उनके चुनाव को रद्द करने के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले से उनकी परेशानी बौखलाहट में बदल गयी और उन्होंने 25 जून, 1975 को देश में आपातकाल लगा दिया था। इसके तहत संवैधानिक अधिकारों को मुलतवी कर दिया गया था। सख्त प्रेस सेंसरशिप के जरिए संपादकों को सरकार की मर्जी के आगे नतमस्तक होने पर मजबूर कर दिया गया था। प्रधानमंत्री ने संविधान के 42वें संशोधन के तहत असीमित अधिकार हथिया लिए थे।

सरकार की अलोकतांत्रिक नीतियों का विरोध करने वाले हजारों लोगों को कैदखानों में डाल दिया गया था। आज महामारी संवैधानिक मजदूर अधिकारों पर श्रम संशोधन अध्यादेशों के जरिए कुठाराघात किया जा रहा है। लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले बुद्धिजीवियों को काले कानूनों में बंद कर दहशत का माहौल तैयार किया  जा रहा है। बिना औपचारिक सेंसरशिरप के मुख्याधारा का मीडिया, खासकर टीवी चैनल अनुकूलित हो कर मृदंग मीडिया बन गयी है। सरकार की नीतियों और कामों की आलोचना करने वाले पत्रकारों को तरह तरह से प्रताड़ित किया जाता है। 

2014 में पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद ही प्रधानमंत्री मोदी के शासन की शुरुआत ही सत्ता के केंद्रीकरण से हुई। दरअसल एक समझदार मैक्यावेलियन शासक की तरह भाजपा के कद्दावर नेताओं को दरकिनार कर मोदी ने सत्ता के केंद्रीकरण का अभियान चुनाव प्रचार से ही शुरू कर दिया था। 1967 में मंद गति से शुरू हुई इंदिरा गांधी की सत्ता के अपने हाथों में केन्द्रीकरण की मुहिम 1974 तक चरम पर पहुंच चुकी थी। यहां तक कि उनके वफादार एक कांग्रेस अध्यक्ष ने ‘इंदिरा और इंडिया’ को एक दूसरे का पर्याय बता दिया था। उसी तर्ज पर हाल में ही भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने मोदी को देश का पर्याय बताया।

मोदी के चुनावी विकास के नारे की ही तरह ‘गरीबी हटाओ’ जैसे लुभावने नारों ने इंदिरा गांधी को एक करिश्माई छवि दी थी। ‘गरीबी हटाओ’ के नारे तथा भूतपूर्व रजवाड़ों के प्रिवीपर्स की समाप्ति एवं बैंकों के राष्ट्रीयकरण के साहसी कदमों से उनकी ऐसी आंधी चली कि सिंडिकेट के नाम से मशहूर कांग्रेस (ओ) के दिग्गजों के पांव उखड़ गए। संसद में अभूतपूर्व बहुमत ने इंदिरा गांधी को अधिक तानाशाह और बदमिजाज बना दिया। वर्ष 1971 की बांग्लादेश की लड़ाई के बाद युद्धोन्माद के माहौल में देश की राजनीति में इंदिरा गांधी का कोई शानी नहीं बचा। सांसद उनके चापलूसों की फौज में तब्दील हो गए। लेकिन सिर्फ नारों से कोई कितने समय तक लोकप्रिय बना रह सकता है?

इंदिरा गांधी का करिश्मा टूटने लगा और उनकी सरकार को, भ्रष्टाचार विरोधी, खास तौर से छात्रों के लोकप्रिय आंदोलन का सामना करना पड़ा। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिरा गांधी के कोई भी संवैधानिक पद संभालने पर रोक लगा दी थी। उसके इस फैसले की उच्चतम न्यायालय से पुष्टि की संभावना के बीच उन्होंने आपातकाल की घोषणा कर दी और समूचे देश में मौत का सन्नाटा छा गया। विरोध की आवाजों को कुचल दिया गया। अदालतों में सरकार के प्यादे न्यायाधीशों को भरा जाने लगा जिसके विरोध में उच्चतम न्यायालय के जमीर वाले जजों ने इस्तीफा दे दिया। आज न्यायालय अपने आप ही नतमस्तक हो गए हैं। 

2014 में नरेन्द्र मोदी विकास के नाम पर प्रचंड बहुमत हासिल कर भारतीय जनता पार्टी के अनेक वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार करते हुए देश के एकमात्र नेता के तौर पर उभरे। पुलवामा में सीआरपीएफ दल पर आतंकवादी हमले और तत्पश्चात बालाकोट की सर्जिकल स्ट्राइक  के युद्धोन्मादी माहौल में संपन्न 2019 के चुनाव में मोदी का संसदीय बहुमत प्रचंडतर हो गया। उनका पिछले छह साल का कार्यकाल लोकतंत्र और देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए गंभीर खतरा साबित हुआ है। जैसा कि ऊपर कहा गया है, इतिहास खुद को नहीं दोहराता मगर मौजूदा समय में एक अघोषित आपातकाल की आहट साफ-साफ सुनी जा सकती है। 

इंदिरा गांधी का राजनीतिक उदय अकालों और सामाजिक अशांति के कारण बढ़ती गरीबी और आर्थिक विपत्ति की स्थिति में हुआ। ‘गरीबी हटाओ’ के लुभावने नारे और युद्धोन्माद के अलावा प्रिवी पर्स खत्म करने और बैंकों के राष्ट्रीयकरण की जनपक्षीय नीतियों ने भी उन्हें जबर्दस्त लोकप्रियता दी। दूसरी ओर मोदी के राजनीतिक उदय का रास्ता भ्रष्टाचार में लिपटी कांग्रेस के कुशासन और उसकी जनविरोधी नीतियों तथा उसके राष्ट्रीय विकल्प के अभाव की स्थिति में खुला। भारतीय जनता पार्टी ने अपनी चुनावी सफलता के लिए साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का सहारा लिया जिसके तहत बड़े पैमाने पर जनसंहारों, सामूहिक बलात्कारों और अल्पसंख्यकों को उनके घरों से बेदखल करने के अभियानों को अंजाम दिया गया। लोकसभा चुनावों से पहले मुजफ्फरनगर-शामली जैसे साम्प्रदायिक खूनखराबे नहीं कराए गए होते तो तथाकथित विकास पुरुष को अभूतपूर्व सफलता मिलना असंभव था। 

मोदी ने अपने पहले साल भर के शासन में योजना आयोग जैसी संस्थाओं को नीति आयोग में तब्दील कर सरकार का चाकर बना दिया। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद, भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान तथा राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद जैसी संस्थाओं में संदिग्ध योग्यता वाले संघ परिवार समर्थकों को भर दिया। सरकार भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के जरिए किसानों को लूटने में लग गयी। बजटीय अनुदान घटा कर तथा केन्द्रीय विश्वविद्यालय कानून और सीबीसीएस के माध्यम से उच्च शिक्षा को नष्ट करने का अभियान शुरू हुआ। साम्प्रदायिक तनाव फैलाने और अल्पसंख्यकों को डरा-धमका कर उनके घरों से बेदखल करने के नए-नए हथकंडे अपनाए जा रहे हैं।

पहले कार्यकाल में पेरियार-अंबेडकर स्टडी सर्किल पर पाबंदी से शुरू शिक्षा संस्थानों तथा शैक्षणिक संस्कृति पर हमला जारी है। जेएनयू प्रतिरोध का पहला दुर्ग है, इसलिए देशद्रोह का अड्डा बताकर 2016 में शुरू उस पर हमला जारी है। सीएए के विरुद्ध आंदोलन का केंद्र जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय बना और हमले की जद में वह भी आ गया। बुद्धिजीवियों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं तथा छात्रों और शिक्षकों के खिलाफ कार्रवाई की घटनाएं दिखाती हैं कि सरकार आलोचना और विरोध की आवाज को खामोश करने पर आमादा है। क्रांतिकारी सांस्कृतिक संगठनों पर जारी संघ परिवार के हमले गंभीर चिंता का विषय हैं। असंतोष और अपनी तानाशाही नीतियों के विरोध को कुचलने के लिए इंदिरा गांधी के पास सिर्फ दमनकारी सरकारी तंत्र था। मगर मोदी के पास सरकारी दमनतंत्र के अलावा विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसी संगठित ताकतें भी हैं। 

(ईश मिश्रा दिल्ली विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। आप आजकल दिल्ली में रहते हैं।)



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