भारत के संविधान के साथ अब तब का सबसे बड़ा धोखा है मोदी का नागरिकता कानून

Posted on 21 Dec 2019 -by Watchdog

सुभाष गाताडे

भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (Citizenship Amendment Act) को पारित तो करा लिया है, लेकिन उसे इस क़ानून और इससे संबंधित भारतीय नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर – National Register of Indian Citizens (एनआरआईसी) बनाने के सुझाव के परिणाम और राष्ट्रीय पैमाने की नाराज़गी को संभालने में बड़ा संघर्ष करना पड़ रहा है।

सबसे पहले तो बीजेपी नेताओं ने एनआरसी से बाहर हुए नागरिकों, जिनका नाम राष्ट्रीय रजिस्टर में इस साल अक्टूबर में शामिल नहीं हुआ, को हताशा भरा आश्वासन दिया कि जिन लोगों का नाम असम की एनआरसी में नहीं आया है उनका ख़याल रखा जाएगा। ये दलीलें उन हिंदुओं को आश्वस्त करने के लिए दी गई थीं जिनका नाम राज्य की नागरिक-गणना में नहीं आया था कहा कि अब उन्हें नागरिकों की नई अखिल भारतीय गणना में शामिल कर लिया जाएगा। भाजपा की हताशा का कारण असम एनआरसी का परिणाम था, जो इसकी उम्मीदों के बिलकुल विपरीत निकला: राज्य में 19 लाख में से अधिक “अवैध” पाए गए लोगों में केवल 5 लाख मुस्लिम हैं, और लगभग सभी हिंदू हैं।

अब अखिल भारतीय एनआरसी के साथ-साथ नागरिकता कानून ने पूरे भारत में ज़बरदस्त जन प्रतिरोध को जन्म दिया है। कई स्थानों पर बड़े पैमाने पर मार्च और रैलियां हुई हैं, जिनमें से कुछ का पुलिस और सुरक्षा बलों के साथ आक्रामक टकराव भी हुआ है। लखनऊ, अलीगढ़ और दिल्ली सहित कई विश्वविद्यालयों में बड़े पैमाने पर विरोध कार्यवाही चल रही है, जहां छात्र नए नागरिकता क़ानून और या एनआरआईसी की अखिल भारतीय सूची के ख़िलाफ़ आंदोलन कर रहे हैं।

कई विपक्षी पार्टियों द्वारा शासित राज्यों ने जैसे कि केरल और पश्चिम बंगाल ने पहले ही घोषित कर दिया है कि वे नए नागरिकता कानून या एनआरआईसी को लागू नहीं करेंगे। नए नागरिकता क़ानून का सबसे ज़बरदस्त प्रतिरोध हालांकि उत्तर-पूर्व में सामने आया है। वहां स्थिति इतनी गंभीर है कि इस क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रद्द की गई गाड़ियों की वजह से मुख्य भूमि से कट गया है। उत्तर-पूर्व के कई हिस्सों में कश्मीर की तरह इंटरनेट सेवा पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।

नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) और एनआरआईसी का प्रतिरोध वास्तव में भारत की विशाल विविधता और बहुलता का प्रतिनिधित्व करता है। नागरिकों की गिनती और उन्हें ग़ैर-मुस्लिम नागरिकों से अलग करने और धार्मिक आधार पर भारतीय नागरिकता को फिर से परिभाषित करने की सरकार की दोनों योजनाएँ – देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग अर्थ रखती हैं। उत्तर-पूर्व में, सीएए को भाषा, पहचान और संस्कृति पर हमले के रूप में माना जा रहा है, जबकि दक्षिण में, जहां कभी दिल्ली के ख़िलाफ़ शक्तिशाली द्रविड़ भावना होती थी वह अब वापस उभरती दिखाई दे रही है।

क्या आरएसएस-भाजपा को उम्मीद नहीं थी कि लोगों के प्रतिरोध का यह पैमाना होगा, लेकिन शायद उन्हें इसका अंदाज़ा था इसलिए उन्होंने सोचा कि यह उनके वोट बैंक के आधार को मज़बूत करेगा। वास्तव में, बताया यह जा रहा है कि उन्होंने नागरिकता अधिनियम के समर्थन में एक राष्ट्रव्यापी अभियान की योजना बनाई है।

बिल अपनी मनमानी के ज़रिये न केवल कुछ समुदाय के बहिष्कार में निहित है: उदाहरण के लिए, इसने श्रीलंका को छोड़, तमिल शरणार्थियों को पूरी तरह से बाहर रखा है (जिनमें से अधिकांश हिंदू हैं)। क़ानून ने भारत को केवल तीन मुस्लिम-बहुल पड़ोसियों, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश से ग़ैर-मुस्लिम शरणार्थियों को स्वीकार करने तक सीमित कर दिया है। भारत भूटान, म्यांमार और नेपाल जिनके साथ वह सीमा साझा करता है, और सबको व्यापक रूप से पता है कि इन देशों में भी अल्पसंख्यकों को सताया जाता है। उदाहरण के लिए, पाकिस्तान में ऐसे समुदाय अहमदिया और हज़ारा हैं, बांग्लादेश में बिहारी मुसलमान और म्यांमार में रोहिंग्या हैं जिन्हें संयुक्त राष्ट्र ने “दुनिया में सबसे अधिक उत्पीड़ित समुदाय” कहा है।

व्यवहार में, एनआरसी और सीएए के दोतरफा हमले से भारत के मुस्लिम निवासियों को ग़ैर-नागरिक, और गैर-मुस्लिम प्रवासियों को नागरिक घोषित कर दिया जाएगा। इस कारण और इसके कहीं अधिक अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन, एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा है कि 1955 के नागरिकता अधिनियम में यह संशोधन एक “हठधर्मिता वाला क़ानून है जिसे तुरंत निरस्त किया जाना चाहिए।”

यह कहा जा रहा है कि मानवतावाद की आड़ में सीएए ने मूल रूप से धार्मिक अधिकार-वापसी की शुरुआत करने की कोशिश करके संविधान को उलट दिया है। याद रखें, इज़रायल और कोरिया (दक्षिण और उत्तर दोनों) और कुछ अन्य देशों के विपरीत, भारतीय क़ानून या संविधान किसी भी धार्मिक आधार पर “वापसी के अधिकार” को मान्यता नहीं देते हैं। फिर भी, क़ानून बनाने वालों ने न केवल इस बिल के साथ इस पर लौटने के अधिकार की वकालत की, बल्कि संसद में अपने क्रूर बहुमत के साथ, जल्दबाजी में इसे क़ानून भी बना दिया।

संयुक्त राष्ट्र ने सीएबी को “मौलिक रूप से भेदभावपूर्ण” बताया है, जो क़ानून के हिसाब से समानता के लिए हानिकारक है। एक तरफ़ तो भारत ने नागरिक और राजनीतिक अधिकारों तथा नस्लीय भेदभाव के उन्मूलन के अंतर्राष्ट्रीय क़रार और के समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, और दूसरी ओर वह जातीय और धार्मिक आधार पर भेदभाव को बढ़ावा दे रहा है, जो इन क़रार के मुताबिक़ सख़्त वर्जित है। एक साल पहले ही भारत ने सुरक्षित, नियमित और क्रमबद्ध प्रवासन के ग्लोबल कॉम्पैक्ट का समर्थन किया था, जिसके तहत राष्ट्र-राज्यों को उनकी ख़ुद की भेद्यता की स्थितियों में प्रवासियों की ज़रूरतों पर ध्यान देना, उनकी मनमानी बंदी न करना, और उनके सामूहिक निष्कासन से बचना तथा यह सुनिश्चित करना कि शासन ने प्रवास के सभी उपाय मानवाधिकार के दायरे के भीतर किए हैं।

इसके अलावा, भारत सरकार ने कभी भी उन तथ्यों या आंकड़ों को इकट्ठा नहीं किया और न ही उनकी घोषणा की है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश या अफ़ग़ानिस्तान से कितने उत्पीड़ित लोगों ने भारत में शरण मांगी है। साथ ही, मोदी-शाह सरकार यह मानने से भी इनकार कर रही है कि इस अधिनियमन का ग़ैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों पर कितना नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा – ये वही लोग हैं जो इनकी रक्षा करने का दावा करते हैं – जो इन पड़ोसी मुस्लिम-बहुल देशों में रहते हैं।

 सवाल उठता है कि मोदी-शाह की जोड़ी ने तीन पड़ोसी मुस्लिम-बहुल देशों को ही बिल में सीमित क्यों किया?

यहाँ यह याद रखना चाहिए कि एक बार वैश्विक मानवाधिकार कार्यकर्ता रही और म्यांमार प्रतिरोध की नेता आंग सान सू की को अब हेग के अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में रोहिंग्या अल्पसंख्यकों के नरसंहार जिसे उनके निज़ाम के तहत किया गया था, के आरोपों का सामना करना पड़ रहा है। यहाँ लगता है सरकार की चिंता, शायद, केवल म्यांमार और श्रीलंका के साथ अधिक से अधिक तालमेल स्थापित करना है और इस तरह से उनके पंखों को तोड़ना नहीं है।

इन बहिष्कारों का सबसे महत्वपूर्ण कारण भाजपा और आरएसएस द्वारा हिंदुत्व दक्षिणपंथ की उस ऐतिहासिक दृढ़ विश्वास को प्रकट करना है कि भारत एक हिन्दू देश है और कि वह हिंदू राष्ट्र का हक़दार है।

यहाँ यह भी याद रखें कि हिंदुत्व दक्षिणपंथ के मुताबिक़ भारत एक ‘अखंड’ या ‘अविभाजित’ भारत था जिसमें एक समय अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश शामिल थे।

हिंदुत्ववादियों का यह भी मानना है कि भारतीय हिंदू विशेष रूप से भारतीय नागरिकों के रूप में “धार्मिक रूप से उत्पीड़ित हिंदुओं (और अन्य ग़ैर-मुस्लिम अल्पसंख्यक समूहों) को समायोजित करने का उनका दायित्व हैं।”

यहाँ आप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस म्यांमार यात्रा को याद करें, जिसके ज़रिये पिछले साल एक संयुक्त बयान जारी किया गया था और जो रोहिंग्याओं समुदाय की बड़े पैमाने पर हुई जातीय सफाई पर मौन था, लेकिन उस बयान ने रोहिंग्याओं के एक तबके की “आतंकवादी” गतिविधियों में शामिल होने पर चिंता व्यक्त की थी। इस बयान के मुताबिक़, “भारत और म्यांमार का अपनी लंबी सीमा और समुद्री सीमाओं को सुरक्षा देने के लिए और स्थिरता बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है … भारत राखिन राज्य में हिंसा के मुद्दे पर म्यांमार के साथ खड़ा है, जिसके कारण निर्दोष लोगों की जान गई है।”

या फिर गोतबाया राजपक्षे और उसके भाई महिंद्रा राजपक्षे की अगुवाई वाली श्रीलंका सरकार के साथ बेहतर संबंध स्थापित करने के लिए अतिरिक्त मशक़्क़त की और कैसे इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा कि निर्वाचित राष्ट्रपति मानवाधिकारों के उल्लंघन का दोषी है अपनी उस कथित भूमिका के लिए जब उसने तमिल उग्रवाद से निपटने के लिए ये अपराध किए थे।

यह भी रिपोर्ट हुआ है कि हिंदुत्व के नेताओं के एक वर्ग ने दोनों देशों में बौद्ध अतिवाद के प्रति सहानुभूतिपूर्वक टिप्पणी लिखी है। म्यांमार के चरमपंथी अशीन वीराथू के 969 समूह और श्रीलंका में बोडू बाला सेना या बौद्ध शक्ति बल को मुस्लिम विरोधी हिंसा में शामिल बताया जाता है – और इन आतंकी संगठनों ने ख़ुद रिपोर्ट किया है कि वे कैसे भारत में अपने समकक्षों के संपर्क में हैं? जो अपने “आम दुश्मन”, यानी मुसलमानों के ख़िलाफ़ दक्षिण एशिया में एक “हिंदू-बौद्ध शांति क्षेत्र” बनाने के हिंदुत्व के वर्चस्ववादी एजेंडे पर काम कर रहे हैं।

दिलचस्प बात यह है कि ड्राफ़्ट बिल में “धार्मिक उत्पीड़न” के शिकार लोगों को नागरिकता (Citizenship to victims of “religious persecution”) देने का उल्लेख किया गया है, जबकि संसद द्वारा पारित अंतिम बिल में ज़ुल्म का उल्लेख नहीं किया गया है या इसके बजाय “कोई भी” व्यक्ति शब्द का उपयोग किया गया है, जबकि उन देशों की संख्या को तीन तक सीमित किया गया है जहाँ से लोग नागरिकता हासिल कर सकते हैं।

धरशिनी, 34, एक श्रीलंकाई तमिल शरणार्थी है, 65,000 से में से एक जो विभिन्न शिविरों में रहते हैं, ज़्यादातर शरणार्थी दक्षिणी राज्य तमिलनाडु में रहते हैं। धारशिनी और उसका परिवार 1990 में नाव के ज़रीये भारत में आए थे और गुम्मिदिपुंडी में अन्य श्रीलंकाई तमिलों के एक शिविर में बस गए थे। भारत में 25 वर्षों तक महान तपस्या करने के बाद, उन्हें उम्मीद थी कि सीएए उन्हें नागरिकों के रूप में समायोजित कर लेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अब, इन शरणार्थियों के भीतर निर्वासन का डर घुसा रहेगा।

सवाल यह उठता है कि एक ऐसा विधेयक क्यों बनाया गया है जो ‘समावेशी’ होने का शोर करता है जो उसके अंतिम ड्राफ़्ट के उद्देश्यों और बयान में भी शामिल है और जिसे संसद द्वारा मंज़ूरी दे दी गई है, और यह अब उन तमिल प्रवासियों को शामिल करने से माना करता है जो श्रीलंका में उत्पीड़न से बच कर यहाँ आए हैं।

पूरे भारत को, इस अधिनियम के स्पष्ट उद्देश्य के बारे में पता है कि ये क्या बला है: इसके ज़रीये मुसलमानों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने और संविधान का गला घोंटने और भारत को तबाही के कगार पर लाने का प्रयास है।

सुभाष गाताडे



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