समझौता ब्लास्ट मामले में अदालत ने की एनआईए की खिंचाई, कहा-एजेंसी ने छुपाए सबसे बेहतर सबूत

Posted on 29 Mar 2019 -by Watchdog

संजय कुमार सिंह

18 फ़रवरी 2007 को भारत-पाकिस्तान के बीच हफ़्ते में दो दिन चलने वाली ट्रेन संख्या 4001 अप अटारी (समझौता) एक्सप्रेस में दो आईईडी धमाके हुए थे जिसमें 68 लोगों की मौत हो गई थी। यह हादसा रात 12 बजे के करीब दिल्ली से कोई 80 किलोमीटर दूर पानीपत के दिवाना रेलवे स्टेशन के पास हुआ था। ट्रेन अटारी जा रही थी जो कि भारतीय हिस्से का आख़िरी रेलवे स्टेशन है। धमाकों की वजह से ट्रेन में आग लग गई और इसमें महिलाओं और बच्चों समेत कुल 68 लोगों की मौत हो गई जबकि 12 लोग घायल हुए थे। यह धमाका विशेष ट्रेन और फिर अभियुक्त बनाए गए लोगों के लिहाज से खास रहा। फैसला आने में 12 साल लगे पर कोई दोषी नहीं मिला।

20 मार्च 2019 को फैसला सुनाए जाने के बाद अखबारों में खबर छपी थी कि समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट केस के चारों अभियुक्त बरी हो गए हैं। पंचकुला की स्पेशल राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) कोर्ट ने असीमानंद समेत चारों अभियुक्तों को बरी कर दिया है। इस मामले में लोकेश शर्मा, कमल चौहान और राजिंदर चौधरी अभियुक्त थे। पाकिस्तान ने समझौता ब्लास्ट के अभियुक्तों की रिहाई पर नाराजगी जताते हुए कहा था कि धमाके के 11 साल बाद सभी अभियुक्तों का बरी हो जाना साबित करता है कि भारतीय अदालतों की विश्वसनीयता कितनी कम है।

इस मामले में कुल आठ अभियुक्त थे, इनमें से एक की मौत हो चुकी है, जबकि तीन को भगोड़ा घोषित किया जा चुका है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष अपने लगाए आरोप को साबित नहीं कर सका और इस कारण सभी अभियुक्तों को बरी किया जा रहा है। इससे पहले, समझौता ब्लास्ट में अपने पिता को खोने वाली पाकिस्तानी महिला राहिला वकील ने इस केस में गवाही देने की अनुमति मांगी थी। पर उस याचिका को खारिज कर दिया गया था। ऐसे मामले में सभी अभियुक्तों की रिहाई पर भारतीय मीडिया में फॉलो अप नहीं के बराबर रहा है। एनआईए की जांच पर टीका टिप्पणी हुई है पर बहुत कम।

अदालती फैसले की रिपोर्टिंग से जुड़े लोग जानते हैं कि पूरा विस्तृत लिखित फैसला बाद में आता है और लोगों को पता होगा कि फैसला वीरवार को आने वाला था। अगर असीमानंद समेत सभी अभियुक्तों को बरी किए जाने को मीडिया ने गंभीरता से लिया होता तो आज की यह खबर और अखबारों में होनी चाहिए थी। पर ऐसा है नहीं। दूसरी ओर, इस मामले में एक और खास बात हुई थी। केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह के हवाले से अखबारों में छपा था कि इस मामले में अपील नहीं की जाएगी। मुझे तभी यह घोषणा जल्दबाजी में की गई लगी थी।

एक गंभीर मामले में एनआईए की जांच और किसी को सजा न होना और सरकार का पहले ही कह देना कि अपील नहीं की जाएगी बेहद अटपटा है। यह नीचे के अधिकारियों के लिए इशारे की तरह काम करता है। और इस मामले में हुआ भी यही, भारतीय मीडिया में इसका फॉलो अप नहीं के बराबर है। फैसले से संबंधित इंडियन एक्सप्रेस की खबर का अनुवाद आज जनसत्ता के वेबसाइट पर है जो इस प्रकार है- समझौता ब्लास्ट: जज ने की एनआईए की खिंचाई, लिखा-सबसे मजबूत सबूत ही दबा गए।

20 मार्च को फैसला सुनाए जाने के बाद की एक खबर बीबीसी के पोर्टल पर टाइम्स टाइम्स ऑफ इंडिया के हवाले से है। इसमें कहा गया है, “यह पूछे जाने पर कि क्या अभियोजन पक्ष इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील करेगा, उन्होंने (राजनाथ सिंह) कहा, नहीं, सरकार को क्यों अपील करनी चाहिए? इसका कोई मतलब नहीं है। राजनाथ सिंह ने इस मामले में नए सिरे से जांच को भी ख़ारिज कर दिया। उन्होंने कहा, “एनआईए ने इस मामले की जांच की। इसके बाद ही उसने आरोप पत्र दाखिल किया। अब जबकि कोर्ट ने अपना फ़ैसला सुना दिया है, उस पर भरोसा किया जाना चाहिए।” उम्मीद है राजनाथ सिंह अब इस पर पुनर्विचार करेंगे।

समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट के आरोपियों की रिहाई का आदेश देने वाले जज ने अपने फैसले में कहा है कि एनआईए सबसे मजबूत सबूत ही अदालत में पेश करने में नाकामयाब रही, साथ ही मामले की जांच में भी कई लापरवाही बरती गई। केन्द्रीय जांच एजेंसी एनआईए की खिंचाई करते हुए कहा कि ‘वह गहरे दुख और पीड़ा के साथ यह कह रहे हैं, क्योंकि एक नृशंस और हिंसक घटना में किसी को सजा नहीं मिली।’ साल 2007 में हुए समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट में अदालत ने चारों आरोपियों असीमानंद, कमल चौहान, राजिंदर चौधरी और लोकेश शर्मा को बीती 20 मार्च को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था। अब 28 मार्च को पंचकूला की विशेष अदालत का यह फैसला सार्वजनिक किया गया है।

इन धमाकों में मारे गए लोगों में 43 पाकिस्तान के निवासी थे, वहीं 10 भारतीय और 15 लोगों की पहचान नहीं हो सकी थी। अपने आदेश में पंचकूला की विशेष अदालत के जज जगदीप सिंह ने कहा कि “अभियोजन द्वारा पेश किए गए सबूतों में कई लापरवाही थी, जिससे इस हिंसक घटना में किसी को सजा नहीं हो सकी। आतंकवाद का कोई धर्म नहीं है, क्योंकि दुनिया का कोई भी धर्म हिंसा नहीं फैलाता है। अदालत का आदेश लोगों की जनभावना के आधार पर नहीं होने चाहिए या फिर किसी राजनीति से प्रेरित नहीं होने चाहिए। यह सिर्फ सबूतों के आधार पर होना चाहिए।”

जज ने कहा कि इस केस में ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया गया, जिससे यह साबित होता हो कि यह अपराध आरोपियों ने किया है। साथ ही कई स्वतंत्र गवाहों से भी पूछताछ नहीं की गई। जज जगदीप सिंह ने कहा कि एनआईए आरोपियों के बीच की बातचीत के सबूत भी पेश करने में नाकामयाब रही। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि ‘संदेह कभी भी साक्ष्य की जगह नहीं ले सकता।’

इस मामले को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि असीमानंद हैं कौन?

समझौता ब्लास्ट मामले में आरोपी असीमानंद को ज्वलंत भाषण और अल्पसंख्यक विरोधी रुख के लिए जाना जाता है। उनका नाम 2007 में हैदराबाद में मक्का मस्जिद में विस्फोट, 2008 में महाराष्ट्र के मालेगांव में विस्फोट, अजमेर दरगाह में धमाके जैसी वारदातों से जुड़ा रहा है। इनके कई नाम हैं - जतिन चटर्जी उर्फ नबाकुमार सरकार उर्फ स्वामी ओंकारनाथ उर्फ स्वामी असीमानंद। वनस्पति विज्ञान में स्नातक असीमानंद पश्चिम बंगाल के हुगली के निवासी हैं और अच्छा पढ़ा-लिखा भी। 1990 से 2007 के बीच स्वामी असीमानंद वनवासी कल्याण आश्रम के प्रांत प्रचारक प्रमुख रहे। असीमानंद 1995 के आस-पास गुजरात के डांग में हिंदू संगठनों के साथ 'हिंदू धर्म जागरण और शुद्धीकरण' के काम भी किए हैं।

डांग के आह्वा में असीमानंद ने शबरी माता का मंदिर बनाया और शबरी धाम की स्थापना की। पुलिस के मुताबिक 2006 में मुस्लिम समुदाय को आतंकित करने के लिए किए गए विस्फोटों से ठीक पहले असीमानंद ने इसी शबरी धाम में कुंभ का आयोजन किया। कुंभ के दौरान धमाके में शामिल करीब 10 लोग इसी आश्रम में रहे। इसके अलावा असीमानंद पश्चिम बंगाल के पुरुलिया, मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र में भी सक्रिय रहे। सीबीआई का दावा है कि स्वामी हरिद्वार में पहचान बदलकर रह रहे थे। स्वामी असीमानंद की तलाश 2009 के बाद से शुरू हुई जब सुरक्षा एजेंसियों को यह ठोस जानकारी मिली कि आरोपी अपने भेष बदलता है। सूत्रों के मुताबिक, स्वामी की मौजूदगी के बारे में जानकारी मिलने के बाद सीबीआई तथा एटीएस (महाराष्ट्र) ने वर्ष 2009-10 में मध्य प्रदेश और गुजरात के विभिन्न स्थानों की तलाशी ली।

स्वामी असीमानंद ने 2011 में मजिस्ट्रेट को दिए इकबालिया बयान में स्वीकार किया था कि अजमेर दरगाह, हैदराबाद की मक्का मस्जिद और कई अन्य जगहों पर हुए बम ब्लास्ट में उनका और कई अन्य हिंदू चरमपंथी संगठनों का हाथ है। हालांकि बाद में असीमानंद अपने बयान से पलट गए और कहा कि उन्होंने पिछला बयान एनआईए के दबाव में दिया था। अब जज ने अपने फैसले में जो कहा है उसका सार संक्षेप यही है कि एनआईए इस मामले में गंभीर ही नहीं थी।

(संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और बहुत वर्षों तक एक दौर के  प्रतिष्ठित अखबार जनसत्ता में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं।)



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