मीडिया के शोर में राफेल घोटाले की सच्चाई को दफ़्न करने की कोशिश

Posted on 30 Jul 2020 -by Watchdog

विजय शंकर सिंह

सरकार की पीआर एजेंसी के रूप में कुछ टीवी चैनलों का बदलना अब हैरान नहीं करता है, बल्कि हैरान करता है उन्मादित डिबेट के शोर में सरकार से किसी संजीदा मामले पर अचानक टीवी चैनलों का कुछ सवाल उछाल देना। आज अगर सोशल मीडिया और विभिन्न मीडिया वेबसाइट न होतीं तो, ऐसे बहुत से समाचार जो जनहित और जन सरोकार से जुड़े हैं, समाज तक पहुंचते ही नहीं और अगर किसी भी प्रकार से वे पहुंच भी पाते तो खबरों का वह स्वरूप न होता जो होना चाहिए। बल्कि खबरें भी जानबूझकर कर, संशोधित, संक्षिप्त और प्रक्षिप्त होतीं। 

आज सुबह-सुबह अखबार आंखों से गुजरे तो देश की आर्थिक स्थिति के बारे में एक बेहद चिंतित करने वाली खबर पढ़ने को मिली, पर इस खबर पर न तो किसी टीवी चैनल में डिबेट होगी और न ही प्रधानमंत्री या वित्तमंत्री या सरकार का कोई जिम्मेदार व्यक्ति ट्वीट करेगा। खबर से यह संदेह उठ रहा है कि क्या सरकार वित्तीय रूप से दिवालियेपन की ओर जा रही है।

खबर यह है कि, वित्तीय मामलों की संसदीय स्टैंडिंग कमेटी जिसके अध्यक्ष भाजपा के सांसद जयंत सिन्हा हैं, के सामने वित्त सचिव अजय भूषण पांडेय ने कहा है कि सरकार इस स्थिति में नहीं है कि वह राज्यों को जीएसटी का उनका हिस्सा दे सके। मतलब सरकार ने अपनी जेबें उलट दीं हैं। सरकार का कर संग्रह गिर गया है। जब सरकार से पूछा गया कि

सरकार राज्यों को किए गए उनके वादे कैसे पूरा करेगी तो वित्त सचिव ने कहा कि, ” जीएसटी एक्ट में यह प्रावधान है कि कैसे राज्यों को उनका अंशदान दिया जाएगा। इसी प्रावधान के अनुसार राज्य और केंद्र मिलकर घटते राजस्व की स्थिति में कोई रास्ता निकालेंगे। ” 

इस पर संसदीय समिति में सम्मिलित विपक्ष के नेताओं मनीष तिवारी, अंबिका सोनी, गौरव गोगोई, प्रफुल्ल पटेल ने कहा कि समिति को देश के आर्थिक विकास की गति में तेजी लाने के उपायों पर विचार करना चाहिए। समिति ने यह भी कहा कि महामारी के कारण आर्थिकी में जो कठिनाइयां आयी हैं उन पर भी बहस होनी चाहिए। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। 

समिति में कांग्रेस के एमपी मनीष तिवारी ने कहा कि, 23 मार्च को जो वार्षिक बजट संसद ने पारित किया था अब वह भी अप्रासंगिक हो गया है क्योंकि जिन कराधान और कर संग्रह के आंकड़ों पर वह आधारित है वे अब बिल्कुल बदल गए हैं। अब तक सरकार को ही यह साफ तौर पर पता नहीं है कि भविष्य में कितना कर संग्रह गिर सकता है। सरकार ऐसी स्थिति से उबरने के लिये क्या सोच रही है। 

कुछ अखबारों के अनुसार, संसदीय समिति के अध्यक्ष जयंत सिन्हा ने कहा कि सदस्यों द्वारा उठाए गए अनेक बिंदु राजनीतिक स्वरूप के हैं अतः उनका उत्तर वित्त मंत्रालय के अधिकारियों नहीं बल्कि वित्तमंत्री द्वारा संसद के ही किसी सदन में जब, इस विषय पर चर्चा हो तो, दिया जाना उचित होगा। इस पर एनसीपी के सांसद प्रफुल्ल पटेल ने कहा कि जब अर्थव्यवस्था के मौलिक सवालों पर संसदीय समिति में चर्चा नहीं हो सकती है तो फिर ऐसी संसदीय समिति को भंग कर दिया जाना चाहिए। 

2014 के बाद सरकार की सबसे बड़ी आर्थिक भूल है, 8 नवम्बर 2016 को रात 8 बजे नोट बन्दी की घोषणा। जब-जब देश की आर्थिक विपन्नता पर बहस उठेगी, यह अहमकाना फैसला याद किया जाएगा। इस मूर्खतापूर्ण कदम से देश में औद्योगिक उत्पादन गिरा, जीडीपी गिरी, नौकरियां गयीं, बैंकों का एनपीए हुआ और मिला कुछ नहीं। न तो काला धन का पता लगा, न काले धन का सृजन रुका, न तो डिजिटल लेन-देन बढ़े और जितना बढ़ा भी उतना ही डिजिटल फ्रॉड भी बढ़ा। सरकार आज तक यह पता नहीं लगा सकी कि नोटबन्दी से देश को लाभ क्या हुआ। 

एक साल के भीतर दूसरा आघात जीएसटी की जटिल नीतियों से हुआ। इसने व्यापार की कमर तोड़ कर रख दी।  अब जब महामारी आयी है तो अर्थव्यवस्था की रही सही कमर भी टूट गयी। आज स्थिति यह है कि इस दलदल से कैसे अर्थव्यवस्था निकले और कम से कम लोगों की मूलभूत समस्याओं का ही समाधान हो सके, ऐसा कोई उपाय न तो सरकार सोच पा रही है और न देश की हर आर्थिक समस्या का निदान निजीकरण है, मानने वाला नीति आयोग। 

देश मे बस दो ही ऐसे शख्स हैं जो इस आर्थिक बदहाली में भी तरक़्क़ी कर रहे हैं। एक तो मुकेश अम्बानी और अडानी जैसे सरकार के चहेते गिरोही पूंजीपति और दूसरे सत्तारूढ़ दल भाजपा । अम्बानी का आर्थिक विकास और उनकी संपन्नता दुनिया में एक एक नम्बर उठता जा रहा है और भाजपा के कार्यालय दिन दूनी और रात चौगुनी गति से बढ़ते जा रहे है। इन दो आर्थिक सूचकांकों को छोड़ कर शेष सब अधोमुखी हैं। 

दूसरी खबर, जिस पर कई दिन से टीवी डिबेट में चर्चा चल रही है, वह है राफेल विमान के सौदे का।

यह विमान अब भारत आ गया है। राफेल आ तो रहा है। पर इस सौदे पर जो सवाल पहले उठे थे वे अब भी उठेंगे। वे सारे सवाल विमान की तकनीक और उसके आधुनिक होने के संबंध में नहीं हैं बल्कि वे सवाल हैं राफेल सौदे में हुई अनेक अनियमितताओं पर। राफेल एक बेहद उन्नत विमान है। उसके एक एक कल पुर्जे के बारे में विस्तार से टीवी चैनल बता रहे हैं। इस विमान के आने से निश्चित ही वायुसेना की ताक़त बढ़ेगी। राफेल की सारी खूबियां सार्वजनिक हो रही हैं। और इन खूबियों के सार्वजनिक होने से हमारी सुरक्षा को कोई खतरा नहीं होगा। क्योंकि खतरा होता तो भला राष्ट्रवादी टीवी चैनल यह सब बताते !

लेकिन कृपा करके, सरकार से यह मत पूछ लीजिएगा कि, 

● राफेल के पहले यूपीए सरकार के दौरान तय हुयी कीमतों में और बाद मोदी सरकार द्वारा तय हुयी कीमतों में अंतर क्यों है ?

● क्यों ऐन वक़्त पर एचएएल को हटा कर अनिल अम्बानी की कम्पनी को घुसाया गया ?

● कैसे 60 साल के विमान निर्माण क्षेत्र में अनुभव रखने वाली एचएएल को 15 दिन पहले महज 5 लाख रुपये की पूंजी से गठित अनिल अम्बानी की कम्पनी की  तुलना में कमतर और अयोग्य पाया गया ?

● अम्बानियों का यह कौन सा एहसान था जो उतारा गया और फ्रेंच राष्ट्रपति की बात मानें तो उनसे किस दबाव में कहा गया कि सौदा तभी होगा जब अनिल अंबानी की कम्पनी को ऑफसेट ठेका मिलेगा ?

● क्यों विमानों की संख्या 126 से कम कर के 36 कर दी गयी ?

● जब यह तय हो गया था कि एचएएल को दसॉल्ट कम्पनी टेक्नोलॉजी भी हस्तांतरित करेगी और ये विमान बाद में भारत में ही बनेंगे, तो इस क्लॉज़ को क्यों और किसके दबाव में हटाया गया ?

● जब इस सौदे को लेकर इस सौदे के सम्बंध में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाले पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा और एडवोकेट प्रशांत भूषण केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो सीबीआई के तत्कालीन निदेशक आलोक वर्मा से मिले तो, उसके तत्काल बाद ही सरकार ने कैसे उन्हें सीबीआई के निदेशक के पद से हटा कर डीजी सिविल डिफेंस में भेज दिया और यह भी बिना नियुक्ति और स्थानांतरण की तयशुदा प्रक्रिया अपनाए ?

आप जैसे ही यह सब सवाल पूछने लगियेगा देश की सुरक्षा पर खतरा मंडराने लगेगा। तकनीकी उन्नत की बात करने वाले टीवी चैनलों के मुंह पर ताला लग जायेगा। यह सवाल बस, इतने ही नहीं हैं और भी हैं। सवालों के घेरे में सरकार भी है, सुप्रीम कोर्ट भी है और नए नए बने राज्य सभा सदस्य रंजन गोगोई भी आएंगे। बात जब निकलेगी तो दूर तक जाएगी ही। बात तो निकलेगी ही । शब्द ब्रह्म होते हैं। उनका क्षय नहीं होता है। वे जीवित रहते हैं।

1965 में हमारे पास एक विमान होता था नेट। शाब्दिक अर्थ इसका होता था मच्छर, शायद। 1965 में पाकिस्तान के पास था तब का अधुनातन विमान सैबर जेट। अमेरिका को बड़ा नाज़ था इस पर। पर हमारे नेट से हमला करने वाले जांबाज वायु सेना के फाइटर पायलटों ने सैबर जेट की हवा खिसका दी थी। एक जनरल ने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान कहा था कि युद्ध में हथियार महत्वपूर्ण होते हैं, पर उससे भी अधिक ज़रूरी है कि हथियार के पीछे सैनिक कितना कुशल और दिलेर है ! हमारी सेना कुशल भी है और दिलेर भी है। पर राफेल की उन्नत तकनीक और सेना की दिलेरी की आड़ में किसी भी घोटाले को छुपाया नहीं जाना चाहिए। 

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)



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