राफेल सौदा: वो सवाल जिनका जवाब सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में नहीं मिलता

Posted on 16 Dec 2018 -by Watchdog

सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार को विवादास्पद राफेल सौदे में जांच की मांग करनेवाली याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि न्यायिक समीक्षा की इसकी शक्ति सीमित है. साथ ही इसने यह भी कहा कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में संदेह करने लायक उसे कुछ नहीं मिला.

यह सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के विरोधाभासी और इस तरह से दोषपूर्ण प्रकृति का सार कहा जा सकता है.

मिसाल के लिए सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि जांच से इनकार करने का इसका फैसला ‘प्राथमिक तौर पर भारत के संविधान के अनुच्छेद 32 के अधिकार क्षेत्र के इस्तेमाल के सिद्धांत पर टिका है, जिसे वर्तमान मामलों के समूह पर लागू किया गया है.’

दूसरी तरफ इस फैसले में इस सौदे के तीन अहम पहलुओं में से दो पर, मसलन, खरीद प्रक्रिया और ऑफसेट पार्टनर के तौर पर अनिल अंबानी के रिलायंस के चुनाव पर खुद विशिष्ट मूल्य आधारित पर्यवेक्षण किए गए हैं. प्रक्रिया पर कोर्ट द्वारा लिया गया पक्ष अंततः उसे इस विश्वास की ओर लेकर जाता है कि भले कुछ ‘छोटी-मोटी भूलें’ रही हों, लेकिन वे इतने बड़ी नहीं हैं कि उनकी ‘विस्तृत जांच’ की जरूरत हो.

यह फैसला सरकार के इस दावे को भी सामान्य रूप से स्वीकार कर लेता है कि इसने फ्रेंच फर्म दासो एविएशन के भारतीय ऑफसेट पार्टनर के तौर पर रिलायंस डिफेंस के चुनाव में कोई हस्तक्षेप नहीं किया.

कोर्ट ने सिर्फ कीमत निर्धारण के सवाल पर मोदी सरकार और विपक्ष के बीच के इस विवाद में पड़ने से इनकार कर दिया कि क्या 36 विमानों के लिए इसने जो कीमत तय की वह इससे पहले तय की गई कीमत से ऊंची थी या उससे फि उससे बेहतर थी?

निर्णय में कहा गया है कि वर्तमान मामले जैसे मामलों में कीमतों की तुलना करना निश्चित तौर पर उसका काम नहीं है.

ऐसा लगता है कि कोर्ट ने प्रक्रिया पर अपना पक्ष मोदी सरकार द्वारा कोर्ट में पेश किए गए दस्तावेजों और पिछले महीने चार घंटे की सुनवाई के दौरान दी गई दलीलों के आधार पर तैयार किया है.

लेकिन अंतिम निर्णय से यह उजागर होता है कि कई ऐसे तथ्य और तर्क ऐसे हैं जिन्हें न्यायालय ने नजरअंदाज कर दिया है, टाल दिया है या बिना सवाल पूछे सिर्फ उसका मुंह देखकर स्वीकार कर लिया है.

द वायर  ने प्रक्रिया, कीमत और ऑफसेट के संबंध में इस फैसले में मौजूद फांकों और इसके परिणामस्वरूप जिन नुक्तों को बिना जांचे छोड़ दिया गया है, की सूची तैयार की है.

1. बेंचमार्क कीमत को लेकर विवाद को नजरअंदाज क्यों किया गया?

जिस तरह से 36 राफेल विमानों के सौदे के लिए बेंचमार्क कीमतों में आखिरी क्षण में किया बदलाव किया गया, वह पिछले कुछ महीनों से विवाद का स्रोत रहा है.

यह बहस खासतौर पर इस तथ्य के इर्द-गिर्द सिमटी रही है कि कैसे रक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी की आपत्तियों को खारिज कर दिया गया और बेंचमार्क कीमत को बढ़ा देनेवाले फॉर्मूले को स्वीकार करने का अंतिम फैसला रक्षा मंत्रालय या मंत्री मनोहर पर्रिकर द्वारा लेने के बजाय सुरक्षा पर कैबिनेट समिति द्वारा लिया गया.

पिछले महीने इकोनॉमिक टाइम्स में की गई एक टिप्पणी में रक्षा मंत्रालय के एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी सुधांशु मोहंती ने इन बदलावों को स्वीकार किए जाने के तरीकों को ‘अजीब यहां तक कि असंगत’ भी कहा.

मोहंती के हवाले से कहा गया है, ‘इससे भी आगे सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध जानकारियों के मुताबिक रक्षामंत्री के नेतृत्व वाले रक्षा खरीद परिषद (डिफेंस एक्विजेशन काउंसिल) जिसमें रक्षा मंत्रालय के सभी आला अधिकारी शामिल होते हैं, ने इसकी सिफारिश नहीं की. इसकी जगह इसने आखिरी फैसला सुरक्षा पर कैबिनेट समिति पर छोड़ दिया. आखिर क्यों? इसकी जांच की जानी चाहिए. क्योंकि रक्षा पूंजी अधिग्रहण को लेकर मेरी याददाश्त में मुझे ऐसी कोई नजीर याद नहीं आती- क्योंकि यह न सिर्फ अजीब है बल्कि असंगत है.’

हालांकि तकनीकी तौर पर यह मसला राफेल सौदे के ‘कीमत’ वाले पहलू से जुड़ा हुआ है, जिसकी जांच करने से सुप्रीम कोर्ट ने इनकार कर दिया है, लेकिन यह साफ तौर पर इस चीज को रेखांकित करता है कि खरीद प्रक्रिया में हुआ विचलन मामूली नहीं था.

यह तथ्य कि कोर्ट ने इस मामले को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया है पहेलीनुमा है.

2. 126 की जगह 36 राफेल विमानों का ही सौदा क्यों किया गया?

सर्वोच्च न्यायालय ने उसके सामने प्रस्तुत असली मसले, यानी यूपीए समय के 126 विमानों की खरीद के सौदे को रद्द करने और निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन किए बगैर 36 विमानों का करार करने में दिखाई गई जल्दबाजी और उसके तरीके, को दरगुजर करते हुए कहा, ‘हम 126 विमानों की जगह 36 विमान ही खरीदने के विवेक पर कोई विचार नहीं कर सकते हैं.’

सर्वोच्च न्यायालय ने मोदी सरकार द्वारा दिए गए तारीखों के क्रम को स्वीकार किया है : जिसके मुताबिक 126 जेट विमानों के आरएफपी (रिक्वेस्ट फॉर पर्चेज) को ‘रद्द करने की प्रक्रिया’ मार्च, 2015 में शुरू की गई और 36 विमानों की खरीद के लिए नए अंतरसरकारी करार पर कुछ हफ्तों के बाद अप्रैल, 2015 में दस्तखत किया गया. लेकिन सर्वोच्च न्यायाल इस संबंध में उठाए गए दूसरे सवालों को स्वीकार नहीं करता है.

इन सवालों में शामिल है : मार्च, 2015 में करार को ‘रद्द करने की प्रक्रिया’ के लिए क्या कागजी कार्यवाही की गई और आखिर सरकार इस मामले में कोई भी ठोस ब्यौरा देने में नाकाम क्यों रही है? आखिर रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर और विदेश सचिव को इस प्रक्रिया के बारे में जानकारी क्यों नहीं थी? और अगर रिक्वेस्ट फॉर पर्चेज को रद्द करने की प्रक्रिया उस समय तक शुरू हो चुकी थी, तो दासो के सीईओ एरिक ट्रैपियर ने 28 मार्च, 2015 को यह क्यों कहा कि 126 विमानों का सौदा ‘95% पूरा हो चुका है. अंतरसरकारी करार पर दस्तखत करने से पहले किस प्रक्रिया को अपनाया गया? इसके लिए किसकी राय ली गई?

सर्वोच्च न्यायालय ने इन सवालों पर हाथ रखने की कोशिश भी नहीं की और अदालत की सुनवाई के दौरान इन पर जवाब मांगने का कोई प्रयास नहीं किया. ऐसे में खरीद प्रक्रिया पर संदेह करने का कोई कारण नहीं होने के सर्वोच्च न्यायालय के आकलन में उल्लेखनीय फांक दिखाई देता है.

जैसा कि प्रशांत भूषण और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा ने सीबीआई में की गई अपनी शिकायत में दिखाया है, 36 एयरक्राफ्ट का करार नियमों के मुताबिक एक नया करार था और उसे भारतीय वायु सेना द्वारा 36 जेटों के लिए ‘स्टेटमेंट ऑफ केस’ से शुरू करके अनेक अनिवार्य प्रक्रियाओं से गुजरना चाहिए था. ऐसा लगता है जिन्हें छोड़ दिया गया.

3. संप्रभु गारंटी की गैरहाजिरी को नजरअंदाज क्यों किया गया?

पिछले महीने, द वायर ने यह यह ब्रेकिंग स्टोरी की थी कि भारत और फ्रांस के बीच अंतरसरकारी करार में सैन्य उपकरण या विमान बेचनेवाले देश पर कानूनी बाध्यता डालनेवाली संप्रभु गारंटी का प्रावधान नहीं था.

संप्रभु गारंटी एक तरह का भरोसा है जो सरकारों के बीच किए गए करारों में आमतौर पर पाया जाता है. अदालती सुनवाई में ऐसी गारंटी की गैरहाजिरी पर चर्चा की गई थी और फैसले में याचिकाकर्ता की दलीलों के सारांश के एक हिस्से के तौर पर इसका संक्षिप्त जिक्र मिलता है.

लेकिन फैसला इसके महत्व या निहितार्थ की जांच करने से पीछे रह गया है और इस बात की चर्चा नहीं करता है कि मोदी सरकार द्वारा राफेल करार की सौदेबाजी के तरीके की रोशनी में इसका क्या अर्थ निकलता है?

रक्षा मंत्रालय के पूर्व अधिकारी सुधांशु मोहंती ने यह कहते हुए फ्रांस द्वारा ‘लेटर ऑफ कंफर्ट’ दिए जाने की आलोचना की है कि यह ‘कानूनी रूप से बाध्यकारी या प्रवर्तनीय’ होने की जगह सिर्फ ‘नैतिक रूप से बाध्यकारी’ है.

पिछले महीने उन्होंने कहा था, ‘(एक संप्रभु गारंटी के बिना) दोनों में से कोई भी पक्ष वादा तोड़ सकता है और अपने अलग-अलग रास्तों पर जा सकता है और ऐसा करते हुए उसे सजा का कोई डर नहीं होगा, हालांकि नैतिकता का सवाल निस्संदेह बना रहेगा.

लेकिन जब सवाल सार्वजनिक खजाने से राष्ट्रीय महत्व की चीज खरीदने का हो तो इससे देश को नुकसान पहुंच सकता है.’

सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार द्वारा फ्रांस के साथ किसी विवाद की स्थिति में मध्यस्थता की सीट भारत में नहीं रखने को लेकर जाहिर की गई चिंताओं को भी नजरअंदाज कर दिया.

4. कीमत पर चर्चा न करने के बावजूद आधिकारिक पक्ष को क्यों दोहराया गया?

सर्वोच्च न्यायालय ने याचिका को स्वीकार करते वक्त यह साफ कर दिया था कि वह ‘कीमत के मुद्दे’ या उपकरण की तकनीकी उपयुक्तता संबंधित मामलों’ में नहीं जाएगा.

फिर भी सुनवाई के दौरान इसने मोदी सरकार को बंद लिफाफे में ‘कीमत और फायदे से संबंधित’ ब्यौरे जमा कराने का निर्देश दिया.

यहीं से भ्रम पैदा होना शुरू होता है. कोर्ट का कहना है कि उसने मूल्य संबंधी सभी ब्यौरों का प्रत्येक उपकरणों के हिसाब से मूल्यों का ध्यानपूर्वक अध्ययन किया है, लेकिन इसके बाद वह सिर्फ यह कहता है कि सरकार ने यह दावा किया है कि ‘36 विमानों की खरीद व्यावसायिक दृष्टि से फायदेमंद है’ और हथियारों के पैकेज को लेकर इसमें ‘कुछ निश्चित बेहतर शर्तें’ हैं.

जैसा कि बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट में बताया गया था यह अनिवार्य तौर पर सही नहीं है. मूल रिक्वेस्ट ऑफ पर्चेज के विश्लेषण से पता चलता है कि मोदी द्वारा किया गया 36 विमानों का सौदा वास्तव में 2012 में दासो द्वारा 126 विमानों के लिए लगाई गई बोली के हिसाब से प्रति विमान 40% ज्यादा महंगा है.

लेकिन स्वाभाविक तौर पर सर्वोच्च न्यायालय इस ओर तवज्जो नहीं फरमाता है और केंद्र के जवाब को दोहराने के बाद अपने शुरुआती विचार पर लौट आता है:

‘निश्चित तौर पर वर्तमान मामलों जैसे मामले में मूल्य संबंधी ब्यौरों की तुलना करना इस अदालत का काम नहीं है. हम इससे ज्यादा कुछ नहीं कहेंगे, क्योंकि इस मामले को गोपनीय रखना है.’

5. कैसे ओलांद के विवादास्पद बयान को नहीं दिया गया महत्व

सर्वोच्च न्यायालय फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के इस विवादास्पद बयान पर काफी जोर देता हुआ दिखता है कि ऑफसेट पार्टनर के तौर पर भारत द्वारा अनिल अंबानी को फ्रांस पर मढ़ दिया गया. लेकिन उसके लिए ओलांद की टिप्पणी का महत्व उसकी विषयवस्तु में न होकर उससे पैदा होनेवाले विवाद में है.

वास्तव में इस फैसले का यह अर्थ निकलता है- जो गलत है- कि राफेल सौदे को लेकर संदेह तब पैदा हुआ जब कुछ अखबारों ने (ओलांद के हवाले से) एक बयान छापा.’

भारत द्वारा ऑफसेट पार्टनर के तौर पर अनिल अंबानी के नाम को आगे बढ़ाने के बाबत फैसले में कहा गया हैः ‘हर पक्ष द्वारा फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति द्वारा दिए गए उस इंटरव्यू का स्पष्ट तरीके से खंडन किया गया जिससे यह ध्वनित हो रहा था कि भारत सरकार ने इस मामले में फ्रांस की सकरार को और कोई विकल्प नहीं दिया था.’

इस तर्क के साथ दो समस्याएं हैं-

पहली बात, राफेल सौदे में संभावित अनियमितताओं को लेकर सवाल उसी समय उठे थे जब इस सौदे की घोषणा की गई थी जो एक साल बाद ठोस रूप लेने लगे. संभावित भ्रष्टाचार की ओर इशारा करनेवाली ओलांद की टिप्पणी ने सिर्फ मौजूदा चिंताओं को बढ़ाने का काम किया न कि उन्हें जन्म दिया.

दूसरी बात, द वायर  और दूसरों ने यह रेखांकित किया है कि ओलांद की टिप्पणी को लेकर ‘हर पक्ष की तरफ से स्पष्ट खंडन’ नहीं आया है. खंडन के नाम पर मौजूदा नियमों का ही हवाला दिया गया है लेकिन फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति के आरोपों से प्रत्यक्ष इनकार नहीं किया गया है न उनपर पलटवार किया गया है.

वास्तव में सुप्रीम कोर्ट ने कई कमजोर खंडनों को स्वीकार कर लिया है और उसका मानना है कि ये ओलांद के सनसनीखेज दावों से पैदा होनेवाले संदेहों को पूरी तरह से दूर कर देते हैं.

6. अंबानी भाइयों को लेकर भ्रम क्यों

पिछले कुछ महीनों में भ्रष्टाचार और बंदरबांट के सवालों के जवाब में भाजपा और दासो ने एक विचित्र दलील सामने रखी है.

भाजपा के नेताओं और दासो के सीईओ एरिक ट्रैपियर ने यह कहने की कोशिश की है कि 36 राफेल विमानों के लिए अनिल अंबानी के रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर का चयन करके वे सिर्फ 2012 में मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज की दासो के साथ भागीदारी को आगे बढ़ा रहे हैं.

इसके सहारे यह कहने की कोशिश की जा रही है कि यह साझेदारी यूपीए काल में ही कायम की गई और उसे ही आगे बढ़ाया गया है. यह एनडीए-2 प्रशासन को एक तरह का सुरक्षा कवच देने के समान है.

यह सच से कोसों दूर है. जैसा कि द वायर  ने दिखाया है, दोनों भाइयों के कारोबारी साम्राज्य पूरी तरह से अलग-अलग हैं. 2012 में मुकेश अंबानी का दासो के साथ जो साझेदारी थी, उसका अनिल अंबानी और दासो के बीच की साझेदारी से कोई लेना-देना नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट भी इसी तरह से भ्रमित दिखता है. फैसले के पृष्ठ 25 पर उसने यह सही स्वीकार किया है कि 2012 में जब 126 विमानों के सौदे के लिए दासो सबसे कम बोली लगानेवाला बना, उसने मुकेश अंबानी के रिलायंस इंडस्ट्रीज के साथ साझेदारी की. इसे उसने ‘एक अन्य कारोबारी समूह’ कहकर अनिल अंबानी के रिलायंस डिफेंस से अलग किया.

लेकिन अगले ही पन्ने पर इसने दासो की प्रेस रिलीज का हवाला दिया है कि हालांकि अनिल अंबानी का रिलायंस एरोस्ट्रक्चर ‘निकट अतीत में’ अस्तित्व में आया, लेकिन इसकी ‘पितृ कंपनी रिलायंस और दासो के बीच संभवतः वर्ष 2012 से ही सहयोग था.’

यह गलत तथ्य है : रिलायंस इंडस्ट्रीज कभी भी रिलायंस एरोस्ट्रक्चर की पितृ कंपनी नहीं थी. इसकी स्थाना 2012 के काफी बाद की गई और इसकी पितृ कंपनी अनिल अंबानी की रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर है.

यह तथ्य कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला बुनियादी तथ्यों को नजरअंदाज करता है, उनको लेकर भ्रमित दिखाई देता है और उन्हें खतरनाक ढंग से मिलाता है, काफी चिंताजनक है.

दासो और भाजपा नेताओं द्वारा किए गए झूठे बचाव पर निर्भर रहकर न्यायालय ने यह निष्कर्ष निकाला है कि ‘किसी पक्ष के प्रति व्यावसायिक पक्षपात के मामले को दिखाने के लिए कोई ठोस सामग्री उसके सामने उपलब्ध नहीं है.’

7. एचएएल के नजरिए की कैसे की गई उपेक्षा

मोदी सरकार द्वारा एक अंतरसरकारी करार द्वारा आनन-फानन में 36 विमानों का छोटा करार करने के बचाव में दिया गया एक तर्क यह है कि सार्वजनिक क्षेत्र की हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड 126 विमानों के बड़े सौदे की राह में रोड़ा साबित हुआ.

सर्वोच्च न्यायालय का फैसला एचएएल द्वारा कथित तौर पर पेश की गई समस्याएं गिनाता है- ज्यादा श्रम घंटे, करार के दायित्व और देरी- और यह दर्ज करता है कि इस गतिरोध के कारण मार्च, 2015 में रिक्वेस्ट फॉर पर्चेज को रद्द की प्रक्रिया शुरू हुई.

फैसले में कहा गया है, ‘ठोस तथ्य यह है कि न सिर्फ करार पूरा नहीं हो रहा था बल्कि बातचीत व्यावहारिक तौर पर अंधे सुरंग में पहुंच गई थी, जिसका नतीजा रिक्वेस्ट फॉर पर्चेज को रद्द करने के तौर पर निकला.’

लेकिन यह दो समस्याओं को जन्म देता है. पहला, दासो द्वारा दिए गए सार्वजनिक बयान ये दिखाते हैं कि एचएएल को लेकर रही समस्याओं का काफी हद तक समाधान कर लिया गया था.

दूसरी बात, सितंबर, 2018 में एचएएल के बॉस टी. सुवर्णा राजू ने यह संकेत दिया कि रक्षा क्षेत्र की सार्वजनिक कंपनी और दासो के बीच कार्य बंटवारा (वर्क शेयर) करार पर वास्तव में दस्तखत हो गया था.

राजू ने हिंदुस्तान टाइम्स को दिए गए एक इंटरव्यू में विमानों की जिम्मेदारी लेने के सवाल पर मतभेद के आरोपों का जवाब देते हुए कहा, ‘दासो और एचएएल ने आपसी कार्य-बंटवारा करार पर दस्तखत कर दिए थे और इसे सरकार को सौंप दिया था. आप सरकार से इन फाइलों को सार्वजनिक करने के लिए क्यों नहीं कहते हैं. ये फाइलें आपको सबकुछ  बता देंगी. अगर मैं प्लेन बनाता हूं, तो मैं उसकी गारंटी दूंगा.’

ये बयान सुप्रीम कोर्ट के फैसले के उलट हैं जिसमें यह दावा किया गया है कि ‘व्यावहारिक रूप से बातचीत पर पूर्णविराम लग गया था.’

यह हमारा ध्यान एक बड़े सवाल की ओर लेकर जाता है.

अगर सुप्रीम कोर्ट ने मोदी सरकार के इस दावे की सत्यता जांचने के लिए कि क्या राफेल की तत्काल जरूरत थी, भारतीय वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारियों को पेश होने के लिए कहा, तो फिर राजू या एचएएल के दूसरे पूर्व अधिकारियों को इस बात की गवाही देने के लिए क्यों नहीं बुलाया गया कि क्या मार्च, 2015 तक 126 विमानों का टेंडर अंधी सुरंग में पहुंच गया था.

राजू या दूसरों द्वारा मुहैया कराया गया सबूत मोदी सरकार के राफेल समय सारिणी पर थोड़ी रोशनी डाल सकते थे.

8. क्या अंतरसरकारी मार्ग से राफेल खरीदने के लिए आधिकारिक पूर्वशर्तों को पूरा किया गया था?

कोर्ट याचिकाकर्ता के इस दावे का संज्ञान लेता है किस कि 2013 के लिए रक्षा खरीद दिशा-निर्देशों के मुताबिक सरकार को तीन स्थितियों में अंतरसरकारी रास्ते से हथियार या हथियार प्रणाली खरीदने की इजाजत है.

क. अगर संयुक्त अंतरराष्ट्रीय अभ्यासों में भाग लेते हुए हमारे सुरक्षा बलों द्वारा किसी मित्र देश की साबित तकनीक और क्षमताओं की पहचान की जाती है.

ख. अगर किसी विदेशी मित्र देश के पास सेवा में मौजूद ज्यादा मूल्य की हथियार प्रणाली/ प्लेटफॉर्म सामान्य तौर पर काफी कम मूल्य पर हस्तांतरण या बिक्री के लिए उपलब्ध है; या

ग.  अगर किसी विशिष्ट समुउन्नत उपकरण/प्रणाली की खरीद जरूरी हो, जहां ओईएम –उपकरण के असली निर्माता– देश ने इसकी बिक्री पर पाबंदी लगा रखी हो जिसके कारण उपकरण का मूल्यांकन ‘नो कॉस्ट नो कमिटमेंट’ की कसौटी पर नहीं किया जा सके. (जोर अलग से)

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इनमें से किसी भी शर्त को पूरा नहीं किया गया और ऐसा लगता है कि न्यायालय यह कहकर कि प्रक्रिया में ‘छोटे-मोटे विचलन हो सकते हैं’ इसे स्वीकार करता दिख रहा है :‘हमने ध्यानपूर्वक सभी सामग्री का अध्ययन किया है. हमें वायु सेना के वरिष्ठ अधिकारियों से बातचीत का भी लाभ मिला, जिन्होंने अधिग्रहण प्रक्रिया और मूल्य निर्धारण समेत विभिन्न पहलुओं से संबंधित कोर्ट के प्रश्नों का जवाब दिया. हम इस बात को लेकर संतुष्ट हैं कि इस प्रक्रिया पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है और अगर छोटे-मोटे विचलन हुए भी हैं, तो भी उनके लिए करार को रद्द करने या कोर्ट द्वारा विस्तृत जांच की जरूरत नहीं पड़ेगी.’

ऐसा कहने के बाद अदालत ने अपने ही दलील को, जो सैन्य आवश्यकता पर खड़ा किया गया है, अनावश्यक रूप से यह कहते हुए कमजोर कर दिया है कि ‘हमें यह बताया गया है कि संयुक्त अभ्यास हुए हैं और इससे हमारे देश को वित्तीय लाभ मिल रहा है.’

इस ओर इशारा करने के बाद कि अंतरसरकारी करार के लिए पूर्व शर्तों की गैरहाजिरी एक छोटा विचलन हो सकता है, अदालत को भारतीय वायुसेना की नजर में एक दशक से ज्यादा समय से रहे एक विमान के करार को न्यायोचित ठहराने के लिए ‘संयुक्त अभ्यास’ के तिनके का सहारा लेने पर मजबूर होना पड़ा. इससे ऐसा लगता है कि न्यायाधीशों को अपने ही तर्कों पर पूरा यकीन नहीं है.

9. क्या कोर्ट ने राफेल पर सीएजी रिपोर्ट को लेकर गलती की?

सर्वोच्च  न्यायालय पूरा फैसला सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध होने के घंटों के बाद राफेल सौदे पर सीएजी की ऑडिट वाले अनुच्छेद ने बाकी के हिस्से से ज्यादा ध्यान खींचा.

एक बिंदु पर जहां 36 विमानों की कीमत वाले पहलू पर टिप्पणी की गई है, फैसले में कहा गया है :

कीमत के बारे में जानकारियों को हालांकि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) के साथ साझा किया गया है और सीएजी की रिपोर्ट की जांच लोक लेखा समिति (पीएसी) द्वारा की गई है. संसद के सामने इस रिपोर्ट के एक संपादित अंश को ही रखा गया था और यह सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध है. (पृष्ठ 25)

इस टिप्पणी से सिर्फ एक समस्या है. सीएजी की ऐसी कोई रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है, न ही पीएसी द्वारा इसकी जांच की जा रही है.

द वायर  ने पीएसी के सदस्यों बीजद के सांसद भतृहरि महताब और कांग्रेस के सांसद राजीव गौड़ा से बात की और दोनों ने इस रिपोर्ट को संसदीय समिति के साथ साझा किए जाने की बात से इनकार किया.

गौड़ा ने द वायर  से कहा, ‘मुझे लोक लेखा समिति का हिस्सा बने एक साल से कम वक्त हुआ है, लेकिन मुझे कोई सीएजी रिपोर्ट नहीं दिखाई गई है.’

यह भी साफ नहीं है कि क्या रिपोर्ट का कोई संपादित रूप संसद के सामने पेश किया गया है.

शुक्रवार की शामें याचिकाकर्ता प्रशांत भूषण ने एक बयान में कहा कि तथ्य यह है इस मामले में तथ्य ‘न तो ऑन रिकॉर्ड हैं और न ही तथ्यात्मक रूप से सही हैं.’

भूषण ने आरोप लगाया, ‘साफतौर पर तथ्यात्मक तौर पर यह गलत बयान सरकार द्वारा कोर्ट के साथ किए गए किसी संचार पर (जो रिकॉर्ड में नहीं है और हमारी जानकारी में नहीं है) पर आधारित होगा. यह तथ्य कि कोर्ट ने किसी ऐसे संचार पर भरोसा किया है, जिसमें तीन तथ्यात्मक गलतियां हैं, यह दिखाता है कि कोर्ट द्वारा बंद लिफाफे में दिए गए बयानों पर (जिनकी जांच नहीं की जा सकती है और न जिन्हें सत्यापित किया जा सकता है) भरोसा करना और उसके आधार पर फैसला सुनाना कितना खतरनाक  है.

राष्ट्रीय लेखाकार अभी राफेल की कीमत के मसले की जांच कर रहे हैं. पिछले महीने 60 सेवानिवृत्त नौकरशाहों ने सीएजी को एक पत्र लिखकर यह शिकायत की थी वह जानबूझकर नोटबंदी और विवादास्पद विमान सौदे पर रिपोर्ट को लटका रहा है. 

(द वायर )



Generic placeholder image


आचार संहिता लागू होने से एक दिन पहले भाजपा को दिल्ली में मिली दो एकड़ ज़मीन
20 Mar 2019 - Watchdog

जस्टिस पिनाकी चंद्र घोष भारत में लोकपाल के पहले अध्यक्ष नियुक्त
20 Mar 2019 - Watchdog

पुण्य प्रसून की ‘सूर्या समाचार’ से छुट्टी!
19 Mar 2019 - Watchdog

नरेंद्र मोदी का ‘मैं भी चौकीदार’ अभियान महज़ पाखंड है
19 Mar 2019 - Watchdog

गोवा के मुख्यमंत्री और पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर का निधन
18 Mar 2019 - Watchdog

मोदी की बड़ी रणनीतिक भूल है “मैं भी चौकीदार हूं!”
17 Mar 2019 - Watchdog

जस्टिस घोष होंगे देश के पहले लोकपाल
17 Mar 2019 - Watchdog

IAS छोड़ राजनीति में आए शाह फैसल ने लॉन्च की अपनी पार्टी
17 Mar 2019 - Watchdog

बीजेपी को बड़ा झटका, पूर्व सीएम बीसी खंडूरी के बेटे मनीष खंडूरी कांग्रेस में शामिल
16 Mar 2019 - Watchdog

बच्चों के हर्ष व उल्लास का त्योहार है फूलदेई
15 Mar 2019 - Watchdog

सर्वोच्च न्यायालय का वीवीपैट को लेकर दाखिल 21 विपक्षी दलों की याचिका पर चुनाव आयोग को नोटिस
15 Mar 2019 - Watchdog

मसूद अजहर संबंधी नाकामी भी नेहरू के मत्थे!
15 Mar 2019 - Watchdog

न्यूज़ीलैंडः दो मस्जिदों में गोलीबारी, 40 लोगों की मौत
15 Mar 2019 - Watchdog

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के नाम प्रो. शम्सुल इस्लाम का खुला पत्र
13 Mar 2019 - Watchdog

नोटबंदी से पहले आरबीआई ने कहा था, नोट बैन से ख़त्म नहीं होगा काला धन
12 Mar 2019 - Watchdog

गोदी मीडिया का बहिष्कार करे विपक्ष
11 Mar 2019 - Watchdog

देश में आज से आचार संहिता लागू, सभी मतदान केंद्रों पर VVPT का होगा इस्तेमाल
10 Mar 2019 - Watchdog

युद्धोन्मादी अन्धराष्ट्रवाद के ख़िलाफ़ दहाड़कर बोलना होगा ! चुप्पी कायरता है !
10 Mar 2019 - Watchdog

लोकसभा चुनावों में धनबल, हिंसा और नफ़रत का बोलबाला होगा: पूर्व सीईसी
10 Mar 2019 - Watchdog

डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा, अमेरिका भारत को व्यापार में तरजीह देने का दर्जा वापस लेगा
05 Mar 2019 - Watchdog

कश्मीरियों पर नहीं बल्कि लखनवी तहजीब पर हमला है!
09 Mar 2019 - Watchdog

बयान से पलटे अटॉर्नी जनरल, कहा- रक्षा मंत्रालय से चोरी नहीं हुए रफाल दस्तावेज़
09 Mar 2019 - Watchdog

राजस्थान में भारतीय वायु सेना का मिग-21 विमान दुर्घटनाग्रस्त
08 Mar 2019 - Watchdog

14 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंची कृषि आय
03 Mar 2019 - Watchdog

बातचीत से सुलझेगा अयोध्या विवाद, सुप्रीम कोर्ट ने मामला मध्यस्थता के लिए सौंपा
08 Mar 2019 - Watchdog

राफेल सौदे में रंगे हाथों पकड़ी गई चौकीदार की चोरी, दर्ज हो एफआईआर: कांग्रेस
06 Mar 2019 - Watchdog

बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद का मदरसा अब भी खड़ा है : रॉयटर्स
06 Mar 2019 - Watchdog

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया, राफेल से जुड़े दस्तावेज चोरी
06 Mar 2019 - Watchdog

भाजपा के दोबारा सत्ता में न आने पर संसद पर हमला कर देगा पाकिस्तान
04 Mar 2019 - Watchdog

देशभक्ति इसे कहते हैं जो Altnews करके दिखाता है
02 Mar 2019 - Watchdog


राफेल सौदा: वो सवाल जिनका जवाब सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में नहीं मिलता