दुविधा में दोनों गए, माया मिली न राम !

Posted on 08 Jan 2019 -by Watchdog

लाल बहादुर सिंह

दो नावों की सवारी के चक्कर में मोदी जी का 2019 में वही हस्र होने जा रहा जो 1989 में ऐसी ही कवायद में लगे राजीव गांधी का हुआ था!

जी हां, याद करिये । 1984/5 में राजीव गांधी ने अभूतपूर्व बहुमत से सरकार बनायी थी । राजीव ने पहले एक समुदाय को साधने के लिए शाहबानो मामले में संसद से कानून बनाया । फिर उसे प्रतिसंतुलित करने के लिए अयोध्या में मंदिर का ताला खुलवाया । 30 साल बाद 2014 में मोदीजी की वैसे ही गाजे-बाजे के साथ अकेले बहुमत की सरकार बनी । दलित आक्रोश में झुलसते मोदी पहले मजबूरन SC-ST Act पर कानून ले आये । फिर उसे प्रतिसंतुलित करने के लिए सवर्ण आरक्षण की घोषणा !

तब वे बोफोर्स के बवंडर में घिरे थे, आज मोदीजी राफेल के रण में लहूलुहान ! जाहिर है, राजीव को न शरिया से कोई मुहब्बत जाग उठी थी, न मंदिर के प्रति आस्था का विस्फोट हुआ था ! ठीक वैसे ही मोदी जी न दलितों के दर्द में दुबले हुए जा रहे हैं, न गरीब सवर्णों के लिए अचानक उनके मन में प्यार का सागर उमड़ पड़ा है !

जी हां, आज की नयी चाणक्य-नीति का आदर्श वाक्य (Motto) है -" सबका साथ, सबके साथ विश्वासघात"! क्या यह घोषणा सामाजिक-शैक्षणिक पिछड़ेपन की संविधान की कसौटी के अनुरूप है? संसद में क्या यह कानून का रूप ले पायेगी ? क्या यह सर्वोच्च न्यायालय में Legal Scrutiny में टिक पायेगी?

सच्चाई यह है कि मोदीजी और उनके दोनों चाणक्य, मोटा भाई और प्रकांड विद्वान वकील साहब सब अच्छी तरह जानते हैं कि इन सारे सवालों का जवाब है big No ! फिर सवर्ण गरीबों के साथ यह भद्दा मजाक क्यों किया जा रहा है ? बेरोजगारी की आग में झुलसते नवजवानों की भावनाओं के  साथ यह क्रूर खिलवाड़ क्यों ? इस शिगूफे की जरूरत इसलिए पड़ी, क्योंकि, मोदी सरकार ने कारपोरेट विकास की बलिवेदी पर रोजगार सृजन को कुर्बान कर दिया ! 2 करोड़ प्रतिवर्ष रोजगार देने के वायदे से विश्वासघात किया ! नोटबंदी जैसी मूर्खतापूर्ण, विनाशकारी नीतियों द्वारा रोजगार की रही सही संभावनाओं को भी ख़त्म कर दिया । सरकारी नौकरियों को freeze कर दिया, ठेके पर दे दिया !

भयावह स्तर पर पहुंचती बेरोजगारों की फौज से निपटने के लिए कारपोरेट पूंजीवादी सत्ता के ये फासीवादी समाधान है - कमलनाथ का यूपी बिहार वालों को कोसना हो, चाहे आरक्षण का बढ़ता हुआ कलरव हो- एक ऐसे दौर में जब सरकारी नौकरियां ही ख़त्म हो रही हैं !

यह रोजगार सृजन कर पाने में अपनी विराट विफलता की छिपाने का षड्यंत्र है ! बहरहाल, जनता से, देश की युवा शक्ति से विश्वासघात का एक ही अंजाम होगा । दो नावों की सवारी गांठने की मोदी जी की रणनीति  2019 में उसी नियति की ओर बढ़ रही है, जिस गति को 1989 में ऐसी ही नीति पर चलते राजीव गांधी प्राप्त हुए थे ! क्योंकि, इस देश की जनता, युवा आपकी विफलता, मूर्खता, अज्ञान सब माफ़ कर सकते हैं लेकिन धोखाधड़ी और विश्वासघात नहीं !

(लेखक लाल बहादुर सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रह चुके हैं और आजकल लखनऊ में रहते हैं।)



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