भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का आरएसएस का सपना पूरा होने वाला है

Posted on 09 Aug 2019 -by Watchdog

यह भारत के संवैधानिक इतिहास का सबसे खराब दिन है, जिसका नतीजा देश के विघटन के तौर पर निकल सकता है.

कांग्रेस नेता, वकील और पूर्व गृहमंत्री पी. चिदंबरम के इन कठोर शब्दों को डरावनी भविष्यवाणी कहा जा सकता है.

लेकिन अनुच्छेद 370 को समाप्त करने के बाद, जिससे असल में जम्मू कश्मीर का दर्जा बदल गया है और राज्य के पुनर्गठन के बाद, जो राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बदल देगा, देश के दूसरे राज्यों के दर्जे पर भी सवालिया निशान लग सकता है. वास्तव में राज्यों के संघ के तौर पर भारत के बुनियादी उसूलों की जड़ें हिल गई हैं.

इस काम को जिस तरह से अंजाम दिया गया- सुरक्षा बलों की संख्या बढ़ाकर, विपक्ष के नेताओं को गिरफ्तार करके, जिनमें दो पूर्व मुख्यमंत्री भी शामिल हैं, और संचार के सभी साधनों को बंद करके- वह दिखाता है कि भाजपा की सरकार अपनी मर्जी चलाने के लिए सभी उपलब्ध हथकंडों का इस्तेमाल करने से नहीं चूकेगी. और जनमत या राजनीतिक राय चाहे जो भी हो, इसके रास्ते में नहीं आएगा.

यह भाजपा के लिए अपने सभी मनपसंद परियोजनाओं पर आगे बढ़ने के लिए मुफीद समय है. उसे अब न कोई रोकनेवाला है और न उसे किसी तरफ से कोई चुनौती मिलने का डर है.

अयोध्या में राम मंदिर, समान नागरिक संहिता, संविधान में बदलाव, मुसलमानों को सांस्थानिक तौर पर हाशिये पर डालना और भी कई मुद्दे उसके दिल के करीब रहे हैं. अनुच्छेद 370 को हटाना संघ परिवार का लंबे समय से संजोया हुआ सपना था, जिसे आखिरकार साकार कर लिया गया.

किसी भी विरोध को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और किसी भी छोटे-मोटे कानूनी या संवैधानिक अस्पष्टता को आड़े नहीं आने दिया जाएगा. जहां तक जनमत का या सीधे तौर पर प्रभावित होनेवाली जनता का सवाल है- तो वे होते कौन हैं, जब राष्ट्र ने सरकार को प्रचंड बहुमत दिया है?

प्रचंड जनसमर्थन मिलने के तथ्य का इस्तेमाल भाजपा और इसके समर्थकों द्वारा हर समय हर फैसले को न्यायोचित ठहराने के लिए किया जा रहा है- भले ही उन पर कितने ही सवालिया निशान क्यों न लगे हों. ले

किन सरकार को- और किसी भी सरकार को- चुनौती जरूर दी जानी चाहिए और उससे सवाल पूछा जाना चाहिए; जनता के प्रति जवाबदेही लोकतंत्र की बुनियादी खासियत है जिसकी फिक्र भाजपा को रत्तीभर भी नहीं है.

भले मामला आरटीआई सवालों का जवाब देने का हो, या प्रेस कॉन्फ्रेंस करने से इनकार करने का हो, या जैसा कि हमने हाल ही में वित्त मंत्रालय के मामले में देखा, संवाददाताओं को सवाल पूछने से रोकने का हो, सरकार को हर उस चीज से दिक्कत है, जो उसकी जिम्मेदारी तय करती है.

अपने पहले अवतार में मोदी सरकार विवादास्पद फैसले लेते वक्त थोड़ी हिचक या अनिश्चय का प्रदर्शन करती थी. हालांकि कोई अपराधबोध या पछतावा या कोई सफाई नहीं दी जाती थी, लेकिन यह साफ था कि दूसरे राजनीतिक दलों या टिप्प्णीकारों द्वारा की जाने वाली आलोचना या वास्तव में प्रभावित होने वाले लोगों की व्याकुलता- से थोड़ा-सा फर्क पड़ता था.

राहुल गांधी के सूट बूट की सरकार  वाले तंज ने मोदी को इतना परेशान किया कि उन्होंने अचानक अपनी आर्थिक नीतियों की दिशा बदल दी. वहीं वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) में किए गए कई बदलाव व्यापारियों द्वारा निरंतर तरीके से की जानेवाली शिकायतों का नतीजा थे.

किसी कदम के लिए कभी कोई माफी नहीं मांगी गई, लेकिन यह साफ था कि जनमत अहमियत रखता था. लेकिन अब ऐसा नहीं है.

कानूनों को जल्दबाजी में पेश किया जा रहा है और विपक्ष को या तो मिला लिया गया है या उसे अनदेखा किया जा रहा है. कुछ मामलों में कांग्रेस समेत विपक्षी पार्टियों ने भाजपा द्वारा जल्दबाजी में बेहद अहम विधेयकों को लाए जाने और उन्हें पारित किए जाने का समर्थन किया है.

हमें मालूम पड़े इससे पहले, संसद ने ऐसे कानून लागू कर दिए हैं, जिन्होंने सत्ता को हमारे जीवन पर नियंत्रण स्थापित करनेवाली अप्रत्याशित शक्तियां दे दी हैं- किसी को भी किसी भी समय आतंकवादी घोषित किया जा सकता है और बिना मुकदमा चलाए उसे गिरफ्तार किया जा सकता है. सूचना के अधिकार को संशोधित करके इसे असरहीन बना दिया गया है.

विरोध में उठनेवाले चंद स्वर फैसला लेने की प्रक्रिया को प्रभावित करने में नाकाम रहे हैं. किसको यह पता है या किसको इससे फर्क पड़ता है कि पूर्व सूचना आयुक्तों ने आरटीआई को कमजोर करने के खतरों के प्रति आगाह किया है? इससे सरकार के इरादों में कोई बदलाव नहीं आनेवाला है.

यह देखते हुए कि सरकार के पास संसद में अच्छा खास बहुमत है और इसके पास करने के लिए कई महत्वपूर्ण काम है, सवाल है कि आखिर सरकार को इतनी जल्दबाजी किस बात की है?

निश्चित तौर पर अभी सबसे पहली प्राथमिकता अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की होनी चाहिए थी, जो फिलहाल बुरे दौर से गुजर रही है. नई नौकरियां तैयार होने की जगह नौकरियां जा रही हैं और उपभोक्ता मांग अपने सबसे निचले स्तर पर है; क्या सरकार के लिए यह चिंता का सबब नहीं होना चाहिए?

अर्थव्यवस्था की अपनी अहमियत है, लेकिन भाजपा के लिए और इसके मार्गदर्शक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के लिए- इसका वर्षों पुराना एजेंडा ज्यादा अहमियत रखता है. संघ परिवार का एक सपना है और इसने उसे पूरा करने के लिए दशकों से अथक तरीके से मेहनत की है. इसे जब भी मौका मिला है, यह अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ने से नहीं चूका है.

जनसंघ के तौर पर यह जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में शामिल हुआ, जनता पार्टी का हिस्सा बना. इसने वीपी सिंह की अल्प अवधि तक चली सरकार की बैसाखी बनने से भी गुरेज नहीं किया- ये सब सत्ता के नजदीक पहुंचने के सुनियोजित कदम थे.

एक समय आरएसएस पर प्रतिबंध लगा हुआ था और आपातकाल के दौरान इसके नेता जेल में थे और भाजपा दो सीटों पर सिमट गई थी, लेकिन इसकी महत्वाकांक्षा या लक्ष्यों में कभी बदलाव नहीं आया. वाजपेयी सरकार के समय में यह असर डालने की स्थिति में था, लेकिन गठबंधन की सरकार होने के कारण इसके कई लक्ष्य पूरे नहीं हो पाए.

अब जबकि मोदी की सरकार है, संघ परिवार अपने आखिरी और सबसे चहेते लक्ष्य- हिंदू राष्ट्र, को पूरा करने के करीब है. सरकार का हर कदम उसे इस लक्ष्य के और करीब ला रहा है. हिंदू भारत को भारत के संविधान में शामिल करना है और उसे एक निर्वाचित सरकार द्वारा वैधता प्रदान करनी है; इससे कुछ भी कम पर आरएसएस संतोष नहीं करनेवाला है.

अगर संविधान इसकी इजाजत नहीं देता है, तो उसे बदला जा सकता है, लेकिन इस पर उसकी स्वीकृति की मुहर जरूरी है. उसके बाद आरएसएस यह गर्व के साथ कहा सकता है कि यह लोगों की इच्छा है. संघ परिवार इस मुकाम तक जल्दी से जल्दी पहुंचाना चाहेगा.

2022 में भारत की आजादी की 75वीं वर्षगांठ या 2025 में आरएसएस के शताब्दी वर्ष को इस लिहाज से याद करके रखा जा सकता है. लेकिन नरेंद्र मोदी और अमित शाह इतना इंतजार करना शायद ही पसंद करें. आपको पता ही है कि वे तेजी से फैसले लेनेवाले लोग हैं.

और भले ही भारत में कई लोग इस घटनाक्रम से व्यथित हैं- जैसा कि बाबरी मस्जिद को गिराए जाने के वक्त थे- लेकिन किसी को भी किसी किस्म के भ्रम में नहीं रहना चाहिए.

इस कदम को बड़ी संख्या में लोगों का समर्थन हासिल है जिनके पास ताकत है, विशेषाधिकार है और जो अपनी आवाज को सबको सुनाने की क्षमता रखते हैं, यह स्वीकृति सिर्फ ट्रोल आर्मी या भक्तों की तरफ से या बिके हुए मीडिया की तरफ से नहीं आ रही है- अमूमन काफी समझदार दिखनेवाले लोग भी यह सब किए जाने से खुश हैं.

ठीक वैसे ही जैसे वे भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित किए जाने के वक्त खुश होंगे. यह अब सिर्फ संघ परिवार का सपना नहीं रह गया है.

  द वायर के संस्थापक संपादक हैं। यह आलेख वायर से साभार लिया गया है।



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