अशोक और बलबीर: गुजरात दंगों और अयोध्या के दो सबक

Posted on 03 Dec 2018 -by Watchdog

कलीम सिद्दीकी

अहमदाबाद। चुनावी वातावरण में शिव सेना के अयोध्या कूच और राम मंदिर के उसके अलाप को पूरे देश ने अनसुना कर दिया। उसके बाद धर्मसभा के जरिये मंदिर को मुद्दा बनाने की विश्व हिंदू परिषद की कोशिश की सोशल मीडिया ने हवा निकाल दी। साथ ही लोगों ने ये भी बता दिया कि इस बार वो अपना होश नहीं खोने जा रहे हैं। क्योंकि ये बात अब सबको पता चल गयी है कि जोश में युवा वह सब कुछ कर बैठते हैं जो राजनैतिक दल चाहते हैं लेकिन बाद में उनके पास पश्चाताप के सिवा कुछ नहीं बचता। 

शिवसेना के अयोध्या कूच पर कुछ हो पाया हो या नहीं लेकिन इसने कुछ पुराने जख्मों को हरा जरूर कर दिया और उसने अपने तरीके से एक बार फिर लोगों को सोचने के लिए मजबूर कर दिया। इस मामले में गुजरात दंगों के पोस्टर ब्वाय रहे अशोक परमार और बाबरी मस्जिद विध्वंस पर पहली कुदाल चलाने वाले बलबीर सिंह का जीवन सबसे प्रमुख है। मंदिर आंदोलन की नई सुगबुगाहट के बीच सोशल मीडिया में इनकी जमकर चर्चा हुयी। 

बलबीर सिंह मुसलमान हो चुके हैं और तब्लीग़ जमात से जुड़ कर इस्लाम का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। जबकि अशोक परमार उर्फ़ मोची जो 2002 के समय हिंदुत्व का पोस्टर ब्वॉय बन कर उभरे थे और दलित समुदाय से आते हैं अब वामपंथ की ओर झुक चुके हैं। 

समय की विडंबना देखिए मंदिर आंदोलन के अगुवा देश, समाज और राजनीति में अब कहां-कहां पहुंच गए हैं। लेकिन अशोक के हिस्से में गुरबतों का समुंदर आया। संचार क्रांति के इस दौर में अशोक के पास एक अदद मोबाइल फोन तक नहीं है। किन्हीं दूसरी सुख-सुविधाओं की बात तो दूर अपना कोई स्थाई ठिकाना भी उन्हें मयस्सर नहीं हुआ। हाल में बहुत सारी खबरें मीडिया में आईं लेकिन पहले से छपी छपाई ख़बरों के आधार पर ही उनकी बातें रहीं। इसीलिए इन पंक्तियों के लेखक ने अशोक परमार से आमने-सामने की मुलाक़ात की ताकि जनचौक के पाठकों को उनकी वर्तमान परिस्थिति से रूबरू कराया जा सके।

अशोक परमार अहमदाबाद के शाहपुर दरवाज़े के पास  मोचीगिरी का काम करते हैं। उन्होंने 55 फीसदी अंक के साथ डीएवी हाई स्कूल से दसवीं की परीक्षा पास की थी। अशोक मेधावी छात्र थे। और जीव विज्ञान उनका प्रिय विषय था। यही वजह है कि जीव विज्ञान में उनको सबसे ज्यादा 75 अंक मिले थे। हालांकि गणित ने उन्हें धोखा दे दिया था और उसमें वो महज पासिंग मार्क ही हासिल कर सके। लेकिन 2002 के गुजरात दंगे उनके जीवन में किसी भूचाल से कम नहीं थे। तमाम तबाह मुस्लिम जिंदगियों में एक हिंदू नाम अशोक भी शामिल था।

हालांकि चेहरे के तौर पर वो देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में मशहूर हो गए। लेकिन ये वरदान कम अभिषाप ज्यादा साबित हुआ। ये पहचान खुद उन्हें भी रास नहीं आयी। लिहाजा इतिहास की एक गल्ती मानकर वो उसे अब भूल जाना चाहते हैं। 2002 से उन्होंने वोट नहीं डाला है। इलेक्शन आईडी कार्ड, न ही आधार कार्ड जैसा कोई पहचान पत्र उनके पास है। अशोक का कहना है कि "मेरे पास कोई डॉक्यूमेंट नहीं है जिससे मैं अपनी पहचान बता सकूं। मीडिया में चल रही मेरी तस्वीर ही मेरा पहचान पत्र है।" 

गुजरात दंगे ने बहुत सारे लोगों को फर्श से अर्स पर पहुंचा दिया। किसी को शीर्ष सत्ता मिली तो किसी ने बड़ा ओहदा हासिल कर लिया। लेकिन दंगों के इस पोस्टर ब्वॉय को सिर पर एक छप्पर तक नसीब नहीं हुआ। 4- 5 साल पहले तक मोची का काम करने के बाद अशोक फुटपाथ पर ही सो जाया करते थे। लेकिन पड़ोस के आरडी देसाई स्कूल के प्रिसिंपल को अशोक पर दया आयी और उन्होंने उन्हें रात में स्कूल में ही सोने की इजाजत दे दी। तब से स्कूल ही उनका अपना आशियाना हो गया। रात में अशोक स्कूल की ही एक गैलरी में सो जाते हैं और फिर सुबह होते ही नित्य क्रिया के बाद फुटपाथ पर अपनी दुकान सजा लेते हैं। 

लेकिन बात करने पर अशोक के पुराने जख्म टीस बनकर निकलने लगते हैं। हालांकि उन पर वो ज्यादा बात नहीं करना चाहते हैं। बहुत कुरेदने पर जो सामने आया है वो देश की सियासत को नंगा करने के लिए काफी है। एक दौर में धर्म के लिए सब कुछ कुर्बान करने वाले अशोक का उसको लेकर नजरिया अब बिल्कुल बदल गया है। अशोक की टिप्पणी किसी बड़े से बड़े बुद्जीवी को भी चौंकाने लिए काफी है। राम मंदिर विवाद पर राय पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि "यह देश 1947 से देश बना है उससे पहले रियासत, राजा-रजवाड़े,  नवाबों में बंटा हुआ था। परिस्थिति हमेशा एक जैसी नहीं रहती। साढ़े चार सौ साल पहले बाबर ने अपनी शक्ति से सत्ता हासिल की थी। उस समय ऐसे ही सत्ता मिलती थी। गणतंत्र नहीं था। उस समय किसी ने राम मंदिर की बात नहीं की। न ही किसी हिन्दू राजा, पंडित ने कोई विरोध किया। आज एक गणतांत्रिक देश में राम मंदिर की हठ ठीक नहीं।" 

अशोक बीजेपी को ही नहीं गलत ठहराते हैं बल्कि विपक्षी दल के तौर पर कांग्रेस की भूमिका से भी वो संतुष्ट नहीं हैं। और एक बार उसी मुद्दे पर उसकी घेरेबंदी करते हैं जिसको कभी वो सबसे ऊपर रखते थे। पांच राज्यों के चुनाव पर टिप्पणी करने के बहाने अशोक कहते हैं कि "कांग्रेस ने अभी तक पुरानी गल्तियों से सीखा नहीं। मंदिर-मंदिर, गोत्र, जनेऊ  की आवश्यकता तभी पड़ती है जब काम नहीं करने हों वरना अरविन्द केजरीवाल की तरह काम करें तो जनता खुद ही वोट देगी।"

मुसलमानों को लेकर भी उनके नजरिये में बदलाव आया है। और उनकी गलत छवि पेश करने के लिए भी वो सियासी दलों को निशाने पर लेते हैं। अशोक का कहना है कि "मुसलमान भारत के मूलनिवासी हैं। परिस्थिति के चलते धर्म परिवर्तन किया था। कांग्रेस ने मुसलमानों की छवि केवल मुसलमान (के तौर पर) प्रचारित की है। यदि मूल निवासी मुसलमान जैसी छवि गढ़ी गई होती तो इनकी बहुत सी समस्याओं का निदान सरकारें आसानी से कर पातीं और तुष्टीकरण का आरोप भी नहीं लगता।"

अशोक का मौजूदा पेशा मोचीगिरी है और उसी से जीवन का गुजर-बसर होता है। लेकिन आजकल मेट्रो निर्माण के चलते बदले गए रूट की जद में उनकी दुकान भी आ गयी है। नतीजतन उनका यह कारोबार भी बिल्कुल मंदा हो गया है। और इस बीच उनकी पीठ पर तीन हजार का कर्ज चढ़ गया है। ऊपर से एक नये बदलाव ने उनकी रोजमर्रा की जिंदगी को भी संकट में डाल दिया है। चूंकि आजकल स्कूल छह बजे सुबह से ही शुरू हो जाता है इसलिए उन्हें रात में 8 बजे ही सो जाना पड़ता है। फिर सुबह छह बजे से पहले ही सर्द भरी इस रात में स्कूल छोड़ देना पड़ता है। 

हालांकि अशोक को अख़बार पढ़ने का शौक़ है। लिहाजा इस गुरबत भरे दौर में भी उसे नहीं छोड़ पाए हैं। और अपनी भूख पर भारी हो चुकी इस आदत पर वो 20 रूपये खुशी-खुशी खर्च कर देते हैं।

दूसरी कहानी बलबीर सिंह की है जो अब मुहम्मद आमिर बन चुके हैं। पानीपत के रहने वाले बलबीर सिंह कभी आरएसएस की शाखा में जाया करते थे। और शिवसेना के सदस्य थे। उन्हें बताया गया था कि मुस्लिम आक्रमणकारियों ने मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाया था। उन्हें इस बात का गुस्सा रहता था। और बदले की भावना से 6 दिसंबर 1992 को अपने मित्र योगेंद्र के साथ वो बाबरी मस्जिद गिराने अयोध्या पहुंच गए। कुदाल चलाने में भी वो किसी भी कारसेवक से आगे थे। पानीपत वापस आये तो हीरो सरीखा स्वागत हुआ। लेकिन घर पहुंचने पर माहौल बिल्कुल उल्टा था।

घर के लोगों ने शाबाशी की जगह लानतें दीं। और उनके इस कृत्य से बहुत नाराजगी थी। क्योंकि पिता दौलतराम गांधीवादी थे और उन्हें बलबीर का ये काम बिल्कुल पसंद नहीं आया। उन्होंने बलबीर को घर निकाला दे दिया। बलबीर को लगा कि कुछ गलत हो गया। कुछ समय बाद वह अपने मित्र योगेंद्र से मिले तो पता चला कि योगेंद्र मुसलमान हो चुका है। योगेंद्र के साथ बलबीर मुज़फ़्फ़रनगर के पास स्थित फुलट के मौलाना कलीम सिद्दीक़ी से मिले। कुछ समय फुलट में रहने के बाद बलबीर भी मोहम्मद आमिर हो गए। अब तब्लीग़ से जुड़कर इस्लाम का प्रचार और मस्जिदें बनाने का काम कर रहे हैं। अपनी गल्तियों के पश्चाताप के लिए उन्होंने यही तरीका ढूंढा है। 

 ‘बाबरी मस्ज़िद विध्वंस’ में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने वाले बलबीर आज देश-भर में मस्ज़िद बनाते हैं। उन्होंने मस्ज़िदों की सुरक्षा करने का भी फैसला लिया है। मुम्बई मिरर से एक बातचीत में उन्होंने कहा कि "मैंने और योगेन्द्र दोनों ने अयोध्या में श्री राम मंदिर का निर्माण करने की प्रतिज्ञा की थी, लेकिन अब 100 मस्जिदों का नवीनीकरण करके हमने अपने पाप धोने का वचन लिया है।"

ये दोनों कभी हिंदुत्व के पोस्टर ब्वॉय हुआ करते थे। लेकिन अपनी गल्ती का एहसास कर इन्होंने अपने जीवन का रास्ता बदल लिया है। बलबीर और योगेंद्र के पश्चाताप ने उन्हें सोच, विचार और मान्यताओं के एक दूसरे मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया है। उसका नतीजा ये रहा कि कभी जिन हिंदू संगठनों के लिए ये बेहद प्यारे हुआ करते थे अब वो उनके पास भी नहीं फटकना चाहते हैं। 



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