सांप्रदायिक नफ़रत की लहलहाती फ़सल, कांग्रेस बोती है, आरएसएस काटता है !

Posted on 07 Aug 2018 -by Watchdog

श्मसुल इस्लाम

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के मामले में उस्ताद है। आज़ादी के बाद से यह दिन-रात इसी काम में लगा है कि किस तरह से भारत की धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक राजनीति को अस्थिर कर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण किया जाए। इसके लिए वह देश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ़ नफ़रत और विद्वेष का वातारण बनाने में जुटा रहता है। मुसलमान और र्इसार्इ खासतौर से उसके निशाने पर हैं। अफसोस की बात यह है कि यह टोली इन राष्ट्र-विरोधी शैतानी मंसूबों में अक्सर कामयाब भी होती रही है। इसके लिए वे जिन जहरीले हथकंडों को कुप्रचार के लिए इस्तेमाल करते आए हैं वे इस प्रकार हैं- धर्मांतरण का हौव्वा खड़ा करने के लिए र्इसार्इ मिशनरियों के विरोध में प्रचार किया जाता है कि ये हिन्दुओं को धर्मांतरित कर जिस तेजी से र्इसार्इ बना रहीं हैं इससे तो जल्द ही भारत 'पादरीस्तान' बन जाएगा। गाय भी उनके लिए एक सांप्रदायिक मुद्दा है। वे मुसलामानों के विरोध में नफरत, हिंसा के लिए इसे लगातार  इस्तेमाल करते आए हैं। उनका दावा है मुसलमानों के आगमन के बाद से ही देश में गौहत्या प्रारंभ हुर्इ है। 

    इसी प्रकार वंदे मातरम् को उन्होंने मुसलमानों का विरोध करने के लिए एक मुद्दा बनाकर उछाल दिया है। वे मुसलमानों को लक्ष्य कर कहते हैं 'भारत में रहना है तो वंदे मातरम्  कहना होगा'। अयोध्या में राम मंदिर, उन्होंने 'रामज़ादे बनाम बाबरज़ादे' के बीच लड़ार्इ के तौर इसे मुद्दा बनाकर बतौर हथियार इस्तेमाल कर रहे हैं। मुस्लिम तुष्टिकरण भी इसी प्रकार का एक मुद्दा है।

अब असम:

      आरएसएस और इसके राजनीतिक उपांग भाजपा को मुस्लिम विरोध की नफ़रत की राजीति के इस्तेमाल के लिए असम में नागरिकता के रूप में ऐसा ही मुद्दा मिल गया है। राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) का दूसरा और अंतिम मसौदा 30 जुलाई, 2018 को प्रकाशित हो गया है। इसके अनुसार असम राज्य की कुल आबादी में से 40,07,707 लोग, जो कि राज्य की कुल आबादी का लगभग 10प्रतिशत से अधिक हैं, देश के नागरिक ही नहीं हैं! इस बिना पर आरएसएस/भाजपा के नेतागण उन्हें 'घुसपैठिया' बता रहे हैं और खुशियां मना रहे हैं। भाजपा अध्यक्ष अमितशाह ने तो इन सबको बांग्लादेशी घोषित कर दिया है।

      भाजपा के अध्यक्ष और आरएसएस के वरिष्ठ विचारक संसद में और संसद के बाहर घोषणाएं कर रहे हैं, "ये 'घुसपैठिए' देश की राष्ट्रीय सुरक्षा को नुकसान पहुंचा रहे हैं"। आरएसएस/भाजपा नेताओं ने तुरंत ही अन्य राज्यों में भी घुसपैठियों की पहचान किए जाने की मांग प्रारंभ कर दी है।

राजस्थान के गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया ने भारत के सभी राज्यों से अपील की है कि ऐसे "कपटी गद्दारों" को  खोज निकालने के लिए असम के उदाहरण का अनुसरण किया जाना चाहिए। इस से उनका मतलब शायद यह ही है कि हर  वह शख्स जो मुस्लिम है, उसकी भारतीय नागरिकता की पात्रता  और  इसके लिए आवश्यक प्रमाणपत्रों की जांच होनी चाहिए। हिंदुत्व के जुनून में ये लोग इस तथ्य को भी अनदेखा कर रहे हैं कि एनआरसी द्वारा जारी सूची में जो नाम छूट गए हैं, उनमें अनेक हिंदू भी हैं।

      यह सब इस तथ्य के बावजूद हो रहा है, जबकि असम में संदिग्ध नागरिकों का पता लगाने की यह क़वायद जिस अधिकारी के नेतृत्व में संपन्न हुर्इ है और जिस की देख-रेख में एनआरसी मसौदा तैयार हुआ है, ने साफ लफ़्जों में कह दिया है "हम यह नहीं कह सकते कि ये सभी 40 लाख घुसपैठिए हैं।"

सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त समन्वयक के रूप में ये अधिकारी प्रतीक हजेला हैं। उन्होंने इन सभी को घुसपैठिया बताए जाना "जल्दबाजी" बताते हुए कहा है, "अंतिम मसौदे" में जिनके नाम नहीं हैं उन सभी 40,07,707 लोगों को एक समूह में नहीं रखा जा सकता, न ही इन सब को अवैध प्रवासी कहा जा सकता है। रजिस्टर की जारी यह सूची अभी मात्र एक मसौदा है।

हजेला ने स्वीकार किया कि एनआरसी के मसौदे को अंतिम रूप देने में "त्रुटियां हो सकती हैं" क्योंकि यह एक "दस्ती कार्यवाही" यानी कि हाथ से लिख कर तैयार प्रकिया है, जिसमें मानवीय भूलों की संभावनाएं हैं। जिन लोगों के नाम मसौदे की सूची में नहीं हैं उन्हें "किसी भी प्रविष्टि पर आपत्ति" पेश करने के लिए मौका मिलेगा। चुनांचे, उन्होंने यह साफ कर दिया है, "इन लोगों को अपने परिचय प्रमाण से संबंधित दस्तावेजों को सिद्घ करने के लिए अभी एक और अवसर  मिलेगा। इसके बाद हम अंतिम एनआरसी जारी करेंगे, जो कि मसौदा नहीं होगी। इसके साथ एनआरसी की प्रक्रिया पूर्ण हो जाएगी।

बहरहाल, व्यक्ति अवैध प्रवासी है या नहीं यह विषय इसका फैसला न्यायिक जांच के माध्यम से ही निर्णित हो सकता है। असम में इसके लिए एक निश्चित कानूनी व्यवस्था है जिसे.. अवैध विदेशी की पहचान के लिए  ट्रिब्यूनल (IMDT) बनाया गया है।"

      सत्ता के गलियारों में घुसपैठियों को लेकर शोर-शराबा जारी है। यह इसके बावूजूद है कि देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने भी यह स्पष्ट कर दिया है कि, "असम नागरिकता सूची अभी केवल एक मसौदा है और इसके आधार पर कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी।" अदालत ने यह भी कहा है कि"सभी दावों और आपत्तियों के समाधान के लिए उचित प्रक्रिया अपनार्इ जाएगी।" यहां तक कि भारत के निर्वाचन आयोग के प्रमुख ओपी रावत ने यह स्पष्ट कर दिया कि जिन लोगों के नाम असम में नागरिकों की नई सूची में नहीं हैं उन्हें अभी "चिंता करने की ज़रूरत नहीं है" अगर उनके नाम मतदाता सूची में  हैं और यदि वे अन्य सभी आवश्यक शर्तों को पूरा करते हैं , तो वोट दे सकेंगे।

NRC राजीव गाँधी की देन है:

      दिलचस्प स्थिति यह  है कि अमित शाह कांग्रेस पर आरोप लगा रहे हैं कि कांग्रेस ने बांग्लादेश से होने वाली घुसपैठ का समर्थन किया और 'वोट बैंक' की राजनीति के खातिर इन घुसपैठियों का इस्तेमाल किया है। बहरहाल, उनका यह आरोप तथ्यों पर आधारित नहीं है। इतिहास यह है कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए यह मुद्दा कांग्रेस के प्रधानमंत्री के रूप में राजीव गांधी की ही देन है। असम में 'घुसपैठियों' की पहचान का सिलसिला 1985 के असम समझौते के साथ शुरू हुआ। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की उपस्थिति में संपन्न इस असम समझौते में भारत सरकार की और से केंद्रीयगृह सचिव आरडी प्रधान, असम सरकार के मुख्य सचिव पीपी त्रिवेदी और गैर सरकारी प्रतिनिधि के तौर पर प्रफुल्ल कुमार महंत (अध्यक्ष अखिल असम छात्र संघ- आसू), भृगु कुमार फुकन(महासचिव आसू) बृज शर्मा (महासचिव अखिल असम गण संग्राम परिषद) सम्मिलित थे।

      कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई (2001-16) इस मामले में ईमानदार हैंजब वे कहते हैं कि एनसीआर "हमारा (कांग्रेसी) बच्चा" है । असम समझौते के गुण गान करते हुए और इसका श्रेय राजीव गांधी को देते हुए उन्होंने कहा, "यह हमारा बच्चा है। यह मेरा बच्चा है। यह प्रकिया (विदेशियों की पहचान करने की प्रक्रिया) मनमोहन सिंह जी के समय के दौरान शुरू हुई थी।" (2)

      इस समझौते के तहत केवल उन लोगों को जो 24 मार्च, 1971से पहले असम के मतदाता सूची में अपना नाम होना साबित कर सकते थे, या वे लोग जो लोग 24 मार्च, 1971 से पहले की मतदाता सूची में उनके पूर्वजों का नाम होना साबित कर सकते थे, अपडेट की जा रही एनआरसी में सम्मिलित होने के काबिल थे। इस समझौते का सबसे हैरतअंगेज प्रावधान यह था कि "नागरिकता स्थापित करने पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों के द्वारा स्थापित मान्यता के विपरीत, सबूत का भार एनआरसी आवेदक पर आयद किया गया। सूची में पंजीकृत होने के लिए, आवेदकों को यह साबित करना था कि वे भारतीय नागरिकों के वंशज हैं। इसके लिए बतौर सबूत उन्हें 1951 या 1971 के पहले के दस्तावेज़ पेश करने थे।यह अत्यंत कठिन शर्त थी। एक ऐसे देश में जिसमें दस्तावेजों का बनवाने और रख-रखाव की कोर्इ बेहतर परंपरा नहीं है।" (3)

राजीव गाँधी-असम समझौते ने नेल्ली जनसंहार के हत्यारों को बचाया:

      राजीव गांधी के नेतृत्व में संपन्न असम समझौते ने जातीय/सांप्रदायिक आधार पर लोगों को शिकार बनाने की राह खोल दी। इसका ही एक नतीजा था असम में नेल्ली नरसंहार के दोषीयों को दंडित करने का मामला दफ़्न हो गया। नेल्ली जनसंहार द्वितीय विश्व युद्ध के बाद का सबसे भयावह सांप्रदायिक जनसंहार था। असम के नगांव जिले के 14 गांवों इस सांप्रदायिक दंगे की चपेट में झुलस गए थे। यह दुर्दांत कांड 18 फरवरी,1983 की सुबह से प्रारंभ हुआ और छह घंटे के भीतर लगभग 10,000 बंगाली भाषी मुसलमान (सरकार के अनुसार 2191) बेहरमी से कत्ल कर दिए गए। मारे गए लोगों में बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे थे। इस जघन्य जनसंहार की विश्व स्तर पर निंदा और विरोध होने के बाद असम में कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री हितेश्वर सैकिया सरकार ने जांच के लिए तिवारी आयोग का गठन किया। इस आयोग ने 1984 में अपनी रिपोर्ट सौंप दी। यह रिपोर्ट आज तक सार्वजनिक नहीं हुई है!

      पुलिस में 688 आपराधिक मामलों की रिपोर्ट दर्ज हुर्इ थी। इनमें से 378 मामले "साक्ष्य के अभाव" कहकर पुलिस ने अंतिम आख्या दाखिल कर जांच बंद कर दी। शेष 310 मामलों में न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल किए गए थे। अंततःइन सभी मामलों को 1985 के राजीव गांधी के असम समझौते तहत सरकार ने मुकदमे वापस ले लिए। इस जघन्य जनसंहार का कांग्रेस सरकार ने इस तरह से निबटारा किया, दंगे और जांच से संबंधित सभी रिकॉर्ड नष्ट कर दिए गए।

ईसाईयों के ख़िलाफ़ धर्म परिवर्तन कराने का इल्ज़ाम कांग्रेस की देन:    

आरएसएस के सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के कार्यक्रमों में से एक मुख्य एजेंडा यह है कि र्इसार्इ संगठन गरीबों को गुमराह कर उनका धर्म परिर्तन कर रहे हैं और हिदुस्तान को 'पादरीस्तान' या ईसाई राज्य में बदलना उनकी योजना हैं। दिलचस्प तथ्य यह है कि भारत में 200 साल 'र्इसार्इ राज' रहने के बावजूद यहां की आबादी में र्इसाइयों की संख्या घट रही है। आरएसएस के र्इसाइकरण विरोधी इस मुहिम के पीछे कांग्रेस की जबरदस्त शह रही है। मध्य प्रदेश में यह कांग्रेस सरकार ही थी, जिसने 'नियागी कमीशन' नियुक्ति किया था। इस आयोग का काम राज्य में र्इसार्इ मिशनरियों की धर्मांतरण कार्रवार्इयों की जांच-पड़ताल करना था।

      र्इसार्इ मिशनरियों के कार्य-कलापों के बारे में नियोगी कमीशन की रिपोर्ट ने हिंदू धर्म से अन्य धर्म में धर्मांतरण के लिए बेहद सख़्त शर्तें लगाईं। आयोग ने यहां भारतीय संविधान के संबंधित प्रावधानों तक की परवाह नहीं की। संविधान का अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के अंतर्गत "विवेक की स्वतंत्रता, अपने निजी विश्वास और आस्था के अनुसार किसी भी धर्म को अपनाने, उसका अनुपालन और प्रचार करने की स्वतंत्रता" की गारंटी देता है।

नियोगी कमीशन की सिफारिशों को ज्यादतर कांग्रेस राज्य सरकारों द्वारा धर्मांतरण विरोधी कानून के रूप में अपनाया। इसके साथ ही आरएसएस और उसके भारतीय जनसंघ और भाजपा जैसे राजनीतिक उपांगों को अपने सांप्रदायिक एजेंडे को बढ़ाने और हिंसा का वातारण विकसित करने का अवसर मिल गया। आरएसएस से संबंधित गिरोहों ने इसे आधार बनाकर आम ईसाईयों, उनके धार्मिक/शैक्षिक संस्थानों पर हमले, तोड़-फोड़, आगजनी और उन्हें नष्ट करने जैसी हिंसक वारदातों को अंजाम देना शुरू कर दिया। गुजरात, उड़ीसा और मध्य प्रदेश में ख़ासतौर से इस प्रकार की अनेक घटनाएं हुर्इं। मिशनरी ग्राहम स्टेन्स और उनके दो बच्चे, जिनकी आयु छह वर्ष और 10 वर्ष थी, 23 जनवरी, 1999 को जिंदा जला कर मार डाले गए।ईसाइयों के जनसंहार, चर्चों को जलाने, उड़ीसा के कंधमाल में नन के साथ सामूहिक बलात्कार (2008-09) इस तरह की सभी वारदातों को धर्मकांतरण रोकने के नाम पर न्योयोचित बताए जाने के लिए तर्क गढ़े जाने लगे।

जन गण मन बनाम वन्दे-मातरम विवाद कांग्रेस की देन   :

भारत उन अपवाद देशों में से एक है जहां एक ऐसे राष्ट्र-गान होते  हुवे, जिसका किसी धर्म से कोर्इ संबंधन नहीं है; हिंदू धर्म से प्रेरित एक राष्ट्रीय गीत भी है। वास्तव में यह गीत बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा बंगाल की प्रशंसा में संस्कृत/बांग्ला भाषा में लिखा गया है। इस गीत का अंग्रेजी गद्य एवं पद्य में अनुवाद अरबिंदो घोष ने किया था। घोष ने इसका अनुवाद 'बंगाल के गान' के रूप में किया था। इसमें मातृभूमि को हिंदू देवी दुर्गा के रूप में दर्शाया गया है। इस गीत का गायन नियमित रूप से आरएसएस गिरोह द्वारा युद्ध-नाद के रूप में भारतीय मुसलमानों को हमले का निशाना बनाने के खातिर किया जाता है, "इस देश में रहना है तो वंदे मातरम् कहना होगा।" मुसलमानों, उनकी संपत्ति और संस्थाओं पर हमला करने के लिए इस गीत को बतौर एक घातक हथियार इस्तेमाल किया जाता है। गौर तलब है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना हालांकि 1925 में हो गर्इ थी परंतु विभाजन के पहले संघ के किसी साहित्य या शाखा या उनके स्वयं सेवकों ने ब्रिटिशशाही के खिलाफ यह गीत कभी गाया हो ऐसा एक भी सबूत नहीं है।  इस विवाद की जन्म दात्री भी कांग्रेस ही है।

      राजेंद्र प्रसाद, कांग्रेस की पहली पांति के नेता थे। भारतीय संविधान सभा की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने अकस्मात इस संबंध में एक वक्तव्य दिया, जिसे इस विषय पर अंतिम निर्णय के रूप में अपनाया लिया गया। उनका वक्तव्य था,

"...गीत वंदे मातरम, जिसने भारतीय स्वतंत्रता के संघर्ष में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है,जन गण मन के साथ समान रूप से सम्मानित किया जाएगा और समान हैसियत होगी। मुझे उम्मीद है कि इस स्थिति से सभी सदस्य संतुष्ट होंगे।" (4)

हालांकि सिख, जैन, बौद्ध, आर्य समाज और ईसाई सभी हिंदू प्रतीकों को भारतीय राष्ट्रवाद के समतुल्य बनाए जाने खिलाफ थे, यह मुस्लमान समुदाय ही है, जिनकी देशभक्ति को इस गीत को लेकर परीक्षण का विषय बनाया जाता रहा है। यह इस सब के बावजूद है कि भारत के सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि संविधान के अनुसार भारत का कोई राष्ट्रीय गीत नहीं है।(5) फिर भी इस गीत को लेकर मुसलमानों को लगातार हिंदुत्व की आक्रामकता का सामना करना पड़ रहा है। कांग्रेस के बदौलत ही आरएसएस को मुसलमानों के खिलाफ जहर फैलाने के लिए यह मन- माफ़िक़ह मुद्दा मिला है।

बाबरी मस्जिद विध्वंस में कांग्रेस की हिस्सेदारी:   

आरएसएस और अन्य हिंदुत्ववादी झुंड की यह मांग कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद (6 दिसंबर,1992 को हिंदुत्ववादी गुंडों द्वारा ध्वस्त) के स्थान पर राममंदिर निर्माण किया जाए। इस मुद्दे को भुनाकर आरएसएस को  लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष भारत सत्ता हथियाने का मौका मिला है।  दिलचस्प तथ्य यह है कि विभाजन के पहले आरएसएस ने ब्रिटिश शासन के दौरान अयोध्या में राममंदिर के लिए कभी कोर्इ आंदोलन किया हो ऐसा कोई सबूत नहीं है। यह मुद्दा भी कांग्रेस ने ही आरएसएस के लिए बतौर सौगात पेश किया है। वह 22/23 दिसंबर, 1949 की रात थी। रामलला की मूर्ति को एक साज़िश के तहत बाबरी मस्जिद में रख दिया गया था। उस समय वरिष्ठ कांग्रेसी नेता गोविंद वल्लभ पंत मुख्यमंत्री और लाल बहादुर शास्त्री यूपी के पुलिस एवं यातायात मंत्री थे। उन्होंने मूर्तियों को हटाने के लिए कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की। मस्जिद को ताला लगा दिया गया। बाद में राजीव गांधी (प्रधान मंत्री1984-1989) के संकेत पर यह ताला खोला गया और रामलल्ला की  पूजा-अर्चना की इजाजत दे दी गर्इ। आखिरकार मंदिर के निर्माण के लिए शिलान्यास के रूप में ईंटें रखने की भी अनुमति भी दे दी। उनका अंदाजा था इस तरह से चुनाव में वे हिंदू वोट बैंक की फसल वे काट लेंगे परंतु कांग्रेस की मुस्लिम विरोधी राजनीति का मुख्य लाभ आरएसएस और अन्य हिंदुत्ववाद संगठनों को मिला।

      इस प्रकार इतिहास गवाह है कि यह कांग्रेस ही है जिसने धार्मिक नफरत के बीज बोए हैं लेकिन फसल आरएसएस ने काटी है या इसे काटने दी गयी है। इनमें हिंदुत्व का असल झंड-बरदार कौन हैयह समय ही बताएगा।





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