संसद में तीन तलाक: अजूबे प्रकरण की अजूबी दास्तान

Posted on 30 Dec 2018 -by Watchdog

अरविंद जैन

मुस्लिम महिलाओं को समानाधिकार देने सम्बंधी तीन तलाक़ बिल लोकसभा में तो एक बार फिर से पास हो गया मगर सवाल है कि बिना बहुमत के राज्यसभा में कैसे पास होगा? पहले भी अटक गया था। तभी तो 'अध्यादेश' जारी करना पड़ा था। अब फिर राज्यसभा की छत से उल्टा लटक सकता है। पास हो नहीं सकता। बहुत हुआ तो प्रवर समिति की भेंट चढ़ा दिया जाएगा। ऐसे ही रचता है इतिहास! आश्चर्यजनक है कि विपक्ष ने 'वाकआउट' कर सिर्फ 245 मतों से विधेयक पास होने दिया। यह कैसा चुनावी गणित या उदारवादी-सुधारवादी रणनीति है-कहना कठिन है।

'शाहबानो' से लेकर 'सायराबानो' तक से, राजनीतिक विश्वासघात और न्याय का नाटक-नौटंकी ही होती रही है। लिंग समानता की आड़ में घृणित धार्मिक राजनीति। सत्ता और विपक्ष दोनों के हाथ दस्तानों (दोस्तानों) में! दोहरे चरित्रहीन चेहरे देश के सामने हैं। 

तीन तलाक़ विधेयक के बहाने संसद में 89% मर्द सांसद, 'स्त्री सशक्तिकरण' पर बहस (लफ़्फ़ाज़ी) करते रहे हैं। महिला आरक्षण विधेयक भी तो 9 मार्च, 2010 को राज्यसभा में पास हुआ था। आज तक लोकसभा में अटका-लटका है। तर्क यह कि क्या करें, सर्व सहमति बन ही नहीं पा रही। समान नागरिक संहिता- अभी नहीं...कभी नहीं। लगता है कि सत्ताधारी दल का मकसद भी कानून बनाना नहीं, धार्मिक-साम्प्रदायिक बहस को आगे बढ़ाना और 2019 चुनाव जीतना है।

तीन तलाक़ पर कानून बनाने की बात, सुप्रीम कोर्ट के सिर्फ दो जजों ने कही थी, तीन के बहुमत ने नहीं। अगर तीन तलाक़ असंवैधानिक है, मतलब कोई कानून है ही नहीं और निक़ाह बना रहेगा तो इसमें अपराध क्या हो गया? सज़ा किस बात की? बिना तलाक़ के लाखों हिन्दू स्त्रियां मायके में बैठी हैं या नहीं! कानून मंत्री भूल गए अपना ब्यान "कानून बनाने की कोई जरूरत नहीं"। स्वयंसेवी संगठनों को सरकारी अनुदान मिलता है, सो एक धार्मिक ढोल बजाए जा रहे हैं- लिंग समानता, लैंगिक न्याय और संविधान का। शाबाश! एक देश, एक कानून और महिला सशक्तिकरण जिंदाबाद! सुप्रीमकोर्ट से लेकर संसद तक आपराधिक न्यायशास्त्र की ऐसी तर्कहीन व्याख्या को न्यायविद कैसे उचित और विवेकपूर्ण कहेंगे!भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 375 के अनुसार पत्नी से कानूनी बलात्कार का अधिकार, व्यभिचार (धारा 497) और समलैंगिकता (धारा 377) कोई अपराध नहीं..अब सब संवैधानिक  है...कोई अपराध नहीं। दहेज केस के किसी अपराधी की गिरफ्तारी तक नहीं, मगर तीन तलाक़ देने की कहने वालों को तीन साल के लिए, जेल भेजने का कानून बन रहा है। अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती। पति जेल में और परिवार सड़क पर। पत्नी-परिवार के पालन-पोषण का क्या इंतज़ाम किया? इसका फैसला मजिस्ट्रेट करेगा! क्या यही है न्याय की अवधारणा और 'धर्मनिरपेक्षता' की भाषा-परिभाषा?

भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 494 के अनुसार  पति-पत्नी के रहते, दूसरा विवाह करने की सज़ा सात  साल है मगर अपराध असंज्ञेय और जमानत योग्य है लेकिन तीन तलाक़ की सज़ा तीन साल और अपराध संज्ञेय और गैर-जमानत योग्य। क्यों, सर क्यों? दूसरा विवाह करना, तीन तलाक़ से कम गम्भीर अपराध है, तो बहुविवाह की सज़ा सात साल क्यों? संज्ञेय ही नहीं, जमानत योग्य भी। बाल विवाह होने दो, तीन तलाक़ नहीं...नहीं... नहीं! अब तो कानून अपनी समझ से बाहर जा रहा है।

हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 से पहले हिन्दुओं में भी बहुविवाह मान्य था और स्त्रियों को तलाक का अधिकार था नहीं। विवाह सात जन्मों का अटूट बंधन माना जाता था। उस समय तमाम हिंदूवादी नेताओं ने इस कानून का खूब विरोध किया था। राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद तक प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से नाराज़ थे। ऐतिहासिक दस्तावेज़ साक्षी हैं। यह वही आहत हिंदूवादी मानस है जो आज लिंग समानता की आड़ में घृणित धार्मिक राजनीति के विषबीज बो रहा है। साम्प्रदायिक विद्वेष की खाई निरन्तर चौड़ी और गहरी होती जा रही है।

स्पष्ट है कि इन  अहंकारवादी नीतियों से आधी आबादी का कोई भला नहीं होने वाला। कानून और सामाजिक-धार्मिक ताना-बाना पहले ही इतनी बुरी तरह बिखरा-बिखराया जा चुका है कि   यहां कहने-लिखने की आवश्यकता नहीं। समय रहते राजनीति के दलदल से बाहर नहीं निकले तो भारतीय समाज विशेषकर स्त्रियों के लिए आगे सिर्फ अंतहीन अंधेरा है। सावधान..आगे खतरा है।

(अरविंद जैन सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)



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