घोषित आपातकाल से ज्यादा भयावह है यह अघोषित आपातकाल

Posted on 25 Jun 2020 -by Watchdog

अनिल जैन

आपातकाल यानी भारतीय लोकतंत्र का एक बेहद स्याह और शर्मनाक अध्याय….एक दु:स्वप्न…एक मनहूस कालखंड! पूरे 45 बरस हो गए जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी सत्ता की सलामती के लिए आपातकाल लागू कर समूचे देश को कैदखाने में तब्दील कर दिया था। विपक्षी दलों के तमाम नेता और कार्यकर्ता जेलों में ठूंस दिए गए थे। सेंसरशिप लागू कर अखबारों की आज़ादी का गला घोंट दिया गया था। संसद, न्यायपालिका, कार्यपालिका आदि सभी संवैधानिक संस्थाएं इंदिरा गांधी के रसोईघर में तब्दील हो चुकी थीं, जिसमें वही पकता था, जो वे और उनके बेटे संजय गांधी चाहते थे। सरकार के मंत्रियों समेत सत्तारूढ़ दल के तमाम नेताओं की हैसियत मां-बेटे के अर्दलियों से ज्यादा नहीं रह गई थी। आखिरकार पूरे 21 महीने बाद जब चुनाव हुए तो जनता ने अपने मताधिकार के जरिए इस तानाशाही के खिलाफ शांतिपूर्ण ढंग से ऐतिहासिक बगावत की और देश को आपातकाल के अभिशाप से मुक्ति मिली थी।

आपातकाल के बाद पांच दलों के विलय से बनी जनता पार्टी की सरकार ने और कुछ उल्लेखनीय काम किया हो या न किया हो लेकिन संवैधानिक प्रावधानों का सहारा लेकर देश पर दोबारा तानाशाही थोपे जाने की राह को उसने बहुत दुष्कर बना दिया था। यह उस सरकार का प्राथमिक कर्तव्य था, जिसे उसने ईमानदारी से निभाया था। लेकिन यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि लोकतांत्रिक मूल्यों और नागरिक अधिकारों का अपहरण हर बार बाकायदा घोषित करके ही किया जाए, यह जरूरी नहीं। यह काम लोकतांत्रिक आवरण और कायदे-कानूनों की आड़ में भी हो सकता है और हो भी रहा है।

आज अगर हम अपनी राजनीतिक और संवैधानिक संस्थाओं के मौजूदा स्वरूप और उनके चाल-चलन को व्यापक परिप्रेक्ष्य मे देखें तो हम पाते हैं कि आज देश आपातकाल से भी कहीं ज्यादा बुरे दौर से गुजर रहा है। इंदिरा गांधी ने तो संवैधानिक प्रावधानों का सहारा लेकर देश पर आपातकाल थोपा था, लेकिन आज तो औपचारिक तौर पर आपातकाल लागू किए बगैर ही वह सब कुछ बल्कि उससे भी कहीं ज्यादा हो रहा है, जो आपातकाल के दौरान हुआ था। फर्क सिर्फ इतना है कि आपातकाल के दौरान सब कुछ अनुशासन के नाम पर हुआ था और आज जो कुछ हो रहा है, वह विकास और राष्ट्रवाद के नाम पर।

केंद्र सहित देश के लगभग आधे राज्यों में सत्तारूढ़ या सत्ता में भागीदार भारतीय जनता पार्टी के भीतर अटल-आडवाणी का दौर खत्म होने के बाद पिछले पांच-छह वर्षों में ऐसी प्रवृत्तियां मजबूत हुई हैं, जिनका लोकतांत्रिक मूल्यों और कसौटियों से कोई सरोकार नहीं है। सरकार और पार्टी में सारी शक्तियां एक समूह के भी नहीं बल्कि एक ही व्यक्ति के इर्द-गिर्द सिमटी हुई हैं। आपातकाल के दौर में उस समय के कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने चाटुकारिता और राजनीतिक बेहयाई की सारी सीमाएं लांघते हुए ‘इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा’ का नारा पेश किया था। आज भाजपा में तो रविशंकर प्रसाद, शिवराज सिंह चौहान, देवेंद्र फडनवीस आदि से लेकर नीचे के स्तर तक ऐसे कई नेता हैं जो नरेंद्र मोदी को जब-तब दैवीय शक्ति का अवतार बताने में कोई संकोच नहीं करते। इस सिलसिले की शुरुआत करने वाले वेंकैया नायडू थे, जो अब उप राष्ट्रपति हैं। हाल ही में भाजपा के मौजूदा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने तो देवकांत बरुआ ही नहीं, बल्कि अपनी पार्टी के भी बाकी नेताओं को भी मात देते हुए राजनीतिक निर्लज्जता और चापलूसी की नई मिसाल पेश की है। उन्होंने कहा है कि नरेंद्र मोदी तो देवताओं के भी नेता हैं।

नरेंद्र मोदी देश-विदेश में जहां भी जाते हैं, उनके उत्साही ‘समर्थकों’ का प्रायोजित समूह उन्हें देखते ही मोदी-मोदी का शोर मचाता है और किसी रॉक स्टार की तर्ज पर मोदी इस पर मुदित नजर आते हैं। ऐसे ही जलसों में भाषणों के दौरान उनके मुंह से निकलने वाली इतिहास और विज्ञान संबंधी अजीबोगरीब जानकारियों पर बजने वाली तालियों के वक्त उनकी अहंकारी मुस्कान हैरान करने वाली होती है।

लेकिन बात नरेंद्र मोदी या उनकी सरकार की ही नहीं है, बल्कि आजादी के बाद भारतीय राजनीति की ही यह बुनियादी समस्या रही है कि वह हमेशा से व्यक्ति केंद्रित रही है। हमारे यहां संस्थाओं, उनकी गरिमा और स्वायत्तता को उतना महत्व नहीं दिया जाता, जितना महत्व करिश्माई नेताओं को दिया जाता है। नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक की यही कहानी है। इस प्रवृत्ति से न सिर्फ राज्यतंत्र के विभिन्न उपकरणों, दलीय प्रणालियों, संसद, प्रशासन, पुलिस और न्यायिक संस्थाओं की प्रभावशीलता का तेजी से पतन हुआ है, बल्कि राजनीतिक स्वेच्छाचारिता और गैरज़रूरी दखलंदाजी में भी बढ़ोतरी हुई है। 

यह स्थिति सिर्फ राजनीतिक दलों की ही नहीं है। आज देश में लोकतंत्र का पहरुए कहे जा सकने वाले ऐसे संस्थान भी नजर नहीं आते, जिनकी लोकतांत्रिक मूल्यों को लेकर प्रतिबद्धता संदेह से परे हो। आपातकाल के दौरान जिस तरह प्रतिबद्ध न्यायपालिका की वकालत की जा रही थी, आज वैसी ही आवाजें सत्तारूढ़ दल से नहीं, बल्कि न्यायपालिका की ओर से भी सुनाई दे रही हैं। यही नहीं, ज्यादातर मामलों में तो अदालतों के फैसले भी सरकार की मंशा के मुताबिक ही रहे हैं। यानी व्यावहारिक तौर पर भी न्यायपालिका सरकार के प्रति प्रतिबद्ध हो चुकी है। सूचना का अधिकार लगभग बेअसर बना दिया गया है। सीबीआई, आयकर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय जैसी एजेंसियां विपक्षी नेताओं और सरकार से असहमत सामाजिक कार्यकर्ताओं, लेखकों और बुद्धिजीवियों को परेशान करने का औजार बन गई हैं। 

हाल के वर्षों में लोकसभा और कई विधानसभा चुनावों के दौरान इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन में गड़बड़ियों की गंभीर शिकायतें जिस तरह सामने आई हैं, उससे हमारे चुनाव आयोग और हमारी चुनाव प्रणाली की साख पर सवालिया निशान लगे हैं, जो कि हमारे लोकतंत्र के भविष्य के लिए अशुभ संकेत है। नौकरशाही की जनता और संविधान के प्रति कोई जवाबदेही नहीं रह गई है। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो समूची नौकरशाही सत्ताधारी दल की मशीनरी की तरह काम करती दिखाई पड़ती है। चुनाव में मिले जनादेश को दलबदल और राज्यपालों की मदद से कैसे तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है, उसकी मिसाल पिछले छह वर्षों के दौरान हम गोवा, मणिपुर, मध्य प्रदेश, कर्नाटक आदि राज्यों में देख चुके हैं। राज्य सभा चुनाव में ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने के लिए विपक्षी विधायकों की खरीद-फरोख्त का नजारा भी पिछले दिनों देश ने देखा है। 

जिस मीडिया को हमारे यहां लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की मान्यता दी गई है, उसकी स्थिति भी बेहद चिंताजनक है। आज की पत्रकारिता आपातकाल के बाद जैसी नहीं रह गई है। इसकी अहम वजह है- बड़े कॉरपोरेट घरानों का मीडिया क्षेत्र में प्रवेश और मीडिया समूहों में ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की होड़। इस मुनाफाखोरी की प्रवृत्ति ने ही मीडिया संस्थानों को पूरी तरह जनविरोधी और सरकार का पिछलग्गू बना दिया है। सरकार की ओर से मीडिया को दो तरह से साधा जा रहा है- उसके मुंह में विज्ञापन ठूंस कर या फिर सरकारी एजेंसियों के जरिए उसकी गर्दन मरोड़ने का डर दिखाकर। इस सबके चलते सरकारी और गैर सरकारी मीडिया का भेद लगभग खत्म सा हो गया है। 

व्यावसायिक वजहों से तो मीडिया की आक्रामकता और निष्पक्षता बाधित हुई ही है, पेशागत नैतिक तथा लोकतांत्रिक मूल्यों और नागरिक अधिकारों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता का भी कमोबेश लोप हो चुका है। मुख्यधारा के मीडिया से इतर जो पत्रकार सरकार की आलोचना करने का साहस दिखा रहे हैं, उन्हें बिना किसी आधार के राजद्रोह के मुकदमे लगाकर प्रताड़ित किया जा रहा है।

पिछले पांच-छह वर्षों के दौरान जो एक नई और खतरनाक प्रवृत्ति विकसित हुई वह है सरकार, सत्तारूढ़ दल और मीडिया द्वारा सेना का अत्यधिक महिमा मंडन। यह सही है कि हमारे सैन्य बलों को अक्सर तरह-तरह की मुश्किल भरी चुनौतियों से जूझना पड़ता है, इस नाते उनका सम्मान होना चाहिए लेकिन उनको किसी भी तरह के सवालों से परे मान लेना और सैन्य नेतृत्व द्वारा राजनीतिक बयान बाजी करना तो एक तरह से सैन्यवादी राष्ट्रवाद की दिशा में कदम बढ़ाने जैसा है।

आपातकाल कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि सत्ता के अति केंद्रीयकरण, निरंकुशता, व्यक्ति-पूजा और चाटुकारिता की निरंतर बढ़ती गई प्रवृत्ति का ही परिणाम थी। आज फिर वैसा ही नजारा दिख रहा है। सारे अहम फैसले संसद तो क्या, केंद्रीय मंत्रिपरिषद की भी आम राय से नहीं किए जाते; सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री और उनके मुख्य सिपहसालार यानी गृह मंत्री अमित शाह की चलती है। 

आपातकाल के दौरान संजय गांधी और उनकी चौकड़ी की भूमिका सत्ता-संचालन में गैर-संवैधानिक हस्तक्षेप की मिसाल थी, तो आज वही भूमिका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ निभा रहा है। संसद को लगभग अप्रासंगिक बना दिया गया है। जनहित से जुड़े मामलों में न्यायपालिका के यदा-कदा आने वाले आदेशों की भी सरकारों की ओर से खुलेआम अवहेलना हो रही है। असहमति की आवाजों को बेरहमी से चुप करा देने या फर्जी देशभक्ति के शोर में डूबो देने की कोशिशें साफ नजर आ रही हैं। 

आपातकाल के दौरान और उससे पहले सरकार के विरोध में बोलने वाले को अमेरिका या सीआईए का एजेंट करार दे दिया जाता था तो अब स्थिति यह है कि सरकार से असहमत हर व्यक्ति को पाकिस्तान परस्त या देश विरोधी करार दे दिया जाता है। आपातकाल मे इंदिरा गांधी के बीस सूत्रीय और संजय गांधी के पांच सूत्रीय कार्यक्रमों का शोर था तो आज विकास और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के आवरण में हिंदुत्व वादी एजेंडे पर तेजी से अमल किया जा रहा है। इस एजेंडा के तहत अल्पसंख्यकों, दलितों और आदिवासियों का तरह-तरह से उत्पीड़न हो रहा है। 

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि आपातकाल के बाद से अब तक लोकतांत्रिक व्यवस्था तो चली आ रही है, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं, रवायतों और मान्यताओं का क्षरण तेजी से जारी है। लोगों के नागरिक अधिकार गुपचुप तरीके से कुतरे जा रहे हैं। सत्तर के दशक तक में केंद्र के साथ ही ज्यादातर राज्यों में भी कांग्रेस का शासन था, इसलिए देश पर आपातकाल आसानी से थोपा जा सका। हालांकि इस समय भाजपा भी केंद्र के साथ ही देश के लगभग आधे राज्यों मे अकेले या सहयोगियों के साथ सत्ता पर काबिज है। उसकी इस स्थिति के बरअक्स देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस की ताकत का लगातार क्षरण होता जा रहा है। वह कमजोर इच्छा शक्ति और नेतृत्व के संकट की शिकार है। लंबे समय तक सत्ता में रहने के कारण उसमें संघर्ष के संस्कार कभी पनप ही नहीं पाए, लिहाजा सड़क से तो उसका नाता टूटा हुआ है ही, संसद में भी वह प्रभावी विपक्ष की भूमिका नहीं निभा पा रही है। बाकी विपक्षी दलों की हालत भी कांग्रेस से बेहतर नहीं है। क्षेत्रीय दल भी लगातार कमजोर हो रहे हैं। विपक्ष की इस दारुण स्थिति का लाभ उठाकर सरकार मनमाने जनविरोधी फैसले ले रही है। 

हालांकि अब उस तरह से देश पर आपातकाल थोपना बहुत आसान नहीं है। अब आंतरिक संकट बताकर नागरिकों के मौलिक अधिकारों को निलंबित करने के लिए संसद के अलावा दो तिहाई राज्यों की विधानसभाओं में भी दो तिहाई बहुमत होना आवश्यक है। फिर भी हमें भाजपा के वरिष्ठ नेता देश के पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी की उस आशंका को नहीं भूलना चाहिए जो उन्होंने आपातकाल की चालीसवीं सालगिरह के मौके पर व्यक्त की थी। 

आडवाणी ने एक अंग्रेजी अखबार को दिए साक्षात्कार में देश को आगाह किया था कि लोकतंत्र को कुचलने में सक्षम ताकतें आज पहले से अधिक ताकतवर हैं और पूरे विश्वास के साथ यह नहीं कहा जा सकता कि आपातकाल जैसी घटना फिर दोहराई नहीं जा सकती। बकौल आडवाणी, ”भारत का राजनीतिक तंत्र अभी भी आपातकाल की घटना के मायने पूरी तरह से समझ नहीं सका है और मैं इस बात की संभावना से इनकार नहीं करता कि भविष्य में भी इसी तरह से आपातकालीन परिस्थितियां पैदा कर नागरिक अधिकारों का हनन किया जा सकता है। आज मीडिया पहले से अधिक सतर्क है, लेकिन क्या वह लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्ध भी है? कहा नहीं जा सकता। सिविल सोसायटी ने भी जो उम्मीदें जगाई थीं, उन्हें वह पूरी नहीं कर सकी हैं। लोकतंत्र के सुचारु संचालन में जिन संस्थाओं की भूमिका होती है, आज उनमें से केवल न्यायपालिका को ही अधिक जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।”  

आडवाणी का यह बयान यद्यपि पांच वर्ष पुराना है लेकिन इसकी प्रासंगिकता पांच वर्ष पहले से कहीं ज्यादा आज महसूस की जा सकती है। आधुनिक भारत के राजनीतिक विकास के सफर में लंबी और सक्रिय भूमिका निभा चुके एक तजुर्बेकार राजनेता के तौर पर आडवाणी की इस आशंका को मौजूदा राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो हम पाते हैं कि आज देश आपातकाल से बुरे और भयावह दौर से गुजर रहा है।

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)



Generic placeholder image


मोदी सरकार के लेबर कोड मजदूरों की गुलामी का दस्तावेज़ हैं!
15 Dec 2020 - Watchdog

मोदी का ‘नया भारत’, हमारी संवैधानिक व्यवस्था के अस्तित्व के लिए ही खतरा पैदा कर रहा है
15 Dec 2020 - Watchdog

अन्नदाता को बदनाम करने की जगह कानून वापस ले सरकार
15 Dec 2020 - Watchdog

अरुंधति रॉय को शांति के लिए कोरिया का साहित्यिक ग्रैंड लॉरेट पुरस्कार
23 Nov 2020 - Watchdog

केरल सरकार ने वापस लिया सोशल मीडिया से जुड़ा विवादित अध्यादेश
23 Nov 2020 - Watchdog

केरल सरकार ने वापस लिया सोशल मीडिया से जुड़ा विवादित अध्यादेश
23 Nov 2020 - Watchdog

हाथरस गैंगरेप के खिलाफ देश भर में उबाल
30 Sep 2020 - Watchdog

बाबरी विध्वंस फ़ैसला: वही क़ातिल, वही मुंसिफ, अदालत उसकी
30 Sep 2020 - Watchdog

भगत सिंह के सपनों का भारत बनाम ‘हिन्दू राष्ट्र’
29 Sep 2020 - Watchdog

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भारत में बंद किया अपना काम
29 Sep 2020 - Watchdog

कृषि क़ानून: इंडिया गेट पर फूँका ट्रैक्टर
28 Sep 2020 - Watchdog

भगत सिंह के जन्मदिवस पर आइये अपने उस क्रांतिकारी पुरखे को याद करें
28 Sep 2020 - Watchdog

भारत बंद’ में लाखों किसान सड़कों पर
25 Sep 2020 - Watchdog

भारत बंद’ में लाखों किसान सड़कों पर
25 Sep 2020 - Watchdog

बिहार चुनावः 243 विधानसभा सीटों के लिए तारीखों का एलान, पहले चरण की वोटिंग 28 अक्टूबर को
25 Sep 2020 - Watchdog

प्रशांत भूषण के समर्थन में इलाहाबाद से लेकर देहरादून तक देश के कई शहरों में प्रदर्शन
20 Aug 2020 - Watchdog

“मैं दया नहीं मांगूंगा. मैं उदारता की भी अपील नहीं करूंगा ”
20 Aug 2020 - Watchdog

योगी आदित्यनाथ के भड़काऊ भाषण मामले में याचिकाकर्ता को उम्रकैद की सज़ा
30 Jul 2020 - Watchdog

मीडिया के शोर में राफेल घोटाले की सच्चाई को दफ़्न करने की कोशिश
30 Jul 2020 - Watchdog

जनता की जेब पर डाके का खुला ऐलान है बैंकों और बीमा कंपनियों का निजीकरण
24 Jul 2020 - Watchdog

हम तंगदिल, क्रूर और कमजोर दिमाग के लोगों से शासित हैं : अरुंधति राय
23 Jul 2020 - Watchdog

राहुल गांधी का हमला, 'BJP झूठ फैला रही है' देश को इसकी भारी क़ीमत चुकानी होगी
19 Jul 2020 - Watchdog

‘हाया सोफिया मस्जिद’ में दफ़्न कर दी गयी तुर्की की धर्मनिरपेक्ष सांस्कृतिक विरासत
19 Jul 2020 - Watchdog

मणिपुरः महिला अधिकारी का आरोप, मुख्यमंत्री ने ड्रग तस्कर को छोड़ने के लिए दबाव बनाया
18 Jul 2020 - Watchdog

विधायक खरीदो और विपक्ष की सरकारें गिराओ
18 Jul 2020 - Watchdog

घोषित आपातकाल से ज्यादा भयावह है यह अघोषित आपातकाल
25 Jun 2020 - Watchdog

आपातकाल को भी मात देती मोदी सरकार की तानाशाही
25 Jun 2020 - Watchdog

सफूरा जरगर को दिल्ली हाईकोर्ट से जमानत
23 Jun 2020 - Watchdog

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में सरकारी चाय बगान श्रमिकों की दुर्दशा
22 Jun 2020 - Watchdog

मनमोहन की मोदी को नसीहत: “भ्रामक प्रचार, मज़बूत नेतृत्व का विकल्प नहीं!”
22 Jun 2020 - Watchdog



घोषित आपातकाल से ज्यादा भयावह है यह अघोषित आपातकाल