रोजगार के मोर्चे पर औंधे मुंह गिर गयी है मोदी सरकार!

Posted on 22 Mar 2019 -by Watchdog

नई दिल्ली। देश में रोजगार के क्षेत्र में आए भीषण संकट पर एक और आंकड़े ने अपनी मुहर लगी दी है। एनएसएसओ के 2017-18 के पीरियाडिक लेबर फोर्स सर्वे (पीएलएफएस) में बताया गया है कि श्रम के क्षेत्र में लगे पुरुष कामगारों की संख्या में निर्णायक तौर पर कमी देखी गयी है। 2011-12 में जो संख्या 30.4 करोड़ थी वह 2017-18 में घटकर 28.6 करोड़ हो गयी है। जबकि पहले इस क्षेत्र में लगातार बढ़ोत्तरी दर्ज की जा रही थी। 1993-94 में यह रंख्या 21.9 करोड़ थी जो 2011-12 तक बढ़कर 30.4 करोड़ हो गयी थी। इंडियन एक्सप्रेस में इससे संबंधित आज एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है।

दिलचस्प बात ये है कि यह गिरावट शहर और गांवों दोनों में हुई है। हालांकि अंतर थोड़ा जरूर है। गांवों में यह 6.4 फीसदी है जबकि शहरों में ये आंकड़ा 4.7 का है। गांवों और शहरों में पुरुषों की बेरोजगारी की दर क्रमश: 7.1 और 5.8 फीसदी है। हालांकि ये आंकड़े अभी आधिकारिक तौर पर जारी नहीं हुए हैं।

अपना नाम सार्वजनिक न करने की शर्त पर एक विशेषज्ञ ने बताया कि आंकड़ा गहरे अध्ययन की जरूरत महसूस कर रहा है। लेकिन इस बात में कोई शक नहीं कि बड़े स्तर पर रोजगार में हानि हुई है और नौकरियों के अवसरों में बेहद कम बढ़ोत्तरी हुई है।

गौरतलब है कि ये रिपोर्ट दिसंबर 2018 में ही सार्वजनिक होनी थी। लेकिन सरकार ने नहीं किया। जिसके विरोध में राष्ट्रीय सांख्यकी आयोग के चेयरमैन पीसी मोहनान और उसकी दूसरी एक सदस्य जेवी मीनाक्षी ने इस्तीफा दे दिया था।

एनएसएसओ डेटा के मुताबिक 2011-12 से 2017-18 के बीच 4.3 करोड़ रोजगार में हानि ग्रामीण इलाकों हुई है जबकि शहरी इलाकों में यह संख्या .4 करोड़ है। हालांकि एनएसएसओ रोजगार दर को प्रतिशत में प्रकाशित करता है न कि वास्तविक संख्या के रुप में। इसके डेटा में जनसंख्या, लिंग दर, श्रम बल भागीदारी की दर, जनसंख्या के मुकाबले रोजगार आदि विवरण शामिल होते हैं। भारत की राष्ट्रीय श्रम शक्ति में 4.7 करोड़ की गिरावट सऊदी अरब की जनसंख्या से भी ज्यादा है। 

जबकि 2011-12 के दौरान कहानी बिल्कुल उल्टी थी। उस समय ग्रामीण महिलाओं के रोजगार में बड़े पैमाने पर गिरावट दर्ज की गयी थी। ऐसा बताया जाता है कि यह ग्रामीण पुरुषों के रोजगार में आए उछाल का नतीजा था। 2004-05 से 2011-12 के बीच तकरीबन 2.20 करोड़ महिलाओं के रोजगार में कटौती हुई थी। जबकि इसी दौरान पुरुषों के रोजगार में 1 करोड़ 30 लाख की बढ़ोत्तरी हुई थी। इस तरह से कुल रोजगार के क्षेत्र में तकरीबन 90 लाख का नुकसान हुआ था।

इसी के साथ एक और दिलचस्प आंकड़ा सामने आया है जो सरकार के मुंह पर करारा तमाचा है। जब मोदी सरकार पूरे देश में वोकेशनल एजुकेशन और ट्रेनिंग के लिए अभियान चला रखी हो तब उसके आंकड़ों में गिरावट आना किसी अचरज से कम नहीं है। एनएसएसओ के इस आंकड़े के मुताबिक 15-59 साल तक काम करने की क्षमता रखने वालों में वोकेशनल ट्रेनिंग या एजुकेशन लेने वालों की जो दर 2011-12 में 2.2 फीसदी थी वह 2017-18 में घटकर 2 फीसदी रह गयी है। हालांकि युवाओं में .1 फीसदी की बढ़ोत्तरी जरूर हुई है।



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