नई दिल्ली: उत्तराखंड के उत्तरकाशी में बीते सप्ताह पांच अगस्त को बादल फटने से आई अचानक बाढ़ ने धराली गांव में भारी तबाही मचा दी थी. इस घटना में कई घर और इमारतें बह गई थीं, जबकि 50 से ज्यादा लोग लापता बताए जा रहे थे और कई अन्य मलबे में दबे होने की आशंका थी.
अब समाचार एजेंसी एएफपी ने भारतीय अधिकारियों के हवाले से खबर दी है कि इस हादसे के एक हफ़्ते बाद भी कम से कम 68 लोगों का कोई पता नहीं चल पाया है.
जहां, प्रशासन द्वारा पहले इस आपदा में कम से कम चार लोगों की मौत की खबर दी गई थी, वहीं अब ये संख्या बढ़कर 70 से ज़्यादा होने की संभावना है.
इस घटना में जीवित बचे लोगों द्वारा प्रसारित वीडियो में कीचड़ भरे पानी का एक भयानक उफान बहुमंजिला इमारतों को बहाते हुए दिखाई दे रहा है. आपदा अधिकारियों ने मंगलवार (12 अगस्त) को बताया कि वे धराली के मलबे में शवों की तलाश कर रहे हैं.
ध्यान रहे कि गंगोत्री के रास्ते में पड़ने वाला धराली चार धाम यात्रा का अहम पड़ाव है. ये जगह हर्षिल वैली के पास है. कल्प केदार यहां का स्थानीय मंदिर है, जहां श्रद्धालु दर्शन करने के लिए आते हैं. श्रद्धालु कई बार धराली के होटलों में भी रुकते हैं.
राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल के गंभीर सिंह चौहान ने कहा कि खोजी कुत्तों ने कई जगहों की पहचान की थी जहां शव होने का संकेत मिल रहा था, लेकिन जब ‘खुदाई शुरू हुई, तो नीचे से पानी निकला.’
चौहान ने कहा कि टीमें इस गहन खोज में ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार का भी इस्तेमाल कर रही हैं.
सड़कें बह जाने और मोबाइल फ़ोन संचार व्यवस्था ठप
मालूम हो कि शुरुआत में सैकड़ों लोगों के लापता होने की सूचना मिली थी. लेकिन सड़कें बह जाने और मोबाइल फ़ोन संचार व्यवस्था ठप हो जाने के कारण, बचावकर्मियों को सूची की दोबारा जांच करने में कई दिन लग गए.
स्थानीय सरकार ने अब 68 लोगों को लापता बताया है, जिनमें 44 भारतीय और 22 नेपाली शामिल हैं. इस सूची में नौ सैनिक भी शामिल हैं.
उल्लेखनीय है कि पहाड़ी क्षेत्रों में जून से सितंबर तक मानसून के मौसम में घातक बाढ़ और भूस्खलन आम हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन और खराब योजनाबद्ध विकास के कारण इनकी आवृत्ति और गंभीरता बढ़ रही है.
जलवायु परिवर्तन विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यह आपदा ग्लोबल वार्मिंग के प्रभावों के लिए एक ‘चेतावनी’ है.
फिलहाल प्रशासन द्वारा बाढ़ का कोई आधिकारिक कारण नहीं बताया गया है, लेकिन वैज्ञानिकों ने कहा है कि संभवतः तीव्र बारिश के कारण तेज़ी से पिघल रहे ग्लेशियर का मलबा ढह गया.
गौरतलब है कि हिमालयी ग्लेशियर, जो लगभग दो अरब लोगों को आवश्यक जल प्रदान करते हैं, जलवायु परिवर्तन के कारण पहले से कहीं अधिक तेज़ी से पिघल रहे हैं, जिससे समुदायों को अप्रत्याशित और गंभीर आपदाओं का सामना करना पड़ रहा है.
ऐसे में स्थायी हिम के नरम होने से भूस्खलन की संभावना बढ़ जाती है.
ज्ञात हो कि धराली गंगोत्री से 19 किमी, केदारनाथ से 270 किमी और बद्रीनाथ से 402 किमी दूर स्थित है और बीते कई सालों से विशेषज्ञ पहाड़ियों के कमज़ोर होने और उससे सटी हिमालय श्रृंखला में पिघलते ग्लेशियरों के कारण राज्य में निर्माण गतिविधियों के खिलाफ चेतावनी दे रहे हैं.