उत्तराखंड के चार धाम तीर्थ स्थलों पर पर्यटकों का बढ़ता दबाव, पर्यावरण और सुरक्षा के लिए चुनौती है

नई दिल्ली: उत्तराखंड के चार धामों – केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री में दर्शनार्थियों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन ये स्थान केवल एक निश्चित सीमा तक ही पर्यटकों के लिए सुरक्षित माने जा सकते हैं.

साइंटिफिक रिपोर्ट्स पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री धामों में प्रतिदिन अधिकतम 15,778, 13,111, 8,178 और 6,160 पर्यटक ही आ सकते हैं, बशर्ते सरकार उचित अपशिष्ट प्रबंधन, वाहनों की पहुंच सीमित करने आदि जैसे स्थायी उपाय करे.

इसमें यह भी सिफारिश की गई है कि सरकार चार धाम में मौजूदा पर्यटन स्थलों पर दबाव कम करने के लिए आस-पास के स्थलों को विकसित करने सहित कई कदम उठाए.

चार धाम पर बढ़ता दबाव

चार धाम हिंदू तीर्थस्थल हैं और ये उत्तराखंड में हिमालय के ग्लेशियरों के तलहटी में ऊंचे स्थानों पर स्थित हैं. ये हर साल लाखों तीर्थयात्रियों को आकर्षित करते हैं.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, साल 2019 में चार धाम में अनुमानित 34,77,957 तीर्थयात्री आए (हालांकि 2021 में कोविड-19 महामारी के कारण यह संख्या कम हो गई).

पिछले कुछ वर्षों में पर्यटकों की आमद में हुई इस वृद्धि को ध्यान में रखते हुए उत्तराखंड में कई बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की भी योजना बनाई गई है. जैसे कि विवादास्पद चार धाम सड़क परियोजना. इस परियोजना का उद्देश्य नई सड़कें बनाकर और मौजूदा राजमार्गों को चौड़ा करके राज्य के सभी चार धामों तक संपर्क बढ़ाना है.

हालांकि, पर्यावरणविदों और शोधकर्ताओं ने इन क्षेत्रों की नाज़ुक पारिस्थितिकी और भूभाग पर इस परियोजना के प्रभाव के कारण कई चिंताएं जताई हैं.

इसमें वनों की कटाई एक प्रमुख चिंता का विषय है, जिसका मुख्य कारण इन पर्वतीय क्षेत्रों में स्थिरता का अभाव है.

हाल ही में, अगस्त के अंत में उत्तराखंड वन विभाग ने सीमा सड़क संगठन को चार धाम परियोजना का हिस्सा बनने वाले एक बाईपास सड़क के निर्माण के लिए 17.5 हेक्टेयर वन भूमि के उपयोग की सैद्धांतिक मंज़ूरी दे दी.

इस तरह की कटाई, भूमि उपयोग में बदलाव और जलवायु परिवर्तन के कारण क्षेत्र में बारिश में तेज़ी आई है, जिसके कारण उत्तराखंड के चार धाम क्षेत्रों में हाल के दिनों में कई आपदाएं आई हैं.

मालूम हो कि 5 अगस्त को गंगोत्री ग्लेशियर और धाम के रास्ते में पड़ने वाले एक गांव, धराली में हुए भूस्खलन में कई लोग मारे गए और सैकड़ों लापता हो गए.

उत्तराखंड स्थित जीबी. पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान सहित विभिन्न संस्थानों के शोधकर्ताओं की एक टीम ने राज्य के चार धाम क्षेत्रों और उसके आसपास के क्षेत्रों में इको-पर्यटन की संभावनाओं का अध्ययन किया.

उन्होंने इन क्षेत्रों की पर्यटक वहन क्षमता का अनुमान लगाने के लिए दस अलग-अलग लेकिन प्रासंगिक सूचकांकों (जैसे अधिकतम बर्फ से आच्छादित क्षेत्र, ढलान और वनस्पति आवरण) की जांच की. वहन क्षमता, किसी स्थान के पर्यावरण और संसाधनों को नुकसान पहुंचाए बिना अधिकतम लोगों की संख्या को दर्शाती है.

अध्ययन में पाया गया कि इन क्षेत्रों में इको-पर्यटन स्थलों का विकास करते समय ऊंचाई और ढलान पर विचार करना महत्वपूर्ण है. 4,200 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्र पर्यटन विकास के लिए ‘कम उपयुक्त’ थे, और साथ ही खड़ी ढलान वाले स्थान भी. इसलिए वे कम ऊंचाई और कम ढलान वाले स्थलों पर पर्यटन विकास की सलाह देते हैं.

उदाहरण के लिए बद्रीनाथ धाम और उसके आसपास के लगभग 50% क्षेत्र में ढलान 33 डिग्री से कम थी और ये पर्यटन गतिविधियों के विकास के लिए उपयुक्त स्थल थे. हालांकि, ये स्थल घाटियों में या उनकी ढलानों पर स्थित नहीं होने चाहिए, तथा घाटी के आधार से कम से कम 100 मीटर की दूरी बनाए रखनी चाहिए.

टीम ने भू-विविधता (भूवैज्ञानिक संरचनाओं के प्रकार जैसे तलछटी निक्षेप), जलवायु और हिम आवरण क्षेत्र में परिवर्तन जैसे सूचकांकों का भी अध्ययन किया.

आश्चर्यजनक रूप से उन्होंने पाया कि इन चार तीर्थस्थलों और उनके आसपास के हिम आवरण क्षेत्र में 2002 से 2020 तक कमी आई है.

उन्होंने पाया कि गंगोत्री ग्लेशियर में हिम आवरण में सबसे अधिक कमी आई है (प्रति वर्ष 22.36 मीटर), उसके बाद यमुनोत्री (प्रति वर्ष 20 मीटर), बद्रीनाथ (प्रति वर्ष 17.32 मीटर) और केदारनाथ (प्रति वर्ष 14.14 मीटर).

इन ग्लेशियरों से सुरक्षित दूरी सुनिश्चित करते हुए टीम ने पाया कि पर्यटन विकास के लिए उपयुक्त क्षेत्र गंगोत्री और यमुनोत्री दोनों धामों में लगभग 167 वर्ग किलोमीटर, केदारनाथ में लगभग 145 वर्ग किलोमीटर और बद्रीनाथ में लगभग 100 किलोमीटर तक सीमित थे.

वहन क्षमता

इन सूचकांकों के आधार पर टीम ने इन चार क्षेत्रों की वहन क्षमता का विश्लेषण किया. उनके अनुमान के अनुसार, बद्रीनाथ की वास्तविक वहन क्षमता प्रतिदिन 11,833 से अधिकतम 15,778 पर्यटकों के बीच, केदारनाथ के लिए 9,833 से 13,111 के बीच, गंगोत्री के लिए 6,133 से 8,178 के बीच, और यमुनोत्री के लिए 4,620 से 6,160 के बीच है.

अब 2019 में चार धाम यात्रा करने वाले लोगों की संख्या पर विचार करें, (आखिरी वर्ष जिसके लिए सरकारी आंकड़े उपलब्ध हैं; और 2021 को ध्यान में नहीं रखा गया है, क्योंकि आंकड़े दर्शाते हैं कि उस वर्ष कोविड-19 महामारी के कारण पर्यटकों की संख्या में भारी गिरावट आई थी) तो बद्रीनाथ में प्रतिदिन लगभग 6,073 पर्यटक, केदारनाथ में प्रतिदिन लगभग 4,878 पर्यटक, गंगोत्री में प्रतिदिन लगभग 2,586 पर्यटक और यमुनोत्री में प्रतिदिन लगभग 2,271 पर्यटक आए.

इन आंकड़ों के अनुसार, अध्ययन के अनुमान में पर्यटकों की संख्या अभी भी स्थायी सीमा के भीतर है. लेकिन इन तीर्थस्थलों पर आने वाले पर्यटकों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है. पिछले 24 वर्षों (2000-2024) में ही इन स्थलों पर आने वाले पर्यटकों की संख्या में प्रति वर्ष बद्रीनाथ में 28,784, केदारनाथ में 39,671, गंगोत्री में 28,784 तथा यमुनोत्री में 28,784 पर्यटकों की वृद्धि हुई है.

हालांकि, चार धाम क्षेत्र (भौगोलिक विस्तार) अधिक पर्यटकों को समायोजित कर सकता है, ढलान और बर्फ से ढके क्षेत्र सहित कई कारक बताते हैं कि यहां आने वाले पर्यटकों की वास्तविक संख्या बहुत कम है.

उदाहरण के लिए अध्ययन के अनुसार, बद्रीनाथ की भौतिक वहन क्षमता प्रतिदिन लगभग 29,500 पर्यटकों की है, लेकिन स्थायी सीमाओं को ध्यान में रखते हुए इसकी वास्तविक वहन क्षमता 11,833 है.

इसी प्रकार, केदारनाथ की भौतिक वहन क्षमता प्रतिदिन लगभग 24,500 पर्यटकों की है, लेकिन इसकी वास्तविक वहन क्षमता 9,833 है. गंगोत्री लगभग 20,000 पर्यटकों को समायोजित कर सकता है, लेकिन इसकी वास्तविक वहन क्षमता 6,133 है, और यमुनोत्री लगभग 10,000 पर्यटकों को प्रतिदिन समायोजित कर सकता है, लेकिन इसकी वास्तविक वहन क्षमता 4,620 है.

अध्ययन में दिए गए सुझाव

इन सभी कारकों के आधार पर इको-टूरिज्म स्थलों की स्थापना के लिए सबसे उपयुक्त क्षेत्रों की पहचान करने के अलावा, अध्ययन में ‘सैटेलाइट स्पॉट’ – मौजूदा प्रमुख स्थलों के आसपास के क्षेत्र – विकसित करने की भी सिफारिश की गई है ताकि पर्यटन का ‘विकेंद्रीकरण’ हो और पर्यटन गतिविधियों और उनके प्रभावों (जैसे पानी की बढ़ती ज़रूरतें, अधिक अपशिष्ट उत्पादन) से प्रभावी ढंग से निपटा जा सके. इसमें ऐसे कुछ स्थलों की सूची दी गई है.

उदाहरण के लिए बद्रीनाथ में, मौजूदा पर्यटन स्थल बद्रीनाथ मंदिर में, तप्त कुंड, शेषनेत्र योगध्यान मंदिर और ब्रह्म कपाल के ठीक बगल में है.

अध्ययन में सिफारिश की गई है कि जोशीमठ और औली जैसे सैटेलाइट स्पॉट (जो इस क्षेत्र में इको-टूरिज्म की संभावनाओं के लिए अत्यधिक उपयुक्त स्थानों में आते हैं), जो बद्रीनाथ चार धाम क्षेत्र की निचली ऊंचाई पर स्थित हैं, को स्थायी रूप से विकसित किया जाना चाहिए.

लेकिन अध्ययन में कहा गया है कि इन ‘उपग्रह स्थलों’ को विकसित करने से पहले, सरकार को चार धाम क्षेत्रों में ‘अनुकूलित कदम’ उठाने की ज़रूरत है, जिसमें होम स्टे की योजना बनाने के लिए पर्वतारोहण गांव विकसित करना, पर्याप्त कार/वाहन पार्क जैसी बुनियादी ढांचागत सेवाएं और अन्य सुविधाएं विकसित करना, साथ ही समुदाय-आधारित ज़िम्मेदार पर्यटन पहल विकसित करना और सुरक्षित यात्रा के लिए एक स्थायी यात्रा मोबाइल एप्लिकेशन लॉन्च करना शामिल है.

उदाहरण के लिए सरकारी पहलों से खानाबदोश स्वदेशी आदिवासी समुदायों (जैसे बद्रीनाथ के माना गाँव में रदम्पा और भोटिया, और गंगोत्री में जड़-भोटिया) को सशक्त बनाया जाना चाहिए.

अध्ययन में आगे कहा गया है कि इन स्थलों पर हवा, पानी और मिट्टी की गुणवत्ता की निगरानी के लिए बुनियादी ढांचा भी महत्वपूर्ण है.

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