July 23, 2024

स्वदेश  सिन्हा

”नियति द्वारा सुनिश्चित वह शुभ दिन आ गया है। हमारा भारत देश लंबी निद्रा और संघर्ष के बाद सुनहरे भविष्य के लिए पुन: जाग्रत, जीवंत, मुक्त और स्वतंत्र खड़ा है। काफ़ी हद तक हमारा भूतकाल अभी भी हमें जकड़े हुए है और हम प्राय: जो प्रतिज्ञा, जो संकल्प अब तक करते आए हैं, उसे निभाने के लिए हमें बहुत कुछ करना होगा। आज रात बारह बजे, जब सारी दुनिया सो रही होगी, भारत जीवन और स्वतंत्रता की नयी और उजली चमकती सुबह के साथ उठेगा। हम नए सिरे से इतिहास लिख रहे हैं और अब जिस इतिहास का हम निर्माण करेंगे उस पर दूसरे लिखने को बाध्य होंगे। जिस समय सारी दुनिया निद्रा के आगोश़ में होगी उस समय भारत उज्जवल नवजीवन और चमचमाती स्वतंत्रता प्राप्त कर रहा होगा।”

(14अगस्त 1947 की रात जवाहरलाल नेहरू ने संविधान परिषद में अपना सुप्रसिद्ध भाषण ‘नियति से साक्षात्कार’ दिया था, उसके कुछ अंश।)

आज से 76 वर्ष पहले भारत की आज़ादी इसलिए भी बहुत महत्वपूर्ण थी कि इसने समूची दुनिया में स्वाधीनता की एक नयी लहर पैदा की थी। भारत प्रत्यक्ष उपनिवेशवाद का अंतिम दुर्ग था। हालांकि देश का एक बड़ा वर्ग अभी भी यह मानता है कि तत्कालीन वैश्विक स्थिति ऐसी नहीं रह गई कि प्रत्यक्ष निवेश कायम किए जाएं और उन्हें बनाकर रखा जाए।

कुछ लोग इसे आर्थिक उपनिवेशवाद का नया दौर भी बताते हैं, परन्तु इसका कदापि यह अर्थ नहीं कि इससे आज़ादी का वह महान स्वाधीनता संग्राम; जो 1857 से बहुत पहले किसानों और जनजातियों के विद्रोह से लेकर 1947 तक लगातार चलता रहा, जिसमें महात्मा गांधी के नेतृत्व में एक लंबा असहयोग आंदोलन चला, जिसने राष्ट्रीय आंदोलन की सभी धाराओं को अपने में समाहित किय, महत्‍वपूर्ण नहीं था। वर्गों और जातियों में बंटे समाज ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद से लोहा लिया एवं उस पर में विजय प्राप्त की। भारतीय स्वाधीनता संग्राम का एक सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह था कि भारत के साथ-साथ एशिया अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे अन्य बहुत से देशों को भी साम्राज्यवाद से मुक्ति मिली, लेकिन अधिकतर अपनी आज़ादी बचा न सके। ज़्यादातर देशों में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था को पलटकर सैनिक शासन स्थापित हो गया या फिर धार्मिक कट्टरपंथियों ने सत्ता पर क़ब्ज़ा कर लिया।

ये देश आज़ादी खोकर किसी न किसी सैनिक गुट में शामिल हो गए। आज़ादी मिलने के समय भारत की स्थिति कोई ख़ास अच्छी नहीं थी। विभाजन की पीड़ा लाखों लोगों को झेलनी पड़ी थी। दंगों में हज़ारों लोग मारे गए थे। इस‌के बावज़ूद जवाहरलाल नेहरू के कुशल नेतृत्व में देश धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक देश बना रहा। लोकतांत्रिक संविधान लागू हुआ जिसमें धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र व समाजवाद की बात की गई। भारत गुटनिरपेक्ष बना तथा किसी भी सैनिक गुट में शामिल नहीं हुआ।

उसी समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे अनेक संगठन; जिन्होंने स्वाधीनता संग्राम में भाग नहीं लिया था तथा वे अंग्रेजों का समर्थन कर रहे थे, वे लोग देश में पाकिस्तान जैसा धार्मिक शासन लाना चाहते थे। इसके अलावा कांग्रेस में भी हिन्दूवादी तत्वों का बहुमत था, इसके बावज़ूद जवाहरलाल नेहरू धर्मनिरपेक्षता की नीति पर अडिग खड़े‌ रहे। वे जानते थे कि कोई भी धार्मिक शासन प्रणाली इस बहुजातीय और बहुधर्मी देश को छिन्न-भिन्न कर देगी। यह भी सही है कि जवाहरलाल नेहरू यूरोप अथवा फ्रांस की तरह की धर्मनिरपेक्षता की नीति भारत में नहीं लागू कर पाए। हमारे यहां सर्वधर्म समभाव वाली नीति ही लागू हो पाई और राज्य का धर्म से अलगाव नहीं हो पाया, इससे बहुसंख्यक समुदाय को भी ज़्यादा लाभ हुआ। जवाहरलाल नेहरू के पास विकल्प सीमित थे, इसके लिए उन्हें दोष नहीं दिया जा सकता।

कांग्रेस लगातार भारी विरोध के बावज़ूद धर्मनिरपेक्षता की नीति पर दृढ़ रही, परन्तु नब्बे के दशक में नयी आर्थिक नीतियों के लागू होने, मंडल तथा कमंडल की राजनीति देश के परिदृश्य में हावी होने के बाद कांग्रेस अपनी धर्मनिरपेक्षता की नीति पर मज़बूती‌ से नहीं खड़ी रह पाई, जिसे जवाहरलाल नेहरू ने आज़ादी के बाद दृढ़ता से लागू किया था।

अगर आज देश में संघ परिवार का फासीवाद हावी हो गया है, तो उसके लिए कांग्रेस भी कम ज़िम्मेदार नहीं है। जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने मुख्यालय पर कभी राष्ट्रध्वज भी नहीं फहराया था, वह आज राष्ट्रवाद के सबसे बड़े पैरोकार बन गए हैं। आरएसएस ने अपने अंग्रेजी पत्र ऑर्गनाइजर में 14 अगस्त 1947 में लिखा था, ”वे लोग जो किस्मत के दांव से सत्ता पर पहुंचे हैं, वे भले ही हमारे हाथों में तिरंगे को थमा दें, लेकिन हिन्दुओं द्वारा इसे कभी सम्मानित नहीं किया जा सकेगा, न अपनाया जा सकेगा। तीन का आंकड़ा अपने आप में अशुभ है और एक ऐसा झंडा; जिसमें तीन रंग हों, बेहद ख़राब मनोवैज्ञानिक असर डालेगा और देश के लिए नुकसानदेह होगा।”

वास्तव में आज भारतीय लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के लिए सबसे बड़ा ख़तरा संघ परिवार का फासीवाद है। यह बात जग ज़ाहिर है कि जब पूंजीवाद संकट के दौर में प्रवेश करता है, तो उसकी सारी संभावनाएं समाप्त हो जाती हैं और न यह बढ़ पाता है न अपना विस्तार कर पाता है।

ऐसी दशा में वह अपने औपचारिक लोकतंत्र का लबादा भी उतार फेंकता है, नतीज़तन शासकवर्ग सारी जनता के ऊपर तानाशाही लाद देता है और जनता के सारे लोकतांत्रिक अधिकारों का गला घोंट दिया जाता है। मोटे तौर पर यही फासीवाद है, जिसे हम आज अपने देश में देख रहे हैं।

दुनिया के बहुत से देश इस दौर से गुज़र चुके हैं, जिससे आज हम गुज़र रहे हैं। आज हमारे देश में संघ परिवार सत्ता पर काबिज़ रहने के लिए जनपक्षधर और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए लड़ने वाली ताक़तों का दमन कर रहा है। समूचे इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया को अपने नियंत्रण में कर लेने के बाद अनेक छोटे-छोटे मीडिया संस्थान; जो फासीवाद के ख़िलाफ़ दृढ़ता से खड़े हैं, उनके यहां छापे पड़ रहे हैं और उन्हें बदनाम किया जा रहा है। अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़; विशेष रूप से मुसलमानों के ख़िलाफ़ समाज में नफ़रत पैदा की जा रही है। आज स्थिति 1975 में इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल से भी बुरी है।

एक ओर प्रधानमंत्री घोषणा कर रहे हैं कि ”भारतीय अर्थव्यवस्था बहुत जल्दी विश्व के तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगी।” परन्तु दूसरी ओर वास्तविकता यह है कि आज आर्थिक मामले में भारत की स्थिति बहुत ख़राब है। इस मामले में यह अंगोला जैसे ग़रीब देशों से भी पिछड़ा हुआ है। अमेरिका, जापान, जर्मनी और ब्रिटेन की तो बात ही छोड़िए। हम आर्थिक दृष्टि से दुनिया के 197 देशों में 142 वें नम्बर पर हैं।

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम 2022 के पहले दिन अर्थात 17 जनवरी को प्रकाशित ऑक्सफैम की रिपोर्ट में कहा गया है कि ”भारत के टॉप 10 फीसदी अमीर लोगों; जिनके पास देश की 45% दौलत है, पर 1 फीसदी एडिशनल टैक्स लगाया जाए, तो उस पैसे से देश को 17.7 लाख एक्स्ट्रा ऑक्सीजन सिलेंडर मिल जाएंगे। टॉप के 1‌0 दौलतमंद भारतीयों के पास इतनी दौलत हो गई है कि वे आगामी 25 सालों तक देश के सभी स्कूल-कॉलेजों की फंडिंग कर सकते हैं। ‘सबका साथ, सबका विकास’ के शोर के मध्य पिछले एक साल में अरबपतियों की संख्या में वृद्धि 39% से बढ़कर 142% तक पहुंच गई है। इनमें टॉप 10 लोगों के पास इतनी दौलत जमा हो गई है कि यदि वे रोज़ाना 1 मिलियन डॉलर अर्थात 7 करोड़ रोज़ाना ख़र्च करें, तब जाकर उनकी दौलत 84 सालों में ख़त्म होगी। सबसे अमीर 98 लोगों के पास उतनी दौलत है, जितनी 55.5 करोड़ ग़रीब के पास है। आक्सफैम 2022 की रिपोर्ट में यह तथ्य उभरकर आया है कि नीचे की 50% आबादी के पास गुजर-बसर करने के लिए सिर्फ़ 6% दौलत है।’’

वास्तव में दुनिया भर में बढ़ता हुआ आर्थिक संकट और धन के कुछ हाथों में केन्द्रित हो जाने के कारण फासीवाद को गति मिली है। अपने देश में भाजपा के शासनकाल में यह प्रवृत्ति और तेज़ी से बढ़ी है। भारतीय समाज में हज़ारों साल के सामाजिक पिछड़ेपन तथा जातिप्रथा के कारण हमारे

समाज में फासीवाद के बीज पहले ही से मौज़ूद थे। जवाहरलाल नेहरू का ऐसा सोचना था कि ज्यों-ज्यों भारत में औद्योगिक विकास होगा, वैसे-वैसे धार्मिक कट्टरपन और जातिवाद अपने आप समाप्त हो जाएगा, परन्तु ऐसा न‌ हो सका, यह इसलिए हुआ क्योंकि पिछड़ापन हमारे समाज में बहुत गहराई से जड़ें जमाकर बैठा हुआ है, इसलिए आज हमारे देश में फासीवाद की लड़ाई के साथ-साथ आधुनिक जीवन मूल्यों के लिए भी संघर्ष ज़रूरी है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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