देहरादून की सड़कों पर पिछले कई दिनों से गूंज रही आवाज़ें किसी सामान्य विरोध का हिस्सा नहीं हैं. यह उन लाखों युवाओं की बेचैनी है, जो सालों की तैयारी के बाद हर बार किसी न किसी पेपर लीक के शिकार बन जाते हैं. इस बार मामला उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UKSSSC) की स्नातक स्तर की भर्ती परीक्षा का है, जो 21 सितंबर को आयोजित हुई थी.
परीक्षा शुरू होने से पहले ही सोशल मीडिया पर तीन पन्नों का प्रश्नपत्र वायरल हो गया. शुरू में इसे अफवाह मानकर टाल दिया गया, लेकिन जैसे ही जांच ने पकड़ बनाई, आरोप साफ हो गए कि हरिद्वार स्थित एक परीक्षा केंद्र से यह पन्ने बाहर निकाले गए थे.
आरोपों के घेरे में आए एक उम्मीदवार खालिद मलिक पर आरोप है कि उसने परीक्षा के दौरान मोबाइल से तस्वीरें खींचीं और बहन को भेजीं. बहन साबिया ने इन्हें टिहरी के एक प्रोफेसर सुमन को भेजा, ताकि उत्तर मिल सके. हालांकि सुमन ने सवालों को हल किया लेकिन उत्तर नहीं भेजे और यूथ लीडर बॉबी पंवार को इस बारे में सूचना दे दी. पंवार ने इन तस्वीरों को सोशल मीडिया पर साझा करते हुए धांधली का आरोप लगाया.
यह खबर जैसे ही बाहर आई, युवाओं में गुस्सा फैल गया.
देहरादून के परेड ग्राउंड पर बेरोज़गार युवाओं का जमावड़ा लगा. मांग थी- परीक्षा रद्द हो, दोषियों को सज़ा मिले और जांच सीबीआई के हवाले की जाए. प्रदर्शन धीरे-धीरे हरिद्वार, अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ तक फैल गया. नारे गूंजे- ‘पेपर चोर, गद्दी छोड़’. कुछ जगहों पर छात्रों ने ‘आज़ादी’ जैसे नारे भी लगाए, जिसने विरोध को और तीखा बना दिया और राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बना दिया.
सरकार ने तुरंत कदम उठाते हुए विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित कर दिया. एसआईटी की निगरानी सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय न्यायाधीश बी.एस. वर्मा कर रहे हैं. हरिद्वार में तैनात सेक्टर मजिस्ट्रेट केएन तिवारी और टिहरी अगरोड़ा डिग्री कालेज की असिस्टेंट प्रोफेसर सुमन को निलंबित कर दिया है. परीक्षा केंद्र पर तैनात दो पुलिस कर्मियों को भी निलंबित किया गया है.
मुख्य आरोपित खालिद और उसकी बहन साबिया को गिरफ्तार किया गया है. सरकार की यह कार्रवाई सुरक्षा व्यवस्था की चूक और प्रणालीगत कमियों को उजागर करती है क्योंकि उक्त परीक्षा केंद्र में 18 कक्षाओं में से केवल 15 में सिग्नल जैमर लगाए गए थे, और खालिद उसी कक्ष में था जहां जैमर नहीं था.
मुख्यमंत्री के विवादित बोल
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इसे महज़ ‘पेपर लीक’ न मानते हुए ‘चीटिंग केस’ बताया और कहा कि ‘नकल माफिया’ को कुचल दिया जाएगा. उन्होंने यहां तक कहा कि ‘नकल जिहादियों को मिट्टी में मिला दिया जाएगा.’
लेकिन सवाल यही है कि अगर यह महज़ एक चीटिंग केस था, तो तीन पन्नों का प्रश्नपत्र बाहर कैसे आया और कैसे वायरल हुआ? विपक्ष इसे बड़ा घोटाला बताकर सरकार पर हमलावर है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सीधे शब्दों में कहा कि ‘आज भाजपा का दूसरा नाम है – पेपर चोर!’
राहुल गांधी सोशल मीडिया एक्स पर लिखा है:
देशभर में बार-बार होने वाले पेपर लीक ने करोड़ों मेहनती युवाओं की ज़िंदगी और सपनों को तबाह कर दिया है. उत्तराखंड का UKSSSC पेपर लीक इसका ताज़ा उदाहरण है. लाखों युवाओं ने दिन-रात मेहनत की, लेकिन भाजपा ने चोरी से उनकी पूरी मेहनत पर पानी फेर दिया. हम लगातार मांग कर रहे हैं कि पेपर लीक रोकने के लिए मज़बूत और पारदर्शी सिस्टम बनाया जाए. लेकिन मोदी सरकार इस पर आंखें मूंदकर बैठी है – क्योंकि उन्हें युवाओं की बेरोज़गारी की नहीं, बल्कि अपनी सत्ता की चिंता है. बेरोज़गारी आज देश की सबसे बड़ी समस्या है और यह सीधे तौर पर वोट चोरी से जुड़ी है. पेपर चोरों को पता है – अगर युवाओं को रोज़गार नहीं भी मिलेगा, तो भी वे चुनाव में वोट चोरी करके सत्ता में बने रहेंगे. युवा सड़कों पर हैं और नारा दे रहे हैं – ‘पेपर चोर, गद्दी छोड़!’ यह सिर्फ़ युवाओं की नौकरी की लड़ाई नहीं है, यह न्याय और लोकतंत्र की लड़ाई है. मैं हर छात्र और युवा के साथ इस न्याय की लड़ाई में मजबूती से खड़ा हूं.
बॉबी पंवार: एक उभरता हुआ युवा नेता
विरोध के बीच बॉबी पंवार जैसे युवा नेता भी सामने आए हैं, जो अब छात्रों के आंदोलन का चेहरा बन चुके हैं. 27 वर्षीय बॉबी स्वाभिमान मोर्चा के अध्यक्ष और उत्तराखंड बेरोजगार संघ के पूर्व प्रमुख पंवार देहरादून के चकराता तहसील के लखमंडल से आते हैं. 2018 में बेरोजगार संघ में शामिल होने के बाद से उन्होंने कई प्रदर्शन किए हैं. 2024 में टिहरी लोकसभा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में खड़े होकर बॉबी पंवार ने 1.6 लाख वोट हासिल किए थे, जो कांग्रेस उम्मीदवार के 1.9 लाख वोट के बहुत करीब था. इस प्रदर्शन ने उन्हें राज्य राजनीति में एक गंभीर दावेदार के रूप में स्थापित किया.
बॉबी पंवार के नेतृत्व में चल रहा वर्तमान आंदोलन सिर्फ़ परीक्षा रद्द कराने या जांच की मांग का नहीं रह गया है, बल्कि यह नौजवानों की उस बेचैनी का प्रतीक बन गया है, जो बार-बार धांधली और लापरवाही के कारण अवसर खोते जा रहे हैं.
सरकार की ओर से खालिद मलिक के परिवार की दुकान ढहाना और आरोपियों पर सख्ती करना यह दिखाने की कोशिश है कि कार्रवाई की जा रही है. लेकिन छात्रों का सवाल और बड़ा है कि क्या यह कार्रवाई प्रणाली की गड़बड़ियों को ठीक करेगी? क्या अगली बार परीक्षा बिना लीक हुए पूरी हो पाएगी?
उत्तराखंड में यह पहली बार नहीं है जब पेपर लीक ने भर्ती प्रक्रिया को ठप किया हो. इससे पहले भी कई बार परीक्षाएं रद्द हो चुकी हैं और हजारों युवाओं का भविष्य अटक चुका है. यही कारण है कि इस बार आक्रोश और भी गहरा है.
इस विवाद ने सत्ता से लेकर सड़क तक हलचल मचा दी है. एक तरफ सरकार एसआईटी और कानून का हवाला देकर भरोसा दिलाने की कोशिश कर रही है, दूसरी तरफ युवाओं का भरोसा लगातार टूट रहा है.
छात्रों को मुख्यमंत्री से मिलवाने का विवाद
एक नया विवाद तब खड़ा हुआ जब यह खुलासा हुआ कि भाजपा सदस्यों द्वारा संचालित कॉलेजों के छात्रों को मुख्यमंत्री से मिलवाने के लिए देहरादून लाया गया. हरिद्वार के हर्ष डिग्री कॉलेज (भाजपा सदस्य हर्ष कुमार दौलत द्वारा संचालित) और फेरुपुर इंटर कॉलेज के छात्रों को परीक्षा परिणाम जल्दी घोषित करने की मांग के साथ मुख्यमंत्री से मिलवाया गया.
प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि इस प्रतिनिधिमंडल में कई ऐसे लोग शामिल थे जो छात्र नहीं थे, जिनमें एक ग्राम विकास अधिकारी, दो वकील और एक दुकानदार शामिल थे.
उत्तराखंड का एंटी-चीटिंग कानून: कागज पर सख्त, व्यावहारिक रूप से अप्रभावी?
2023 में बनाया गया उत्तराखंड का एंटी-चीटिंग कानून देश के सबसे सख्त कानूनों में से एक माना जाता है. इसके तहत पेपर लीक में शामिल लोगों के लिए आजीवन कारावास और 10 करोड़ रुपए तक जुर्माना का प्रावधान है.
नकल करने वाले उम्मीदवारों के लिए तीन साल कारावास और कम से कम पांच लाख रुपए जुर्माना की व्यवस्था है. दूसरी बार पकड़े जाने पर 10 साल कारावास और न्यूनतम 10 लाख रुपए जुर्माना है. इस कानून के तहत पेपल लीक करने को संज्ञेय, गैर-जमानती और गैर-समझौता योग्य अपराध बना दिया गया है. संपत्ति जब्तीकरण का भी प्रावधान है.
लेकिन प्रदर्शनकारियों का सवाल है कि 2023 में लागू हुआ यह कानून नकल माफिया को रोकने में असफल क्यों रहा है? हकम सिंह, जो 2021 के UKSSSC पेपर लीक में भी गिरफ्तार हुआ था, परीक्षा से एक दिन पहले फिर से गिरफ्तार हुआ.
पिछले साल सीएसआईआर की परीक्षा के दौरान पड़ा था छापा
पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली सीएसआईआर (वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद) ने सेक्शन ऑफिसर (एसओ) और असिस्टेंट सेक्शन ऑफिसर (एएसओ) के पदों पर भर्ती के लिए परीक्षा का आयोजन किया था. परीक्षा सेंटर उत्तराखंड में भी दिया गया था.