June 22, 2024

पुष्परंजन

जर्मनी से भारत लौटने के बाद कुछ वर्षों मैंने यूरोप की प्रसिद्ध पत्रिका देयर श्पीगल के साथ भी काम किया था। एक दिन हेम्बर्ग से संदेश आया कि ज्यों द्रेज पर स्टोरी करनी है, जिसमें उनका इंटरव्यू होना चाहिए। बेल्जियम के लेउवेन में जन्में ज्यों द्रेज में जर्मन मैगजीन की दिलचस्पी झुग्गी-झोपड़ियों में रहने की वजह से थी। यूरोप का एक शख्स, भारत में अर्थशास्त्र का प्रोफेसर, जिसकी अभिजात्य पृष्ठभूमि रही है। जाने-माने अर्थशास्त्री याक़ द्रेज का बेटा, कम से कम एक अच्छे से फ्लैट में रह तो सकता था। उसने दिल्ली के तिमारपुर स्थित एक स्लम में अपनी पत्नी के साथ रहना किस कारण पसंद किया? जर्मन मैगजीन का मकसद उस मनोविज्ञान को समझना था। ज्यों द्रेज के जानने वाले किसी साथी पत्रकार ने संकेत दिया कि वो स्वभावत: ज़िद्दी हैं, आप उनकी पत्नी बेला से बात कीजिए, जो इस समय इलाहाबाद में रहती हैं।


बेला का नंबर मिला, उनसे बात की। बेला ने बिना लाग-लपेट के कहा, ‘ ज्यों का नंबर मैसेज कर रही हूं। इस समय रांची में हैं। आप सीधी बात कीजिए।’ प्रोफेसर ज्यों द्रेज से मैंने अपना मकसद बताया। दो दिन बाद का समय तय हुआ कि उन्हें हां करनी है, या ना। तबतक के लिए मैंने कैमरा टीम को होल्ड पर ही रखा। दो दिन बाद, जाने क्यों ज्यों द्रेज, ‘देयर श्पीगल’ के नाम से भड़क गये, और इंटरव्यू देने से मना कर दिया। उस स्टोरी की अंतत: भू्रण हत्या हो गई।

1979 में पहली बार भारत आए ज्यों ने 1980 की गर्मियों में साइकिल से ही जयपुर, अजमेर, कोटा, भोपाल और सुदूर क्षेत्रों की यात्रा की थी। 1983 में भारतीय सांख्यिकीय संस्थान से पी.एच.डी. करने के बाद ज्यों द्रेज यहीं के होकर रह गये। 2002 में ज्यों द्रेज को भारतीय नागरिकता मिल गई थी। लेकिन उनका बीच-बीच में यूरोप जाना जारी रहा। 1988 में अमर्त्य सेन ऑक्सफ बोर्ड में पढ़ा रहे थे। अमर्त्य सेन पर किताब लिखने के लिए ज्यों द्रेज को भी लंदन जाना पड़ा। इस दौरान उन्होंने भी लंदन स्कूल ऑफ इकानॉमिक्स में पढ़ाना शुरू कर दिया।

दिन में तो ज्यों द्रेज स्कूल के पॉश इलाके में छात्रों के बीच रहते, लेकिन रात गुज़ारने के लिए लंदन की कैलफेम रोड स्थित बच्चों के एक पुराने अस्पताल में आ जाते। यह अस्पताल बेसहारा लोगों के लिए शेल्टर होम था। और शायद यहीं से ज्यों द्रेज के स्वभाव में ग़रीबों-अभावग्रस्त लोगों के बीच रहना शामिल हो गया था। कुछ उन्हें अपनी मां मोनिके से भी विरासत में मिला था। अभिजात्य पृष्ठभूमि के कुछ यूरोपियंस में इस तरह की मनोग्रंथि किन हालात में विकसित होती है? यह एक विषय है, जिसका मनोवैज्ञानिक विश्लेषण ज़रूरी है। आप उत्तराखंड, लद्दाख, हिमाचल के सुदूर इलाक़ों को देख आइये। राजस्थान के पुष्कर जाएं, फक्कड़ी करते गोरे बड़ी संख्या में दीखेंगे।

ज्यों द्रेज की शिनाख़्त अकादमिक है, मगर सड़क के किनारे समाज के सबसे निचले पायदान पर बैठे लोगों के साथ दरिद्र भोज करता चेहरा भी है। ज्यों द्रेज से हम राहुल गांधी की तुलना नहीं कर सकते। लेकिन क्या राहुल गांधी ऐसे कठिन मार्ग पर जा सकते हैं? सबसे बड़ा सवाल है। फि र भी सार्वजनिक जीवन में चंद लोग हैं, जो राजनेता रहे हैं, और साधारण जीवन में विश्वास करते रहे। गांधी के इस देश में ऐसे शख्सियतों की कमी नहीं रही है। अफ सोस आज की तारीख़ में ऐसा कैरेक्टर असुलभ होने लगे हैं, व्यक्तित्व में दोहरापन अधिक दीखने लगा है। चुनाव हो, तो लुटियन बंगलों में विराजने वाले चेहरे मलिन बस्तियों में नज़र आने लगते हैं। दलितों की झोंपड़ी में दरिद्रनारायण भोज लाइट-एक्शन-कैमरे के साथ शुरू हो जाता है। भारी-भरकम, थुलथुल शरीर को पांत पर भोज के वास्ते पद्मासन लगाते समय कितना कष्ट होता होगा, सोचिए ज़रा।

सत्ता पक्ष हो, या विपक्ष, अभिनय के इस युग में वोट के वास्ते यह सब करना पड़ता है। केजरीवाल को सत्ता में आना था, एक आम इंसान की तरह अवतरित हुए। 2013 के चुनावों में नीली बैगन आर, गले में मफ लर, बिजली के पोल पर कनेक्शन जोड़ते केजरीवाल एक दशक में देखते-देखते आम से ख़ास हो गये। 2023 आते-आते केजरीवाल के पास महंगी कारों का काफि ला है। करोड़ों ख़र्च कर जिस कोठी का कायाकल्प किया, वह विवादों में है, उसकी जांच अब सीएजी के हवाले है।
ममता बनर्जी ने कारों के काफि ले से परहेज किया है। ममता बनर्जी अब भी सस्ती सूती साड़ी पहनती हैं, कालीघाट स्थित आवास से नाता नहीं तोड़ा है। बावजूद इसके, आये दिन ममता बनर्जी के कंधे पर रोज़ वेली घोटाले का वेताल लटकता दीखता है। केजरीवाल की तरह साधारण से असाधारण कायांतरण आसान है। हमारे गिर्द असंख्य नेता-कार्यकर्ता केजरीवाल की तरह मिलेंगे। रेल डब्बों के बाजू में चाय-चाय चिल्लाते बालक से राजाओं जैसे अजीमों शान हासिल करने वाले स्वयं प्रधानमंत्री मोदी विरोधियों के कटाक्ष से छत-विक्षत होते रहे हैं। पीएम मोदी असाधारण रहते हुए साधारण बनने का उपक्रम जब करते हैं, प्रहसन का हिस्सा बन जाते हैं।

दक्षिणी अमेरिकी देश उरूग्वे को ग़रीब मत मानिये। राष्ट्रपति ख़ोसे मुज़िका ने जब पद छोड़ा था, उरूग्वे का जीडीपी 15 हज़ार 655 डॉलर था। उस कालखंड में भारत का जीडीपी मात्र 1590 डॉलर था। ऐसे देश के राष्ट्रपति ने महल त्यागकर, करकट की छत लगे दो कमरे वाले साधारण से घर में रहना तय किया। 2015 में ख़ोसे मुज़िका ने यह कहते हुए राष्ट्रपति पद छोड़ा था कि मुझे अपने तीन पैर वाले दोस्त ‘मैनुअल’ और चार पैरों वाली बीटल के साथ बिताने के लिए समय की जरूरत है। मैनुअल उनका पालतू कुत्ता था, और फ ॉक्सवागन बीटल उनकी पसंदीदा गाड़ी थी। मुज़िका ने अपने पांच साल के कार्यकाल (2010 से 2015 तक) में देश को अमीर तो बना दिया, लेकिन खुद ‘कंगाल’ बने रहे। प्रेसिडेंट होने के बावजूद, रहे फकीरों जैसे। झोला लेकर चल देने वाले ‘बातफरोश फकीर’ नहीं, सचमुच के फक़ीर।

राष्ट्रपति ख़ोसे मुज़िका ने सुरक्षा के नाम पर बस दो पुलिसकर्मियों की सेवाएं ली थीं। वे आम लोगों की तरह ख़ु़़़द कुएं से पानी भरते, और अपने कपड़े भी धोते थे। राष्ट्रपति पद पर रहते हुए ख़ोसे मुजिका पत्नी के साथ मिलकर फूलों की खेती करते थे, ताकि कुछ अतिरिक्त आमदनी हो सके। राष्ट्रपति ख़ोसे मुज़िका ने नौकर-चाकर नहीं रखा। वेतन के रूप में उन्हें हर महीने 13 हज़ार 300 डॉलर मिलते थे, जिसमें से 12000 डॉलर ख़ोसे मुज़िका गरीबों को दान दे देते थे। बाकी बचे 1300 डॉलर में से 775 डॉलर छोटे कारोबारियों को देते थे। यह कोई परीकथा नहीं है। 88 साल के ख़ोसे मुज़िका अब भी जीवित हैं, किसी को इसकी पुष्टि करनी हो, तो उरूग्वे की राजधानी मोंटेविडे जाकर उनसे मिल सकता है।

ख़ोसे मुज़िका की राह को आज की राजनीति के लिए रपटीली ही मानिये। राहुल गांधी में ख़ोसे मुज़िका का अक्स ढूंढना फंतासी $िफल्म देखने जैसा है। निश्चित रूप से राहुल गांधी ने अपनी भारत जोड़ो यात्रा के ज़रिये रायसीना हिल को हिला दिया था। लोगों में उम्मीद जगी थी कि 2024 तक ऐसी यात्राओं से राहुल सत्ता की चूलें हिलाते रहेंगे। लेकिन फि ़र मार्च में दस दिवसीय यात्रा पर लंदन निकल लेना। वहां चॉथम हाउस से लेकर ब्रिटिश संसद, इंडियन डायसफोरा को संबोधित करना, उनके शैदाइयों को सुखद लगता है।

राहुल की विदेश रणनीति को बना रहे हैं, सैम पित्रोदा। उन्हीं की योजना के अनुरूप मोदी की अमेरिका यात्रा से पहले राहुल, न्यूयार्क और वाशिंगटन में थे। सोशल मीडिया पर जो सबसे अधिक दर्शनीय था, वह था राहुल का एक ट्रक वाले के साथ वाशिंगटन से न्यूयार्क आना। रास्ते में ट्रक वाले से बातचीत राहुल की ऐसी छवि उकेर रहा था, जैसे शाक्य मुनि महल त्याग कर मगध प्रस्थान कर रहे हों, और रास्ते में अत्यंत साधारण लोगों से संवाद कर रहे हों। अफ सोस, आज के राहुल का बुद्धत्व अधिक लंबा नहीं रह पाता है। राहुल बेहतरीन ‘केस स्टडी’ हैं। उनके व्यक्तित्व का दुर्भाग्य है कि खाया-पीया-अघाया मिडल क्लास मज़ाक उड़ाता है। लुट-पिट गये ग़रीब मोदी-मोदी करते हैं, और अपर मिडल क्लास ‘कोऊ नृप होय हमें का हानि’ की मुद्रा में है।

राहुल की राजनीति का मज़बूत पक्ष यह है कि वो मोदी के ‘हम दो-हमारे दो’, महंगाई, मानवाधिकार हनन जैसे अजेंडे पर बार-बार हथौड़े मारते हैं। राहुल कभी करोल बाग़ के मैकेनिक शॉप में जाकर मोटरसाइकिल के कल-पूर्जों पर हाथ आज़माकर प्रशंसकों को चकित करते हैं, तो कभी मणिपुर जाकर मोदी भक्तों को मिर्ची लगाते हैं। मगर, राहुल के अभियान का कमज़ोर पक्ष यह है कि उसमें निरंतरता नहीं है। कर्नाटक में जिन 20 इलाकों से राहुल की भारत जोड़ो यात्रा गुज़री थी, उसमें से 15 में कांग्रेस को सफलता मिली थी। लेकिन क्या भारत जोड़ो यात्रा रफ्ता-रफ्ता स्मृतिलोप का शिकार हो रही है? केसी वेणुगोपाल कहते हैं कि अगले साल पूर्व से पश्चिम तक एक और भारत जोड़ो यात्रा की योजना को आगे बढ़ायेंगे। यानी कि एक लंबे विराम के बाद यह यात्रा शुरू होगी।

इस बार संसद का मानसून सत्र राहुल के बगैर आरंभ होगा। अमेठी से चुनाव जीतने के बाद, 12 तुगलक लेन का बंगला राहुल गांधी को 2005 में अलॉट किया गया था। 22 अप्रैल 2023 को राहुल ने वह बंगला ख़ाली कर दिया, तब से वो अपनी मां के आवास, 10 जनपथ पर डेरा डाले हुए हैं। 2019 में वायनाड से चुनाव लड़ते समय राहुल गांधी ने अपनी संपत्ति का जो ब्योरा दिया था, उसमें उनके पास महरौली की कृषि भूमि है, गुड़गांव के कमर्शियल कॉम्प्लेक्स में आफि सेज़ हैं, मगर रहने को घर नहीं है। तो बेघर राहुल किसी मलिन बस्ती में अपने रहने का ठिकाना क्यों नहीं बनाते? करोल बाग़ के मैकेनिक, ट्रक ड्राइवर भी ऐसी ही जगहों से आते हैं। इनके साथ जीयें राहुल। इतिहास रचें।

पुष्परंजन स्वतंत्र पत्रकार हैं। उनका यह लेख देशबन्धु से साभार लिया गया है।

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